आम है क्या?


एक तोता एक दूकानदार से मालूम करता है: लाला जी आम है क्या?
दुकानदार: नहीं! हम आम नहीं बेचते

अगले दिन फिर तोता मालूम करता है: लाला जी आम है क्या?
दुकानदार: अरे बोला था ना... हम आम नहीं बेचते

तीसरे दिन फिर तोता मालूम करता है: लाला जी आम है क्या?
दुकानदार खुन्नस में आकर कहता है: अगर अब बोला तो हथौड़ा मारूंगा!

चौथे दिन तोता मालूम करता है: लाला जी हथौड़ा है क्या?
दुकानदार: नहीं!
तोता: तो आम है क्या???
लाला जी हैरान...परेशान!!!

पांचवे दिन तोता फिर आ धमकता है: लाला जी आम है क्या?
लाला जी उसके मुंह पर हथौड़ा दे मारते हैं, तोते के दांत टूट कर बिखर जाते हैं!!!

छठे दिन तोता फिर से आ धमकता है
लाला जी तोते को बिना दांत के देखकर मुस्कराते हैं.... 

तोता धीरे से कहता है: लाला जी! 



आम का जूस है क्या???

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है आज समय जागने का


















है आज समय जागने का

है आज समय जागने का,
सो रहे हो आज क्यूँ?
गर हौसलों में दम नहीं तो
जी रहे हो आज क्यूँ?

हो रही मुल्क की दुर्गति,
सब कह रहे हैं प्रगति।
है यही अगर प्रर्गति तो
रो रहे हो आज क्यूँ?

धोखाधड़ी में लीन सब,
है लूटना ही दीन अब।
सब उंगलियां है सामने,
खुद किया क्या है आपने?
है लूटना ही दीन तो
बैचेन फिर हो आज क्यूँ?

हर ओर भ्रष्टाचार है,
सबका यही विचार है।
गर हुए गम से त्रस्त हम,
फिर खुद हुए क्यों भ्रष्ट हम।
है गम का यही सबब तो
गम पी रहे हो आज क्यूँ?

जहां दुकानें है धर्म की,
क्या कीमत होगी कर्म की?
यह मर्म ही पता नहीं,
खुश हो रहे हो आज क्यूँ?

है आज समय जागने का...


- शाहनवाज़ 'साहिल'






Keywords:
Hindi poem, kavita, hai aaj samay jagne ka, rashtra, desh bhakti, jago re, हिंदी

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ओबामा पर चढ़ा भारतीय रंग

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए तो भारतीय रंग में पूरी तरह रम गए थे, आप भी देखिए सचित्र वर्णन...


कलाम साहब से कलाम किया और बस उन्ही के हो लिए.. 


मैडम के जादू से कौन बच पाया है?


लगता है इनको 2G घोटाले के पूरी खबर थी इसलिए पहले सोनिया G और अब राहुल G



मुंबई आना है तो ठाकरे साहब को कैसे ठुकराया जा सकता है?


नोर्थ, साउथ, इस्ट और वेस्ट ---------- इंडिया इज द बेस्ट!


लालू जी से चारा और रेल मेनेजमेंट के गुर जो सीखने थे...


ममता दी के गुस्से से डर गए क्या?


अब माया से कौन दूर भाग सकता है भला?




और अंत में..............  
 एकदम असली इंडियन:

"सरदार ओबामा सिंह"




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हरिभूमि में: "निगम की चाल!"

दैनिक हरिभूमि के कल दिनांक 23 नवम्बर को प्रष्ट संख्या 4 पर प्रकाशित मेरा व्यंग्य



पड़ोस का मकान नगर निगम वाले ढहा गए! शेख जी ने खुशखलकी से शेखानी को खबर दी। वह बोली ‘अरे! ऐसा कैसे? ‘बिना नक्शा पास और इजाज़त लिए जो बना था।’ शेखानी चैंकी ‘लेकिन हमारी कॉलोनी में तो एक भी मकान नक्शा पास करवाकर नहीं बना।?‘ शेख जी ने शोखी में बोला ‘अपने नगर निगम वाले भी आजकल प्रोफेशनल स्टाईल में काम करते हैं। पहले घूम कर मोटी पार्टी ढूंढते हैं, फिर घर पर धावा बोल देते हैं। आमतौर पर मकान गिराने की धमकी से ही वसूली हो जाती है, अगर फिर भी कुछ कमाई ना हो तो भी कोई परेशानी नहीं! घर पर एक-दो नोटिसं भेजकर डराने का चांस जो रहता है। और अगर कोई फिर भी ना माने तो घर तो कभी भी गिराया ही जा सकता है।’

‘कहीं हमें भी नोटिस आ गया तो’ शेखानी बोली! ‘अब इतने मोटे-मोटे शिकार देखकर हम जैसे मरियलों के यहां कौन आएगा, सो डरना छोड़ो और धड़ल्ले से कुछ भी करो। फिर अपना तो पुराना मकान है और पुराने पाप माफ होते हैं।’ ‘ऐसा कैसे? कानून तो सबके लिए बराबर है’ शेख जी ने भी लेक्चर पूरा करने की तैयारी के साथ जवाब देने का मूड बनाया ‘जब हम कॉलोनी में आए थे तो क्या एक भी दुकान थी सड़क पर?’ शेखानी बोली ‘नहीं’। ‘अब कितनी हैं?’ ‘अब तो बाहर की सड़क से घर तक आने में आधा घण्टा लग जाता है’। ‘तो क्या तुमने सुना की एक भी दुकान बंद हुई या गिराई गई?’

‘गिराई क्यों जाएगी भला, दुकानें तो लोगो के फायदे के लिए बनी हैं?’ ‘हां फायदा हो तो रहा है, मकान लेते समय सोचा था कितनी खुली और साफ-सुथरी कॉलोनी है। परंतु भीड़भाड़ की आदत के कारण दिल ही नहीं लगता था। ना दुकानों की चकाचैंध, ना हॉकर्स की चिल्ल-पौं। माना देश में बिजली की कमीं है लेकिन अगर दुकानों में इतनी लाईट्स ना झिलमिलाए तो फिर रौनक ही क्या? जीवन एकदम फीका और बकवास! उपर से पैदल चलने की आदत ही समाप्त होती जा रही थी, भला हो हमारे बाज़ारों का पांच मिनट का रास्ता आधा घण्टे में तय करने का मौका मिल जाता है। बोर होने से बचाने का भी पूरा इंतज़ाम होता है, सामान बेचने के लिए बड़ी हसीन आवाज़ें निकाल कर राहगीरों का मनोरंजन करते है। 
अब तुम ही बताओं इतना फायदा पहुचाने वाले अगर थोड़ा सा कानून तो़ड़ कर रिहायशी इलाके में दुकान बना ले तो कोई गुनाह है क्या? अरे इन दुकानदारो की कृपा दृष्टि से कितने ही गरीब कर्मचारियों आज अमीरों की फेहरिस्त में आते हैं। और सिर्फ वह ही क्यों बल्कि हम जैसे गरीबों को भी किराए के रूप में तगड़ा पैसा मिलता है, प्रोपर्टी डिलरों की पौं-बारह हुई सो अलग। अब जिनको फायदा नहीं होता वह चिल्लाता रहता है, इतने उपकार करने वालों के खिलाफ नारेबाज़ी करके नेतागिरी चमाकाते हैं।

लेकिन यहां भी डरने की कोई बात नहीं है, ऐसे फालतू लोगो की आवाज़ नक्कार खाने में तूती बजाने जैसी ही होती है।’

- शाहनवाज़ सिद्दीकी






Keywords : critics, vyangy, haribhumi newspaper

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रोहतक ब्लोगर मिलन

बाएँ से: डॉ अरुणा कपूर जी, निर्मला कपिला जी, संजू तनेजा, संगीता पुरी जी, योगेंद्र मौदगिल जी.
ऊपर की लाइन (बाएँ से) : सतीश सक्सेना जी, केवल राम जी, राज भाटिया जी, ललित शर्मा जी, संजय भास्कर, खुशदीप सहगल (पीछे की ओर), मैं (शाहनवाज़ सिद्दीकी), अजय कुमार झा और राजीव तनेजा.
[यह फोटो देखकर चौंकिएगा मत, मैंने यह फोटो सतीश जी और मेरे द्वारा खिंची गई अलग-अलग दो फोटों को मिला कर बनाई है, तभी तो एक ही फोटो में मैं और सतीश जी साथ-साथ नज़र आ रहे हैं :-) ]

मूंछों में मेरा नया अवतार!
नुक्कड़ द्वारा आयोजित दिल्ली ब्लोगर विमर्श की ही तरह रोहतक ब्लोगर्स मिलन भी कई मायने में ज़बरदस्त रहा. जहाँ एक ओर नए-पुराने ब्लॉग लेखक एक खुशनुमा माहौल में मिले और एक दुसरे के बारे में जाना, वहीँ कई सार्थक बातें भी सामने आई. खुशदीप जी के प्रस्ताव पर बहुत से ब्लोगर्स ने अपनी कमियां बताई, अधिकतर ने बिना लाग-लपेट के बताया कि टिप्पणियों से उन्हें फर्क पड़ता है. बात-चीत से पता चला कि हिंदी ब्लॉग जगत एक परिवार के तरह विकसित होता जाता रहा है, लोग यहाँ की खुशियों से खुश और दुखों से दुखी होते हैं, ललित शर्मा जी की तो ब्लोगिरी के कारण शुगर तक कंट्रोल में रहती है. निर्मला कपिला जी ने बताया कि कैसे उन्हें कंप्यूटर की तकनिकी जानकारी ना होने के कारण मुश्किलें पेश आती हैं, कुछ-कुछ यही कमजोरी डॉ. अरुणा कपूर जी ने भी बताई.

संजय भास्कर भाई ने वर्तिनी में होने वाली गलतियों को अपनी कमजोरी बताया, वहीँ राज भाटिया जी भी इसे ही अपनी कमजोरी मानते हैं. उपस्थित सभी साथियों की यही राय थी, कि ब्लोगिंग के ज़रिए ना केवल भाषा में सुधर हो रहा है बल्कि कई और महत्त्वपूर्ण बातों को सीखने का मौका मिल रहा है. नीरज जाट जी जैसे ब्लोगर्स केवल ब्लॉग लेखकों के लिए ही नहीं वरन अलग-अलग क्षेत्रों के ज़रूरतमंद लोगों के लिए वरदान होंगे और हो भी रहे हैं.
योगेन्द्र मौदगिल जी की एकता और सौहार्द पर लिखी लाजवाब पंक्तियाँ "मस्जिद की मीनारें बोलीं, मंदिर के कंगूरों से, संभव हो तो देश बचा लो मज़हब के लंगूरों से.." पढ़कर सतीश सक्सेना जी ने उनका परिचय कराया. वहीँ पता चला कि केवल राम जी तो ब्लॉग पर पूरी पी.एच.डी. ही कर रहे हैं.

अजय कुमार झा जी ने बताया कि कैसे अब लोग ब्लोग्वानी की तरह चिटठाजगत की भी टांग खींचने लगें हैं, आखिर यह सब कैसे रुकेगा? उनका सुझाव था कि हमें सभी ब्लॉग-संकलकों पर अपना ब्लॉग सम्मिलित करना चाहिए. ललित जी ने बताया कि कुछ ब्लोगर ब्लोगिंग के ज़रिये अच्छा-खासा पैसा कम रहे हैं, वह जानने के इच्छुक थे कि आखिर कैसे? उनकी इसके लिए एक कार्यक्रम भी रखने की योजना है. वहीँ मैंने बताया कि मेरे ब्लॉग प्रेमरस.कॉम का लक्ष्य तो है प्रेम और सौहार्द फैलाना लेकिन मैं अपनी विज्ञापन पृष्ठभूमि के कारण ब्लॉग जगत में ब्लोगर्स के आर्थिक लाभ की संभावनाओं को तलाशता रहता हूँ. मैंने ललित जी वादा किया कि जल्द ही इस पर पूरी तरह शोध करके सभी संभावनाओं को सबके सामने रखूँगा. हालाँकि मेरा भी यह मानना है कि व्यक्तिगत रूप में हिंदी ब्लॉग जगत में आर्थिक लाभ ढूँढना अभी दूर की कोडी है, लेकिन सामूहिक रूप से प्रयास होने पर यह आज भी असंभव नहीं है. इस पर मेरा विचार यह भी था, कि इस तरह का प्रोग्राम ऐसे डिजाईन होना चाहिए जिससे कि तकनिकी जानकारी ना रखने वाले ब्लोगर बंधू भी आसानी से इसका फायदा उठा सकें.

राज भाटिया जी ने ज़बरदस्त मेहमान नवाजी की, वहीँ अंतर सोहिल की मेहनत भी काबिले तारीफ़ थी, राज भाटिया जी के भतीजे चित्रांश (लकी) ने भी अपनी मेहनत से सबका मन मोह लिया. हमें आगे डॉ. दाराल साहब के पास जाना था, इसलिए  अलबेला खत्री जी नहीं मिल पाए. जाते समय हरदीप राणा (कुंवर जी) से भी बहुत थोड़ी ही बात हो पाई, जिसका मुझे अभी तक मलाल है. :-(

रोहतक के घमासान में भिड़ने वाले पहलवान ब्लोगर्स थे:
खुशदीप सहगल भाई
राज भाटिया जी
योगेंद्र मौदगिल जी
निर्मला कपिला जी
संगीता पुरी जी
सतीश सक्सेना जी
ललित शर्मा जी
नरेश सिंह राठौड़ जी
डॉ अनिल सवेरा जी
डॉ प्रवीण चोपड़ा जी
डॉ अरुणा कपूर जी
अलबेला खत्री जी
अजय कुमार झा
राजीव तनेजा
संजू तनेजा
संजय भास्कर
अंतर सोहिल
नीरज जाट
केवल राम
हरदीप राणा (कुंवर जी)

अगर भूलवश किसी का नाम लिखने से रह गया हो तो कृपया सूचित कर दें.




ब्लोगर्स मिलन की लाइव रिपोर्टिंग

पहली रिपोर्ट जांचते राज भाटिया जी.
 
ललित जी, तनेजा भाई, कुंवर जी और मैं

 
खुशदीप भाई और अनिल 'सवेरा' जी के साथ

अपनी बारी का इंतज़ार, साथ में हैं अंतर सोहिल भाई तथा खुशदीप भाई

केवल राम भाई अपनी बात बताते हुए

अब मेरी बारी

राज भाटिया जी अपनी बात रखते हुए

एक ग्रुप फोटो

विचार मंथन: राजीव तनेजा जी डॉ. अरुणा कपूर एवं उनके पति के साथ

  ब्लोगर्स मस्ती: मेरे साथ संजय भास्कर, योगेन्द्र मौदगिल जी तथा ललित शर्मा जी

नोट: सभी फोटों साभार श्री सतीश सक्सेना जी


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रोंग नंबर

एक व्यक्ति अपने कार्यालय से घर पर फ़ोन करता है तो एक अजीब महिला जवाब देती है:


व्यक्ति: आप कौन है?
महिला: नौकरानी
व्यक्ति: लेकिन हमारे घर पर तो कोई नौकरानी नहीं है?
महिला: मुझे आज सुबह ही घर की मालिकिन ने रखा है.
व्यक्ति: खैर! मैं उसका पति हूँ, क्या वह वहां पर है?
महिला: उम्म्म्म.... परर्रर.... वह तो ऊपर... अपने बेडरूम में किसी और व्यक्ति के साथ है, उनकी आवाजों से तो मुझे लगा कि वह उसका पति है.

इतना सुनकर व्यक्ति को गुस्से में लाल-पीला हो जाता है.

व्यक्ति: सुनो! क्या तुम 50,000 रूपये कमाना चाहती हो?
महिला: (रोमांचित होते हुए) मुझे इसके लिए क्या करना होगा?
व्यक्ति: मैं चाहता हूँ, कि अलमारी में रखी मेरी गन उठाओ और मेरी पत्नी और उस घटिया आदमी को गोली मार दो.

वह महिला फ़ोन नीचे लटका कर चली जाती है... व्यक्ति उसके पैरों की आवाज़ और दो धमाकों की आवाज़ सुनता है. महिला वापिस आकर फ़ोन पर मालूम करती है:

महिला: मृत शरीरों के साथ क्या करना है?
व्यक्ति: इनको स्विमिंग पुल में फेंक दो!
महिला: क्या? लेकिन यहाँ तो कोई स्विमिंग पुल नहीं नहीं!

बहुत देर तक चुप रहने के बाद
व्यक्ति: उह....मम.... क्या यह 25xx43xx न. है?
महिला: नहीं!
व्यक्ति: ओह्ह.... माफ़ करना.... रोंग नंबर...


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ब्लॉगर बिरादरी और उड़न तश्तरी

दिल्ली में दिखाई दे रहा हर ओर उजाला है
इक मायावी तश्तरी ने यहाँ पहरा डाला है

हर ओर बेकरारी है, दीदार-ए-यार की
आंसू वोह गिर रहे हैं, जिन्हें अब तक संभाला है

अंतरजाल पर होते थे हर रोज़ जिसके दर्शन
महबूब-ए-ब्लोग्गिं रु-बरु, बस होने वाला है

दिल्ली के एक नुक्कड़ पर, नुक्कड़ का है आयोजन
सारी ब्लॉगर बिरादरी को, न्यौता दे डाला है

क्या अजब बिरादरी है, ना कोई हिन्दू ना मुसलमाँ
खुशियों में झूमने का यह अवसर निकाला है



हिंदी संसार एवं नुक्कड़ के द्वारा आयोजित हिंदी ब्लॉग विमर्श का आयोजन स्थल है:
दीवान चंद ट्रस्ट, 2, जैन मंदिर रोड, शिवाजी स्टेडियम के सामने, कनाट प्लेस, नई दिल्ली 
समय: अपराह्न 3.00 बजे से 5 .00 बजे तक, शनिवार, दिनांक 13 नवम्बर, 2010

अधिक जानकारी के लिए यहाँ चटका लगाएँ!



 - शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords: ब्लॉगर मिलन, blogger meet

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व्यंग्य - जैसे लोग वैसी बातें!

खबर इंडिया कुछ लोगों के लिए नया नाम हो सकता है, लेकिन ख़बरों को अपने अलग अंदाज़ में प्रस्तुत करने का हम लोगों का प्रयास लोगों को बहुत पसंद आ रहा है। हमारी पूरी टीम खबर इंडिया के संस्थापक श्री पुष्पेंद्र आल्बे के नेतृत्व में ऑनलाइन हिंदी पत्रिकारिता के माध्यम से हिंदी भाषा के प्रसार के लिए जी जान से प्रयास कर रही है। आशा है आपको भी यह प्रयास पसंद आएगा।

इसी कड़ी में मेरा व्यंग्य  आज खबर इंडिया पर प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है:
 


जैसे लोग वैसी बातें!
 
दुनिया में लोग भी बड़े अजीब तरह के होते हैं, हमारे देश में अधिकतर लोग तो ऐसे मिलेंगे कि किसी विषय पर जानकारी हो या ना हो मगर अपनी राय देना परमोधर्म! सोचिए ज़रा एक सरकारी बाबू, जिसे अपने कार्यालय की फाईल के स्थान की जानकारी नहीं होती है, किसी पान की दुकान पर खड़े होकर क्रिकेट मैच का लुत्फ लेते समय राय देता है कि अगर फिल्डर गली में ख़ड़ा होता तो कैच ज़रूर लपक सकता था, पता नहीं कैप्टन कैसी कैप्टनशिप कर रहा है? जो लड़का कभी एक भी गर्ल को फ्रैंड नहीं बना पात वह हमेशा दूसरों को सलाह देता है कि फलां लड़की को मनाने के लिए केवल उसका ही आईडिया फिट बैठेगा! और तो और अक्सर लोगों में इस बात पर ही सर-फुटव्वल होता रहता है कि चुनाव में उसकी पसंद का उम्मीदवार ही जीतेगा। अगर किसी ने गलती से दो-चार शेयर ले डाले तो वह समझता है कि शेयर बाज़ार में उससे अधिक किसी को जानकारी हो ही नहीं सकती है।

अच्छा एक हुनर में तो हमारा पूरा देश ही माहिर है और वह है चिकित्सा! हर परिवार के अधेड़ और बुज़ूर्ग तो पहले ही डॉक्टर थे, लेकिन आजकल के चार जमात पास लोग भी पूरी निपुणता के साथ दवाईयों के बारे में सलाह देते नज़र आएंगे। एक बात तो बहुत चैकाने वाली है, सभी कहते मिलेंगे कि झाड़-फूक बाबा दूसरों को लूटने की दुकान चलाते हैं। लेकिन हर अवसर पर उन्हीं से सलाह लेने पहुंच जाएंगे और कहेंगे कि मेरे महान बाबा के जैसा तो पूरी दुनिया में कोई नहीं है। वहीं उन बाबा महोदय को दूसरे बाबा के भक्त दूनिया का सबसे भ्रष्ट बाबा साबित करने पर तुले नज़र आएंगे! इस सब में बच्चे भी किसी से पीछे नहीं है, (जब माहौल ही ऐसा है तो वह भी क्या करें)। परिक्षा के समय बेचारे किताबों से नहीं बल्कि अपने इष्ट देव से सहायता मांगते और उनको प्रसाद का प्रलोभन देते दिखाई देंगे, "हे ईश्वर! इस बार अच्छे नंबर दिलवा दो, सवा सात रूपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा!

एक मंत्री महोदय तो राय देने में महान निकले, राष्ट्रमंडल खेलों से पहले सीधे भगवान् को ही सलाह दे रहे थे कि उसको खेलों के बीच में तेज़ बारिश करनी चाहिए, तो वहीं एक टैक्सी चालक की राय थी कि खेल करवाना हमारी सरकार के बस का काम नहीं है। मतलब मंत्री जी को भगवान के और टैक्सी चालक को सरकार के कार्य में निपुणता हासिल होने का यकीन है? वैसे हमारा भारत है बहुत ही महान देश, जहां स्टेडियम की छत का एक टुकड़ा गिरने पर लोग अड़ जाते हैं कि पूरी छत गिरी है और इस बात पर भी शर्त लग जाती है, तो वहीं सट्टा इस बात पर लगता है कि बाढ़ आएगी या नहीं! और अगर आएगी तो कितने घर डूबंगे, कितने लोग मरेंगे? वैसे कुछ लोग तो खेलों की विफलता की प्रार्थना केवल इस लिए कर रहे थे कि सफलता का सेहरा कहीं सरकार को ना मिल जाए! क्या कह रहे हैं.....देश? अब देश का क्या है? उसकी चिंता कौन करे?

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- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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दैनिक जागरण में: हिंदी से हिकारत क्यों

दैनिक जागरण के आज, दिनांक 8 नवम्बर के राष्ट्रिय संस्करण के कॉलम "फिर से" में फिर से प्रकाशित... 
 (यह लेख पहले 14 जुलाई को भी दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुका है)

पढने के लिए 
कतरन पर क्लिक करें 
हमारी महान मातृभाषा हिंदी हमारे अपने ही देश हिंदुस्तान में रोजगार के अवसरों में बाधक है। हमारे देश की सरकार का यह रुख अभी कुछ अरसा पहले ही सामने आया था। बोलने वालों की संख्या के हिसाब से दुनिया की दूसरे नंबर की भाषा हिंदी अगर अपने ही देश में रोजगार के अवसरों में बाधक बनी हुई है तो इसका कारण हमारी सोच है। हम अपनी भाषा को उचित स्थान नहीं देते हैं, बल्कि अंग्रेजी जैसी भाषा का प्रयोग करने में गर्व महसूस करते हैं।

मेरे विचार से हमें अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। हमें कार्यालयों में ज्यादा से ज्यादा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। कोरिया, जापान, चीन, तुर्की एवं अन्य यूरोपीय देशों की तरह हमें भी अपने देश की सर्वाधिक बोले जाने वाली जनभाषा हिंदी को कार्यालयी भाषा के रूप में स्थापित करना चाहिए और उसी स्थिति में अंग्रेजी प्रयोग करने की अनुमति होनी चाहिए, जबकि बैठक में कोई एक व्यक्ति ऐसा हो, जिसे हिंदी नहीं आती हो। कोरिया का उदहारण लें तो वह बिना इंग्लिश को अपनाए हुए ही विकसित हुआ है और हम समझते हैं की इंग्लिश के बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपनी भाषा को छोड़कर दूसरी भाषाओं को अधिक महत्व देते हैं। अंग्रेजी जैसी भाषा को सीखना या प्रयोग करना गलत नहीं है, लेकिन अपनी भाषा की अनदेखी करना गलत ही नहीं, बल्कि देश से गद्दारी करने जैसा है।

अपनी भाषा को छोड़कर प्रगति करने के सपने देखना बिलकुल ऐसा है, जैसे अपनी मां का हाथ छोड़ किसी दूसरी औरत का हाथ पकड़ कर चलना सीखने की कोशिश करना। हो तो सकता है कि हम चलना सीख जाएं, लेकिन जब गिरेंगे तो क्या मां के अलावा कोई और उसी तरह दिल में दर्द लेकर उठाने के लिए दौड़ेगी? हम दूसरा सहारा तो ढूंढ़ सकते हैं, लेकिन मां के जैसा प्रेम कहां से लाएंगे? पृथ्वी का कोई भी देश अपनी भाषा छोड़कर आगे बढ़ने के सपने नहीं देखता है।

एक बात और, हिंदी किसी एक प्रांत, देश या समुदाय की जागीर नहीं है, यह तो उसकी है, जो इससे प्रेम करता है। भारत में तो अपने देश की संप्रभुता और एकता को सर्वाधिक महत्व देते हुए वार्तालाप करने में हिंदी को प्राथमिकता देनी चाहिए। कम से कम जहां तक हो सके, वहां तक प्रयास तो निश्चित रूप से करना चाहिए। उसके बाद क्षेत्रीय भाषा को भी अवश्य महत्व देना चाहिए। आज महान भाषा हिंदी रोजगार के अवसरों में बाधक केवल इसलिए है, क्योंकि हमें अपनी भाषा का महत्व ही नहीं मालूम है। अपने ब्लॉग में शाह नवाज


- शाहनवाज़ सिद्दीकी


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Keywords:
Rashtra Bhasha, National Language, Hindi, Dainik Jagran, मातृभाषा, हिंदी

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अमीर ‘नहटौरी‘ की दो ग़ज़लें

पेशे से शिक्षक अमीर 'नहटौरी' उत्तर प्रदेश में बिजनौर जिले के अंतर्गत आने वाले कस्बे नहटौर के रहने वाले हैं तथा जिले में उर्दू अदब के अच्छे जानकारों में शुमार होते हैं. एक समारोह में उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने गजलों से समा बाँध दिया. मालूम करने पर बताते हैं कि ब्लॉग जगत का बहुत नाम सुना है वह खुद भी ब्लॉग जगत में आने के बहुत इच्छुक है, परन्तु अभी तक अपना ब्लॉग नहीं बना पाए हैं. पेश-ए-खिदमत है उनकी दो ग़ज़लें :







----------------------------- (1) ------------------------------


तुमने कहा बस रिश्ता टूटा
हमसे पूछो क्या-क्या टूटा


दिल टूटा तो आपको क्या ग़म
जिसका टूटा उसका टूटा


तरक-ए-ताल्लुक यूं लगता है
रूह से जैसे नाता टूटा


दर्द ने ली अंगड़ाई ऐसी
ज़ख्म का इक-इक टांका टूटा


वोह भी पत्थर बनके बरसा
मैं भी शीशे जैसा टूटा


मैं मिट्टी का एक खिलौना
जितना बचाया उतना टूटा


हमसें जूनूं में अक्सर यारो
जो भी टूटा अपना टूटा


देखा अमीर इस राहे वफा में
क्या-क्या छूटा, क्या-क्या टूटा

- अमीर 'नहटौरी'




----------------------------- (2) ------------------------------


अपनों के कुछ ऐसे करम थे बेग़ानों को याद किया
देख के अपने घर की तबाही, वीरानों को याद किया


देखें छलकते आँख से आंसू, पैमानों को याद किया
होश में रहने वालों ने भी, मयख़ानों को याद किया


गुलशन में जब कलियां महकी, भंवरों का भी ज़िक्र छिड़ा
महफिल में जब शम`आ जली तो, परवानों को याद किया


फैलाए जब जाल हवस ने हुस्न को तब एहसास हुआ
सच्चाई ने आँखें खोली, दिवानो को याद किया


प्यार का नग़मा फिर से ज़बां पर, आज हुआ क्या हमको ‘अमीर’
दर्द भरे कुछ भूले बिसरे, अफ़सानों को याद किया।

- अमीर 'नहटौरी'


Keywords: Ameer Nehtauri, Gazal, Urdu Adab

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यह दिल्ली को क्या हुआ?

अब ना वह भीड़-भाड़ और ना गहमा-गहमी,
हर तरफ शान्ति है और है सन्नाटा

(दैनिक हरिभूमि (23 अक्तूबर के संस्करण) में प्रष्ट न. 4 पर मेरा व्यंग्य)
दिल्ली वापिस आए तो सर चकरा गया। पहले-पहल तो लगा ही नहीं की दिल्ली में हैं और विचार किया कि किसी से पता करते हैं कि भाई यह कौन सा शहर है? लेकिन एक-दो पुरानी इमारते देखकर लगा कि इनको पहले भी देखा हुआ है, लेकिन यह रातो-रात नई कैसे हो गई? कल तक तो लगता था कि कभी भी गिर जाएंगी। सड़क पर ब्लू लाईन बस भी नज़र नहीं आईं, कहीं हड़ताल तो नहीं है? चमचमाती लो-फ्लोर बसें दौड़ती दिखाई दी, लेकिन हमारे हाथ देने पर एक ड्राइवर ने भी मुंह उठा कर नहीं देखा, पता चला कि यह कॉमनवेल्थ के खिलाड़ियों के लिए है! मुंह मसोस कर ऑटो ले लिया, पर यह क्या? आधी सड़क बिलकुल खाली है, लोग क्या पागल हो गए हैं? सड़क की एक लेन खाली पड़ी है और उसमें कोई गाड़ी नहीं घुसा रहा है, अपने दिल्ली वाले तो जगह ना हो तब भी गाड़ी घुसा लेने में माहिर हैं! ऑटो वाले ने सवाल दागा, "साब किसी ने मरना है क्या?" "अरे यार, खाली जगह पर गाड़ी चलाने की बात कर रहा हूँ, इसमें मरने की क्या बात?" "मरने की ही तो बात है साब, वहां गाड़ी चलाने में चालान ही नहीं बल्कि जेल भी जाना पड़ेगा।" हम खिसियाकर बोले "क्यों मज़ाक करते हो? सड़क की खाली जगह पर गाड़ी चलाने में जेल!" वोह भी तपाक से बोला "अरे साहब, वहां केवल खिलाड़ी ही चल सकते हैं। वैसे इस बार हमारे खिलाड़ियों ने भी कमाल कर दिया, हर खिलाड़ी सोने के मेडल जीतने के लिए ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहा है।" हम भी लगे अपनी अक्लमंदी दिखाने "क्यों ना करेंगे मेहनत? सोने के दाम भी तो कितनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं, आसमान छू रहें मियां, आसमान!"

अच्छा वैसे तो शहर में पुलिस नज़र आती ही नहीं है, ट्रैफिक पुलिस भी पेड़ के पीछे छुप कर शिकार करती है! लेकिन यहां का नज़ारा देखकर दिल घबराने लगा, चप्पे-चप्पे पर पुलिस देखकर पेट में घुड़घुड़ाहट होने लगी! कहीं फिर से शहर में कोई आतंकवादी हमला तो नहीं हो गया है? फिर दिमाग ने थोड़ी मेहनत करके सुझाया कि झगड़े होने का खतरा लगता है! "हंस क्यों रहे हो? कभी-कभी अपना दिमाग़ भी मेहनत कर लेता है यार! अब इसमें कोई कूडा़ थोड़े ही भरा है?" कूड़े से सड़क पर ध्यान गया और उछल कर सर ऑटो की छत पर जा लगा! यह क्या? कहीं दूर-दूर तक कूडे का नामोनिशान तक नहीं है। हमारा नगर निगम और इतनी सफाई! ऊपर से सड़क पर इतनी कम भीड़ कि चलने का मज़ा ही किरकिरा हो जाए! गाड़ियों के हार्न से मनोरंजन के इतने आदि हो चुके हैं कि संगीत की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती। लेकिन ना जाने क्यों शोर बिलकुल नहीं है? लाल बत्ती तक पर आज किसी को पहले भागने की जल्दी नहीं है। कितनी जिंदादिल थी दिल्ली? कुछ तो जोश में हरी बत्ती हुए बिना ही निकल जाते हैं, लेकिन लोगों में जोश गायब है, आज दिल्ली में कितना नीरसपन है? दिल्ली पहले कितनी हंसीन थी!

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राष्ट्रमंडल खेल

शर्म का समय                                    या                                 गर्व का समय


मेहमान घर पर हैं...
और हम अपने घर का रोना
दुसरो के सामने रो रहे हैं
वह हमारे रोने पर हंस रहे हैं और
हम उनके हंसने पर खुश हो रहे हैं...


लड़ते तो हम हमेशा से आएं हैं
लेकिन समय हमेशा के लिए हमारे पास है
गलत बातों के विरुद्ध लड़ने के
नैतिक अधिकार की भी आस है

लेकिन.......
हमें फिर भी लड़ने की जल्द बाज़ी है,
क्योंकि मेहमान हमारे घर पर हैं
हमें बदनाम करने पर वह राज़ी हैं

सारा का सारा देश राजनीति का मारा है
'अभी नहीं तो कभी नहीं' हमारा नारा है

देश का क्या है?
जब पहले नहीं सोचा
तो अब ही क्यों?

 जय हो!





एक नज़र यहाँ भी: राष्ट्रमंडल खेलों के स्थल की तस्वीरें

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मंदिर-मस्जिद बहुत बनाया


मंदिर-मस्जिद बहुत बनाया, आओ मिलकर देश बनाएँ
हर मज़हब को बहुत सजाया, आओ मिलकर देश 
सजाएँ


मंदिर-मस्जिद के झगड़ों ने लाखों दिल घायल कर डाले
अपने ख़ुद को बहुत हंसाया, आओ मिलकर देश हसाएँ

मालिक, खालिक, दाता है वो, सदा रहे मन-मंदिर में
उसका घर है बसा बसाया, आओ मिलकर देश बसाएँ

गाँव, खेत, खलिहान उजड़ते, आँखे पर किसकी नम है
इतना प्यारा देश हमारा, आओ मिलकर देश चलाएँ

अपने घर का शोर मचाया, दुनिया के दिखलाने को
अपने घर को बहुत दिखाया, आओ मिलकर देश दिखाएँ

नफरत के तूफ़ान उड़ा कर, देख चुके हैं जग वाले
प्रेम से कोई पार न पाया, आओ मिलकर प्रेम बढाएँ

मंदिर-मस्जिद पर मत बाँटो, हर इसाँ को जीने दो
भारत की गलियों में 'साहिल', चलो ख़ुशी के दीप जलाएँ

- शाहनवाज़ 'साहिल'



Keyword: bharat, india, mandir, masjid, friendship, love, war

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व्यंग्य: निगम की तर्ज़ पर सफाई

अपने एक मित्र के घर जाना हुआ, घर की साफ-सफाई देखकर दिल खुश हो गया। फोन पर बात करते हुए एक कोने में गया तो देखा परदे के पीछे कूड़ा भरा हुआ था। मतलब मेहमान की आमद पर कूड़े-करकट को छुपाया गया था। देखकर अहसास हुआ कि यह तो हमारे नगर निगम की नकल है! हमारी कॉलोनी में भी तो ठीक इसी तरह सफाई रहती है, लेकिन सड़क पर एक बड़ा सा बदबूदार कूड़ादान बनाया हुआ है। मज़े की बात तो यह है कि कूड़ा कू़ड़ेदान की जगह सड़क पर भरा रहता है। ज़रा सोचिए सड़क को खाली रखने के लिए क्या बेहतरीन योजना बनाई गई है। सड़क गंदी होगी तो लोग सड़क पर से गुज़रेंगे ही नहीं।

वैसे हमारा नगर निगम जीव-जन्तुओं का भी भरपूर ख्याल रखता है। अब अगर कूड़ेदान नहीं होंगे तो मच्छर-मक्खियों का क्या होगा? पता नहीं जानवरों के हक़ में लड़ाई लड़ने वाले संगठन इनके योगदान को कैसे भूल जाते हैं। मेरे विचार से तो नगर निगम को इसके योगदान के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए। अब बरसात के दिनों में अगर यह लोग कूड़ेदान के पास पानी की निकासी का बंदोबस्त कर देते तो बेचारे मच्छर-मक्खियों जैसे जीवों का क्या होता? कितने जीव पैदा होने से रह जाते। कुदरत की जीवन प्रक्रिया में कितना योगदान देते हैं यह लोग। लेकिन अहसान फरामोश जनता इनके अहसान को ज़रा से 'लालच' में अनदेखा कर देती है, अपने जीवन से प्रेम 'लालच' ही तो है! अगर नगर निगम के अधिकारी शहर पर यह अहसान ना करें तो बेचारे मच्छर पैदा ही नहीं हो पाएंगे और अगर मच्छर ही पैदा नहीं होंगे तो डेंगू-मलेरिया जैसी बिमारियां कैसे फैलाएंगे? किसी ने सोचा है कि अगर यह बिमारियां नहीं फैलेंगी तो सरकारी अस्पतालों को काम कैसे मिलेगा? बेचारे डॉक्टर बिना प्रेक्टिस के इलाज करना ही भूल जाएंगे, और उनके साथ-साथ गरीब कर्मचारियों की भी उपर की कमाई जाएगी सो अलग! सबसे बड़ी बात तो यह कि इन बीमारियों से कितने ही गरीब लोग स्वर्ग सिधार जाते हैं। एक तो उन्हें इस नर्क रूपी जीवन से छुटकारा मिल जाता है, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या वृद्धि पर भी रोक लग जाती है। सरकार कितना पैसा खर्च करती है जनसंख्या वृद्धि को रोकने में, परिवार नियोजन और ना जाने क्या-क्या? लेकिन नगर निगम को भूल जाते है! अब उन्हें कौन समझाए कि हमारा नगर निगम कितनी आसानी से हर साल पुरी दक्षता के साथ अपना यह कर्तव्य निभाता है।

उपर से कॉमनवेल्थ खेल होने वाले हैं, अब देखिए बेचारे लगे हुए हैं सफाई करने। आपको मालूम है विदेशी मीडिया कितनी खुश है? कहा जा रहा है कि देखो भारतीय कितने मेहनती है, आखिर समय तक मेहनत कर रहे हैं। अब अगर कर्मचारी पहले से ही सारा कूड़ा साफ कर देते तो यह नाम कैसे होता? पहले मच्छर-मक्खी पैदा किए हैं तभी तो उनको समाप्त करने का कार्य मिला है ना? अब डिर्पाटमेंट का नाम रौशन करना इतना आसान होता है क्या? अब तो आप को विश्वास हुआ कि मेरी नगर निगम को अवार्ड वाली मांग कितनी जायज़ है?

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

(दैनिक हरिभूमि के आज [20 सितम्बर] के संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर मेरा व्यंग्य)

Keyword: Vyangy, Hindi Critics, Nagar Nigam, Muncipal Corporation

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व्यंग्य: युवराज और विपक्ष का नाटक

हमारे युवराज जब भी गरीबों की बस्तियों में रात गुजारते हैं, तो विपक्ष बेचारे युवराज के पीछे पड़ जाता है और उनकी कुर्बानी को नाटक करार दे दिया जाता है. अब आप ही बताइए, किसी गरीब के घर पचास बार चैक करके बनाई गई दाल-रोटी खाना क्या किसी कुर्बानी से कम है? युवराज अगर महाराज बनने से पहले अपनी प्रजा की नब्ज़ को पहचानना चाहे तो क्या कोई बुराई है? अगर आज युवराज गरीबों की परेशानियों को जानेगे नहीं तो कल कैसे पता चलेगा कि आखिर गरीब लोग कितनी परेशानी झेल सकते हैं! (परेशानियाँ झेलने वाले की हिम्मत के अनुसार ही तो डालनी पड़ती हैं.) मेरे विचार से तो यह कोर्स हर उभरते हुए नेता को करना चाहिए. अरे! बुज़ुर्ग नेताओं को क्या आवश्यकता है? तजुर्बेकार नेतागण तो पहले ही खून चूसने में माहिर होते हैं! 

वैसे भी आज युवराज के पास समय है, तो समय के सदुपयोग पर इतना हो-हल्ला क्यों हो भला? यह सब आज नहीं करेंगे तो क्या कल करेंगे? कल जब महाराज बन जाएँगे तो फिर गरीब लोगों के लिए समय किसके पास होगा? फिर भला कैसे पता होगा कि कल्लू को अच्छे खाने की ज़रूरत ही नहीं है, वह बेचारा तो पतली दाल में भी बहुत खुश है.

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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भूकंप की अफवाह!

कल रात भर उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा तथा आस-पास के क्षेत्रों में भूकंप की ज़बरदस्त अफवाह उडती रही. डर का आलम यह था कि इन क्षेत्रों के सभी निवासी रातभर अपने-अपने घरों से बाहर रहे और भूकंप के संभावित खतरे की खबर अपने जान-पहचान के लोगो तक पहुँचाने में लगे रहे. हम अपने घर पर सोये हुए थे, तभी रात को 2 बजे की आस-पास आए एक फ़ोन ने नींद उड़ा दी. उधर से बताया गया कि 3.30 पर भूकंप आने वाला है. अब एक ब्लॉगर होने के नाते दिमाग चलाना हमारा कर्तव्य बनता है, सो मैंने श्रीमती जी से कहा कि यार ऐसा कौन है जो भूकंप की पहले ही सूचना पहुंचा रहा है? उठने का बिलकुल मूंड नहीं था, पत्नी बोली "भूकंप आने वाला है और एक आप हैं कि सो रहे हैं, चलिए जल्दी से घर वालों को बताते हैं". इतनी देर में फ़ोन की घंटी लगातार खनखनाने लगी. हर कोई अधिक से अधिक लोगों को आने वाले खतरे के बारे में बताने के लिए आतुर था. पता चला कि पूरा क्षेत्र अपने घरों से बहर निकला हुआ है, धार्मिक स्थलों से लोगों को आगाह करने के लिए लाउडिसपीकर से बताया जा रहा था.

अब तक नींद तो उड़ ही चुकी थी, इसलिए सोचा ब्लॉग जगत में देखते हैं. देश में सबसे जागरूक ब्लॉगर ही होते हैं! [:-)] लेकिन चिटठा जगत पर एक भी पोस्ट भूकंप से सम्बंधित नहीं थी. जब कुछ नहीं मिला तो नवभारत टाइम्स और आजतक जैसी वेबसाइट खंगाली. यहाँ तक कि गूगल बाबा पर भी खोजने की कोशिश की, भूकंप विभाग की साईट पर भी देखा, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला. अब खीज बढ़ रही थी, सुबह-सुबह ऑफिस के निलना होता है और इस भूकंप के खतरे ने नींद उड़ा दी थी. इसलिए दुबारा वहीँ फ़ोन कर के मालूम किया कि आखिर उन्हें किसने बताया कि भूकंप आने वाला है, लेकिन वहां भी किसी को खबर नहीं थी कि यह खबर आखिर किसने दी. हर कोई यही कह रहा था, कि उनको किसी रिश्तेदार अथवा जान-पहचान वाले  ने बताया और वह स:परिवार डर के मारे घर से बाहर निकल आए.

अब तक रात के 3.15 बज चुके थे, पत्नी ने कहा परेशान क्यों हो रहे हैं, 3.30 होने वाले हैं, 15 मिनट ही तो इंतज़ार करना है, परिवार के साथ घर के बाहर चलते हैं. मेरे गुस्से का परा चढ़ चूका था, अब 15 मिनट तो क्या एक मिनट भी इंतज़ार नहीं कर सकता था. पत्नी से कहा सो जाओ और स्वयं भी चादर तान कर सो गया. सुबह उठकर देखा कि खुदा का शुक्र है सब-कुछ ठीक-ठाक है. अब तो पत्नी भी मान गई थी कि वाकई यह भूकंप की अफवाह भर थी [:-)]. लेकिन बेचारे मुरादाबाद और आस-पास के क्षेत्र के लोग, रात भर जिस डर से जागते रहे, वह एक झूटी अफवाह भर निकली! क्या मिलता है किसी को अफवाह फैला कर?

लोगो को भी चाहिए कि अगर कोई खबर पता चले तो सबसे पहले उसकी छानबीन करें तभी दूसरों तक पहुँचाएँ, वर्ना यूँ ही अफवाह फैलती आईं हैं और फैलती रहेंगी.

- शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords: Earthquake, moradabad, rampur, amroha, भूकंप, ज़लज़ला, हाल्ला

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आपकी आँखों से आंसू बह गए


आपकी आँखों से आंसू बह गए,
हर इक लम्हे की कहानी कह गए।

मेरे वादे पर था एतमाद तुम्हे,
और सितम दुनिया का सारा सह गए।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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ईद मुबारक!

सभी मित्रों एवं शुभचिंतकों को ईद की बहुत-बहुत मुबारकबाद। अल्लाह से दुआ है कि यह ईद ना केवल हिंदुस्तान में बल्कि पूरे आलम में चैन-अमन एवं खुशियां लेकर आए....... आमीन!

वैसे तो ईद का मतलब त्यौहार होता है और इस लिहाज़ से हर त्यौहार ईद ही कहलाएगा। चाहे वह यौम-ए-आज़ादी (स्वतत्रंता दिवस) हो अथवा दीपावली। मतलब अरबी में दीपों के त्यौहार को ईद-उल-दिवाली कहा जाएगा!

इस  ईद है इसका नाम है ईद-उल-फित्र, यानी रमज़ान के पवित्र महीने के सभी रोज़े रखने की ख़ुशी मानाने  का त्यौहार। यह ईद माह-ए-रमज़ान के बाद आती है और रोज़ेदारो के लिए तोहफा होती है। रमज़ान के महीने में रोज़े रखे जाते हैं जिनके द्वारा धैर्य, विन्रमता और अध्यात्म को आत्मसात किया जाता है।

रोज़े रखने के मक़सदों में से एक अहम मकसद ज़कात की अदायगी भी है। हर मुसलमान को रमज़ान के महीनें में अपनी ज़कात का पूरा-पूरा हिसाब लगा कर उसे अदा करना होता है, जो कि कुल बचत की 2.5 प्रतिशत होती है। जब कोई रोज़ा रखता हैं तो और बातों के साथ-साथ उसे भूख का भी अहसास होता है और साथ ही साथ अहसास होता है कि जो लोग भूखे-प्यासे हैं, अपनी बचत में से उन तक उनका हक यानि ज़कात पूरी-पूरी पहुचाई जाए। और इस अहसास के बाद यह आशा की जाती है कि सभी अपनी पूरी ज़कात अच्छी तरह से हिसाब लगा कर हकदारों तक पहुंचाएगा। अगर ज़कात बिना हिसाब-किताब के केवल अन्दाज़ा लगा कर ही दे दी गई तो ज़कात अदा नहीं होती है। वहीं अगर उसके हकदार यानि सही मायने में ज़रूरत मंद तक नहीं पहुंचाई गई और यूँ ही दिखावे करके मागने वालों को दे दी गई तब भी वह अदा नहीं होती है।

इसका मतलब यह हुआ कि बिना सोचे समझे ज़कात दे देने से फर्ज़ अता नहीं होता है। अगर किसी को अपनी कमाई में से हिस्सा दिया जाता है तो पूरी तरह छानबीन करके ही दिया जाना चाहिए। अक्सर लोग यतीम और गरीब बच्चों की पढ़ाई और पालन-पोषण में लगे मदरसों को ज़कात देना उचित समझते हैं। लेकिन वहां भी यह देखा जाना ज़रूरी है कि वहां पढ़ाई तथा रहन-सहन उचित तरीके से हो रहा हो। अर्थात पैसों का सदुपयोग सुनिश्चित होना आवश्यक है, वर्ना ज़कात अदा नहीं होगी और दुबारा देनी पड़ेगी।

ईद की खुशियां चांद देखकर मनाई जाने लगती हैं। ईद का चांद बेहद खूबसूरत और नाज़ूक होता है, तथा थोड़ी देर के लिए ही नमूदार (दिखाई) होता है। ईद के चांद और चांदरात पर तो शायरी की ढेरों किताबें लिखी गई हैं। इस दिन सभी लोग सुबह जल्दी उठ कर नहाने के बाद फज्र की नमाज़ अता करते हैं। क्योंकि यह दिन रमज़ान के महीने की समाप्ती पर आता है इसलिए इस दिन रोज़ा रखना मना होता है। इसलिए सुबह थोड़ा बहुत नाश्ता किया जाता है, इसमें सिवंईया, खजला, फैनी, शीर तथा खीर जैसे मीठे-मीठे पकवान बनाए जाते हैं। उसके बाद ईद की नमाज़ की तैयारी की जाती है। ईद की नमाज़ से पहले हर इन्सान का फितरा अता किया जाना आवश्यक होता है। फितरा एक तयशुदा रकम होती है जो कि गरीबों को दी जाती है। ईद की नमाज़ वाजिब होती है, अर्थात इसको छोड़ना गुनाह होता है। ईद की नमाज़ पूरी होने के बाद सिलसिला शुरू होता है एक-दुसरे से गले मिलने का, जो कि ख़ास तौर पर पुरे दिन चलता है और बदस्तूर पुरे साल जारी रहता है। और हाँ, घर पहुँच कर बच्चे ईदी के लिए झगड़ने लगते हैं, इस प्यार भरी तकरार के ज़रिये बच्चों को पैसे अथवा तोहफा के रूप में ईदी लेने में बड़ा मज़ा आता है। जब दोस्तों और रिश्तेदारों के घर जाते हैं तो वहां भी बच्चों को ईदी दी जाती है।

ईद खुशियां और भाईचारे का पैग़ाम लेकर आती है, इस दिन दुश्मनों को भी सलाम किया जाता है यानि सलामती की दुआ दी जाती है और प्यार से गले मिलकर गिले-शिकवे दूर किए जाते हैं।

ब्लॉग जगत के सभी लेखकों, टिप्पणीकारों तथा पाठकों को ईद-उल-फित्र की दिल से मुबारकबाद!

- शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords: Eid Mubarak, Festival, Eid Greetings

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कैसी कैसी फितरत!

इस धरती पर हर एक की अपनी अलग फितरत होती है, ज़रा देखते हैं कि किसकी कैसी फितरत है?



लड़के (नर्क में): यार यमराज की लड़की क्या माल है बाप! चलती है तो लगता है फूल गिर रहे हैं। नर्क के सारे लड़के उसके ही पीछे है, एक बार बात करने का मौका मिल जाए!
(संदेशः छिछौरे नर्क में भी छिछौरे ही रहते हैं!)



लड़कियां (स्वर्ग में): इस अप्सरा की नेल पाॅलिश क्या टैकी है यार और वोह ड्रेस देखी उसकी! यह इतनी पतली कैसे है? मैं तो डाईटिंग कर-कर के थक गई, फिर भी वेट (वज़न) कम ही नहीं होता।
(संदेशः यहां भी दूसरी से जलन)


अधेड़ उम्र के साथी (नर्क में): अरे भाई, कल पड़ोस के आग के पार्क में सुबह-सुबह जौगिंग कर रहा था, (बाई आंख मारते हुए) वोह लल्लन की छोरी आग में भी गुलज़ार लग रही थी।
दूसराः तो कुछ बात-वात की?
पहलाः अरे मिंया अब इतनी उम्र कहाँ कि उस नवयौवना का पीछे कर पाते, आंखो से ही दूर तक छोड़ आए।
(संदेशः इस उम्र में भी....!)





बहु (स्वर्ग में): हे प्रभु! मेरी सास मुझे दिन-रात सताती है, उसे यहां क्यों रखा है? काश! यह नर्क में चली जाए, हम साथ-साथ नहीं रह सकते हैं।
(संदेशः हमेंशा ही अलग रहने की सोच, चाहे सास जाए भाड मे!)

स्वर्ग में है इसलिए इसकी मनोकामना क़ुबूल हो गई. उसकी विश कुबूल होने के बाद।
सास (नर्क में): प्रभु! नर्क में बहुत तकलीफ है, मेरी बहु अगर मेरी सेवा करती तो अच्छा था। मेरा उसके बिना दिल नहीं लगता है, उसे भी मेरे पास भेज दीजिए।
(संदेशः मतलब अपना भला हो ना हो, लेकिन बहु का बुरा अवश्य होना चाहिए।)


बाप और बेटा (धरती पर): प्रभु हमें कहां छोड़ दिया? वोह दोनों चाहे जैसी भी थी, लेकिन............. नौटंकी के बिना अब तो खाना भी हज़म नहीं होता है! प्लीज़ हमें भी उनके पास भेज दीजिये!
===> यह बेचारे वोह प्राणी है कि प्रभु ने भी सोचा कि इनका अकेला रहना ही बेहतर है। लेकिन अकेले रहना इनके बस का कहाँ है???
(संदेशः यह वोह खरबूज़े हैं जिन्हें हर हाल में कटना ही कटना है! मतलब एक का पक्ष लिया तो दूसरी नाराज़)




बाप बेटे से (परलोक में): बेटा यह चाहे परलोक ही क्यों ना हो लेकिन महिलाएँ, यहाँ भी महिलाएँ ही हैं। माँ और पत्नी में से कभी किसी एक का पक्ष मत लेना, मगर किसी एक के सामने हमेशा उसका ही पक्ष लेना! और हाँ कभी भूल कर भी पत्नी के सामने अप्सराओं को मत घूरना, वर्ना जीते जी धरती सिधार जाओगे!





वैसे मर्द, मर्द ही होते हैं, यकीन नहीं आता है तो यह देखो.........
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Keywords: Hindi Critics, फितरत

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