अब यहां शमाँ से परवाने दूर रहते हैं

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  • Shah Nawaz
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  • अब यहां शमाँ से परवाने दूर रहते हैं,
    यादे महबूबी से दीवाने दूर रहते हैं।


    बात अन्जानों की क्या कीजिए इस महफिल में,
    नफरत की आग में अपने ही चूर रहते हैं।

    प्यार के नाम से मशहूर थी बस्ती अपनी,
    अब तो बारूद के गुब्बार घिरे रहते हैं।

    हर तरफ आग है, शोलें है और नफरत है,
    कौन जाने यहाँ कि 'अमन' किसे कहते हैं।

    हर कोई खोद रहा नींव जिस ईमारत की,
    उस इमारत में वोह सब के सब ही रहते है।

    नज़र लगी है कुछ नापाक खयालातों की,
    वीराना देख के सब लोग यही कहते हैं।

    कभी तो आएंगी खुशियां हमारे आंगन में,
    इसी उम्मीद पे ‘साहिल’ ग़मों को सहते हैं।


    - शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'







    Keywords: Ghazal, India, Shama, आतंकवाद, हिंदी

    25 comments:

    1. बहुत ही बढ़िया सन्देश ,धन्यवाद आपका !

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    2. हर कोई खोद रहा नींव जिस ईमारत की,
      उस इमारत में वह, सब के सब ही रहते है।
      इनको नहीं मालूम की हम इन नींव खोदने वालों का भी इंसानियत के नाते भला चाहते हैं .
      क्या करें ?इनकी दुर्दशा लिखी है ये इतना भी नहीं जानते हैं /

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    3. बहुत बढ़िया शाहनवाज भाई जी

      "बेगानों का क्या शिकवा करू मैं
      मुझे मेरे अमन के गुलशन को आग लगाने वाले अपनों से शिकायत जरुर हैं "
      मुझे पसन्द आई तो पसंद के बटन पे चटकारा भी लगा दिया हैं

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    4. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

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    5. शाहनवाज भाई जी
      मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
      क्या गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ....!
      http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_6458.html
      आप अपनी अनमोल प्रतिक्रियाओं से  प्रोत्‍साहित कर हौसला बढाईयेगा
      सादर ।

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    6. नज़र लगी है कुछ नापाक खयालातों की,
      वीराना देख के सब लोग यही कहते हैं।

      कभी तो आएंगी खुशियां हमारे आंगन मे
      इसी उम्मीद पे ‘साहिल’ ग़मों को सहते हैं।

      बहुत खूबसूरत ग़ज़ल

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    7. कभी तो आएंगी खुशियां हमारे आंगन में,
      इसी उम्मीद पे ‘साहिल’ ग़मों को सहते हैं।
      जी हाँ यही एक उम्मीद है
      बेहतरीन

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    8. बात अन्जानों की क्या कीजिए इस महफिल में,
      नफरत की आग में अपने ही चूर रहते हैं।

      कभी तो आएंगी खुशियां हमारे आंगन में,
      इसी उम्मीद पे ‘साहिल’ ग़मों को सहते हैं।

      behadd khoobsurat ashaar bane hain..
      aapke umda khayalaat ko salaam...
      tasveer bhi bol uthi hai...
      shukriya...!!

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    9. बात अन्जानों की क्या कीजिए इस महफिल में,
      नफरत की आग में अपने ही चूर रहते हैं।

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    10. अच्छी ग़ज़ल लिखी है शाहनवाज़ जी.

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    11. "नज़र लगी है कुछ नापाक खयालातों की,
      वीराना देख के सब लोग यही कहते हैं।

      कभी तो आएंगी खुशियां हमारे आंगन में,
      इसी उम्मीद पे ‘साहिल’ ग़मों को सहते हैं।"

      जी बिलकुल ऐसा ही है जी.............
      दर्द को दिखा उस से लड़ने का इशारा बहुत बढ़िया किया है जी आपने..........

      कुंवर जी,

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    12. आप एक अच्छे लेखक शायर कवि और पत्रकार है आप सामाजिक समस्याओ को बहुत अच्छे ढंग से पेश करते है

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    13. आपके सामाजिक समस्याओ की तरफ ध्यान दिलाने का तरीका काफी अच्छा है वाकई आप कुशल लेखक कवि शायर और पत्रकार है

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    14. इसपर मुझे कुछ और याद आ रहा है,
      चमक रहा है जो दामन पे दोनों फिरकों के
      बगौर देखो ये इंसान का लहू तो नहीं!

      (कैफ़ी आज़मी से माज़रत के साथ, उनके शेर में मैंने इस्लाम की जगह इंसान कर दिया है.)

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    15. Bahut hi sundar gazal. Aap jaise log lage rahe to ek tin khushiyan hamare angan mein zarur aegi.

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    16. वाह! तुम्हारी.... बात ही अलग है.... भाई.... बहुत शानदार....

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    17. इसे कहते है रचना। बहुत खूब।

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    18. शानदार लिखा है शाह जी.

      कभी तो आएंगी खुशियां हमारे आंगन में,
      इसी उम्मीद पे ‘साहिल’ ग़मों को सहते हैं।

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    19. आपने ग़ज़ल में अपने अन्दर का दुःख पूरी तरह दर्शा दिया है.

      अब यहां शमाँ से परवाने दूर रहते हैं,
      यादे महबूबी से दीवाने दूर रहते हैं।

      बात अन्जानों की क्या कीजिए इस महफिल में,
      नफरत की आग में अपने ही चूर रहते हैं।

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    20. देख तेरे इनसान की हालत,
      क्या हो गई भगवान,
      कितना बदल गया इनसान.
      कहीं पे झगड़ा, कहीं पे दंगा,
      नाच रहा नर होकर नंगा,
      सूरज न बदला, चंदा न बदला,
      लेकिन कितना बदल गया इनसान...

      जय हिंद...

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    21. हर कोई खोद रहा नींव जिस ईमारत की,
      उस इमारत में वह, सब के सब ही रहते है


      बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
      इस रचना को हमें पढवाने के लिये शुक्रिया जी

      प्रणाम

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    22. खूब कहा है!!लेकिन अक्ल हैरान है कि इसे किस सिन्फ़ के ज़मरे में रखूँ.और गर इस से फ़रार ले लूं तो अंदाज़े-बयाँ में शायरी साफगोई से अहम और ज़रूरी बात रख जाती है.

      शमाँ को शमा या शम'अ कर लें.

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