ग़ज़ल: प्यार की है फिर ज़रूरत दरमियाँ

  • by
  • Shah Nawaz
  • प्यार की है फिर ज़रूरत दरमियाँ 
    हर तरफ हैं नफरतों की आँधियाँ 

    नफरतों में बांटकर हमको यहाँ 
    ख़ुद वो पाते जा रहे हैं कुर्सियाँ 

    खुलके वो तो जी रहे हैं ज़िन्दगी 
    नफ़रतें हैं बस हमारे दरमियाँ 

    जबसे देखा है उन्हें सजते हुए 
    गिर रहीं हैं दिल पे मेरे बिजलियाँ 

    और मैं किसको बताओ क्या कहूँ 
    सबसे ज़्यादा हैं मुझी में खामियाँ 

    आंखें, चेहरा सब बयाँ कर देते हैं 
    इश्क़ को समझों नहीं तुम बेजुबाँ 

    जब मुहब्बत का तेरा दावा है तो 
    घूमता है होके फिर क्यों बदगुमाँ 

    जो मेरा है वो ही तेरा है अगर 
    किसको देता है बता फिर धमकियाँ 

    - शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल' 

    बहर: बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़ 
    अरकान: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन 
    वज़्न: 2122 - 2122 - 212 

    Read More...

    ग़ज़ल: जिनके लिए लड़ती है उनकी माँ की दुआएँ

  • by
  • Shah Nawaz
  • उल्फत में इस तरह से निखर जाएंगे एक दिन
    हम तेरी मौहब्बत में संवर जाएंगे एक दिन
    एक तेरा सहारा ही बहुत है मेरे लिए
    वर्ना तो मोतियों से बिखर जाएंगे एक दिन
    हमने बना लिया है मुश्किलों को ही मंज़िल
    यूँ ग़म की हर गली से गुज़र जाएंगे एक दिन
    जिनके लिए लड़ती है उनकी माँ की दुआएँ
    दुनिया भी डुबोये तो उभर जाएंगे एक दिन
    यह दिल रहेगा आशना तब तक ही बसर है
    वर्ना तेरे शहर से निकल जाएंगे एक दिन
    - शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'

    (बहर: हज़ज मुसम्मिन अख़रब मक़फूफ महज़ूफ)

    Read More...

    दिल्ली की जनता के अधिकार और वोट की कीमत आधी क्यों?

  • by
  • Shah Nawaz
  • कोई सरकार सिर्फ किसी पार्टी की सरकार भर नहीं होती है बल्कि जनता की प्रतिनिधि होती है और वह अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्षेत्र में काम करती है, उसी के अनुरूप जनता में उसकी जवाबदेही तय होती है और उसी जवाबदेही के अनुसार किये गए कार्यों को लेकर अगले चुनाव में सरकार से संबधित पार्टी मैदान में उतरती है।   इसलिए लोकतंत्र का तकाज़ा यह है कि हर सरकार को उससे सम्बंधित कार्यक्षेत्र में कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो, यही जनतंत्र अर्थात जनता का शासन कहलता है।

    केंद्र सरकार ने तानाशाही दिखाते हुए दिल्ली सरकार के अधिकारों को समाप्त किया:

    केंद्र सरकार ने  दिल्ली सरकार की राह में रोड़ा अटकाने की, कार्यों को रोकने की हर संभव कोशिश की। दिल्ली सरकार से सर्विस मैटर और एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) को छीन लिया गया, जिसका मतलब यह हुआ कि अगर दिल्ली सरकार किसी काम को करती है तो उसके लिए अपनी पसंद के अधिकारी अपॉइंट नहीं कर सकती है। अगर अधिकारी काम करने में ढील बरते, काम नहीं करे तो उसके खिलाफ एक्शन नहीं ले सकती है और अगर कोई अधिकारी दिल्ली सरकार के काम करने में रिश्वत लेता है तो उसके खिलाफ जाँच और कार्यवाही नहीं कर सकती है। क्या इस तरह कोई सरकार काम कर सकती है?

    सरकारी अधिकारी अगर सरकार की जगह विपक्षी पार्टी के अधीन होंगे तो जनता के काम कैसे होंगे:

    सोचिये अगर किसी कॉलोनी में गन्दा पानी आ रहा है और अधिकारी इस समस्या पर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो मुख्यमंत्री तक को यह पावर नहीं है कि अधिकारी के विरुद्ध एक्शन ले सके, जबकि जल बोर्ड दिल्ली सरकार के अधीन आता है। अगर सरकार को अपने अधीन आने वाले कार्यक्षेत्र में भी काम नहीं करने वाले या रिश्वत लेकर काम बिगाड़ने वाले सरकारी अधिकारियों पर कार्यवाही करने का अधिकार नहीं होगा तो जनता के काम कैसे होंगे? और फिर यह जनता का राज कहाँ से हुआ?

    आप स्वयं विचार करिये कि उन अधिकारीयों/कर्मचारियों को नियुक्त करने का, काम नहीं करने या फिर रिश्वत लेकर काम खराब करने पर जांच करने का, एक्शन लेने का, अधिकार अगर जनता के द्वारा चुने जान प्रतिनिधियों की जगह विपक्षी पार्टी के पास हुआ तो फिर क्या जनता के मत का अपमान नहीं हुआ? और विपक्षी क्यों चाहेगा कि सरकार सही से काम करे? आखिर दिल्ली में यह नियम किस लॉजिक से बनाया गया है?

    स्टाफ नियुक्त नहीं होने के कारण मौहल्ला क्लिनिक, हॉस्पिटल्स, स्कूलों सहित सभी विभागों में काम बाधित:

    आज दिल्ली सरकार के 7०% से ज़्यादा पद खाली पड़ें हैं, अगर यह पद भर जाते हैं तो कई लाख लोगो को रोज़गार मिल सकता है और दिल्ली सरकार के कामों में कई गुना तेज़ी आ सकती है। पर नौकरियां भरने का अधिकार विपक्षी पार्टी को है और यही वजह है कि सरकार के हर डिपार्टमेंट में पद खाली हैं, काम बेहद धीमा है। कई मोहल्ला क्लिनिक बनकर कई महीनों से धूल चाट रहे हैं, कई स्कूलों में टीचर कम होने की वजह से पढ़ाई बाधित है, कई हॉस्पिटल्स में स्टाफ कम होने की वजह से मरीज़ों का नुकसान हो रहा है, इसकी जवाबदेही किसकी है?

    सरकार को नीचा दिखाने के लिए बिना सबूत के गिरफ्तारियाँ और सीबीआई रेड की गईं:

    दिल्ली की जनता द्वारा चुने गए 25 से ज़्यादा विधायकों को बिना किसी सबूत के सड़क से उठाकर जेल में डाल दिया, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों पर सीबीआई रेड डलवाकर खुलेआम जनता द्वारा चुनी गई सरकार की बेइज़्ज़ती की गई, पर इसके बावजूद उनके ख़िलाफ़ कोई एक भी सबूत नहीं मिला। गोदी मीडिया द्वारा खूब जमकर ज़हर उगला गया, किसी भी विज़िबल सबूत के ना होने के बावजूद दोषारोपण ऐसे किया गया जैसे दोष साबित हो गया हो, पर हर बार अदालत में आरोपों के झूठा पाए जाने पर मीडिया को साँप सूंघ गया! उसने फिर एक भी स्टोरी नहीं चलाई और ना ही अपनी गलती स्वीकार की।

    चुनी गई सरकार के कार्यों को को नियुक्त किये गए LG के माध्यम से रोका गया:

    केंद्र सरकार द्वारा LG के माध्यम से दिल्ली की जनता के हर बिल को अटकाया गया, जाँच के नाम पर कई महीने तक दिल्ली सरकार की सारी फाइलें उठाकर दिल्ली के हर काम को रोक दिया गया। यह तो शुक्र है अदालत का जहाँ से न्याय मिला। विधायक बरी हुए और LG के नाम पर केंद्र की दादागिरी काफी हद तक ख़त्म हुई। यह तो सिर्फ दिल्ली की झलक है, देश में जो तानाशाही की गई, वोह तो इससे भी कहीं ज़्यादा बड़ी है।

    फिर भी भाजपा समर्थक पूछते हैं कि तानाशाही कहाँ है? यह किस मुँह से केजरीवाल के इस तानाशाही को ख़त्म करने के विरुद्ध किये जा रहे संघर्ष पर सवाल उठा रहे हैं?

    विपक्षी पार्टियों और करप्शन पर आम आदमी पार्टी का रुख:

    अरविंद केजरीवाल ने कभी नहीं कहा कि कांग्रेस, भाजपा सहित सारी पार्टियों के सभी नेता करप्ट हैं। उन्होंने हमेशा कहा कि जिस भी नेता के विरुद्ध विज़िबल सबूत सामने आए हैं, उनकी लोकपाल जैसी संस्था से निष्पक्ष जाँच कराई जाए और तब तक सरकारी पद से ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी द्वारा भी निलंबित किया जाए। आरोप साबित होने पर सख़्त से सख़्त सज़ा दी जानी चाहिए, या फिर बरी होने पर ही सरकारी या पार्टी पद पर वापिस लिया जाना चाहिए।

    आम आदमी पार्टी ने अपने मंत्रियों के विरुद्ध भी विज़िबल सबूत सामने आने पर तुरंत कार्यवाही की थी, करप्शन ही नहीं बल्कि कैरेक्टर लेस होने के विज़िबल सबूत सामने आने पर तुरंत ही मंत्रिपद ही नहीं बल्कि पार्टी से भी निलंबित किया था, वहीँ एक पूर्व मंत्री को सीबीआई द्वारा जाँच में बरी होने पर ही पार्टी निलंबन ख़त्म किया है।

    पर करप्शन खतरनाक होने के बावजूद ऐसा मुद्दा है जो देश से बड़ा नहीं है, अगर देश में लोकतंत्र समाप्त करने, संविधान को ख़त्म करने, संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाने की कोशिशें होती हैं, देश को नफरत के नाम पर बाँटने की कोशिश होती है, तो देश के हर व्यक्ति और हर पार्टी का फर्ज है कि देश को बचाने की मुहिम में शामिल हो। उनमें से अगर कोई करप्ट भी होगा तो अगर संविधान बचेगा, लोकतंत्र बचेगा तो लोकपाल जैसी निष्पक्ष संस्था बनाकर, सख़्त नियम कानून और फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट बनाकर, उन्हें सज़ा दी जा सकती है।

    करप्शन ख़त्म किया जा सकता है, दिल्ली सरकार ने तो बिना एसीबी जैसी किसी भी जांच एजेंसी के भी ऑटोप्रोसेस, डोर स्टेप डिलीवरी जैसी इनोवेटिव योजनाओं के द्वारा करप्शन पर रोक लगाई है, जबकि दिल्ली के सभी अधिकारियों की रिपोर्टिंग LG को कर दी गई थी।


    Keywords: Aam Aadmi Party, AAP, Arvind Kejriwal, BJP, Delhi Governance, Delhi Government, Delhi Sarkar, Modi Sarkar, Narendra Modi, PM Modi, Delhi Politics, Delhi School Revolution, Delhi Heal Revolution, Delhi Government vs Central Government, Full Statehood, Purna Rajya

    Read More...

    नफरत की राजनीति और उसका परिणाम?

  • by
  • Shah Nawaz
  • कल फिर बुलंदशहर में दो लोगों को नफरत की इस राजनीति ने लील लिया, केवल शक के कारण बवाल हुआ, भीड़ में खुद से सज़ा देने की मानसिकता को भरा गया, जिसका हर्जाना दो लोगो को अपनी जान की कुर्बानी देकर चुकाना पड़ा।

    नफरत की राजनीति का मकसद यह होता है कि लोगों को आपस में दो जगह बाँट दिया जाए। उनके सोचने की ताकत को खत्म कर दिया जाए उनके अंदर इतनी नफरत भर दी जाए कि वह कत्ल जैसे संगीन क्राइम में भी अपना पराया देखने लगे। अगर कहीं कोई हादसा होता है, या कहीं एक्सीडेंट होता है तो एक आम इंसान का क्या कर्तव्य होता है, वह फौरन घायलों की मदद करता है। पर जब समाज के अंदर नफरत पैदा हो जाती है तो ऐसे हादसों में भी सबसे पहले यह देखा जाने लगता हैं कि घायल हिंदू है या मुसलमान है। जब हमारे अंदर यह सोच पैदा होने लगे तो हमें विचार करना पड़ेगा, क्योंकि हमारे अंदर से इंसानियत खत्म होती जा रही है और इंसानियत को खत्म किया जा रहा है, हमारे अंदर जहर भरा जा रहा है।
    अगर आप नफरत की राजनीति करने वालों की गतिविधियों पर ध्यान देंगे तो आपको पता चलेगा कि यह लोग धार्मिक नहीं है बल्कि यह धार्मिक कट्टरता को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाले लोग हैं। अगर आप बड़े परिपेक्ष में देखेंगे तो इसके पीछे आर्थिक वजह होती हैं जिससे कि समाज के ऊपर अपना अधिपत्य जमाया जा सके और इसके पीछे की असल वजह यह है कि करप्शन आसानी के साथ किया जा सके। लोग उनकी कट्टरता पर चर्चा करेंगे, या फिर उनकी नफरत की बातों के खिलाफ होंगे, या नफरत भरी बातों में आकर उनके समर्थक होंगे, लेकिन कोई भी उनके करप्शन पर बात नहीं कर रहा होगा। यही वह चाहते हैं और यह काम पूरी तैयारी के साथ होता है।
    यह लोग अपने समर्थकों को अंधभक्त इसलिए बनाते हैं जिससे कि अगर उनका करप्शन सामने आ भी जाए तो लोग उस पर विश्वास नहीं करें। ऐसे अंधभक्त अक्सर स्वभाव से कट्टरपंथी होते हैं, कट्टरपंथी होने का मतलब यह है कि धर्म या विचार के मामले में यह लोग सोचते हैं कि उनकी राय ही सर्वोपरि है और हर एक को उसी राय को हर हाल में मानना पड़ेगा। नफरत फैलाने वाले अक्सर ऐसी सोच वालों के दिमाग को अपना गुलाम बना लेते हैं। इस तरह की बातें फैलाई जाती हैं, झूठ को प्रपोगेट किया जाता है कि अंधभक्त या अंध समर्थक वही सोचते हैं जो कि नफरत की राजनीति करने वाले चाहते हैं।
    आज हमारे समाज को कट्टरपंथ की जगह उदारवाद की जरूरत है, परेशानी का सबब यह है कि देश के 80 परसेंट उदारवादियों की आवाज केवल 20% कट्टरपंथियों की तेज आवाज के सामने मध्यम हो जाती है। बल्कि यूं कहूं कि छुप जाती है। हमें शांतिपूर्ण तरीके से उस आवाज को सामने लाना होगा और आज वह मेहनत करनी होगी की उदारवाद की आवाज जन जन तक पहुंच सके। देश में बदलाव लाने के लिए यह बेहद जरूरी है, खासतौर पर आज के नौजवानों को यह प्रयास करना होगा कि नफरत की राजनीति के पीछे छुपे मकसद को समझ कर समाज में जागरूकता की कोशिश करें।
    अगर हमने आज कोशिश नहीं की तो हमारी आने वाली पुश्तें हमें माफ नहीं करेंगी। हमें आज यह तय करना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सशक्त हिंदुस्तान देना चाहते हैं या फिर नफरत और भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक कमजोर देश…
    हमें आज ही तय करना होगा इस नफरत की भेंट कोई जुनैद यह कोई अंकित सक्सेना फिर ना चढ़े। जरा सोचिए इन की मांओं ने कैसे पाल-पोसकर इन्हें बड़ा किया होगा, कैसे इनकी बहनों ने इनके नखरे उठाए होंगे, कैसे बाप ने इनके सुनहरे भविष्य के सपने देखे होंगे… और चंद पलों की नफरत ने इनसे सारे सपने छीन लिए। अगर हम आज चुप रहेंगे तो कल को माएँ बच्चे पैदा करते हुए इसलिए भी डरेगी कि कहीं यह भी नफरत के शिकार ना हो जाए, सोचिए और आवाज उठाइए।
    और हां समाज को याद रखना पड़ेगा कि यह लड़ाई इस देश के आम नागरिक को खुद लड़नी है। इस देश से नफरत मिटाने की लड़ाई… और यह मोहब्बतों को बांटकर और नफरतों की साजिश करने वालों को कमजोर करके ही लड़ी जा सकती है। हमें नफरत करने वालों को यह एहसास दिलाना पड़ेगा कि उनकी डाल अब नहीं गलेगी। क्या तैयार है? अगर हां तो आज ही प्रयास शुरु कीजिए, सबसे पहले तो अपने जानने वालों में से ऐसे लोगों को समझाना शुरू कीजिए जो कट्टरपंथ की राह में आगे बढ़ रहे हैं।
    जय हिंद!

    Read More...

    महिला अधिकारों का दमन क्यों होता है?

  • by
  • Shah Nawaz
  • महिला अधिकारों के हनन के अनेक कारण हो सकते हैं, पर मेरे हिसाब से महिलाओं में शिक्षा तथा आर्थिक सशक्तिकरण की कमी इसके प्रमुख कारण हैं और इनसे भी बड़ा एक वजह है पौरुषीय दंभ। आइये इसी पर चर्चा करते हैं।



    शिक्षा के साथ साथ महिलाओं के अधिकारों के दमन में आर्थिक सशक्तिकरण होना या नहीं होना भी एक महत्वपूर्ण कारक होता है। गरीब परिवारों में महिलाएं भी परिवार को चलाने के लिए उपलब्ध आय के स्रोतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अगर आप देखेंगे तो गरीब किसान परिवारों में महिलाएं फसलों की बुआई तथा कटाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, वहीं गरीब मज़दूर परिवारों में भी महिलाएँ मजदूरी करके परिवार चलाने में अपनी भूमिका निभाती हैं।

    वहीं दूसरी तरफ आर्थिक तौर पर मज़बूत अर्थात अमीर परिवारों में भी महिलाएं आर्थिक तौर पर सशक्त होती हैं। और यही कारण है कि गरीब तथा अमीर परिवारों में महिला अधिकारों का दमन उतने बड़े रूप में नहीं होता जितना कि मध्य आय वर्ग में होता है। मध्य आय वर्ग ही वोह समूह है जहाँ महिलाओं के अधिकारों का सबसे ज़्यादा दमन होता है।

    इसके अलावा हमारा सामाजिक तानाबाना भी महिला अधिकारों के दमन का जिम्मेदार होता है। एक लडकी अपने माता-पिता के घर मे पली-बढ़ी होती है, और एक कम्फर्ट लेवल का जीवन जी रही होती है, पर शादी के बाद उसे ऐसे घर मे जाना होता है, जिसके बारे में वोह ज़्यादा नहीं जानती। उसे वहाँ ऐसे परिवार के सदस्यों के साथ रहना होता है जो पहले से ही उस परिवार का हिस्सा होते हैं। ऐसे में नए घर के सदस्यों की सोच और नई बहु की सोच में बहुत बड़ा गैप आना स्वाभाविक है। नए परिवार में हर कोई दूसरों को अपने हिसाब से चलना चाहता है, यही घर के क्लेश की वजह भी बनती है और यहीं से महिला अधिकारों के दमनचक्र की शुरुआत भी हो सकती है।

    आज समाज को इस व्यवस्था का हल ढूंढना होगा। ऐसा क्यों होता है कि शादी के बाद लड़की ही अपना घर छोड़कर लड़के के घर जाकर रहे? क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि दोनों एक-दूसरे के घर-परिवार में जाकर रहने की जगह मिलकर एक तीसरा घर बसाएं। पर इस व्यवस्था में हमें लड़के और लड़की के बुजुर्ग माता-पाता के भरण-पोषण और बुढ़ापे में ज़रूरी केयर कैसे मिले, इसके ऊपर भी विचार करना पड़ेगा।

    Read More...

    देश का सबसे बड़े मुद्दा - हमारे न्यूज़ चैनल्स

  • by
  • Shah Nawaz

  • काफी दिनों से सैफ और करीना खासे परेशान चल रहे थे और उन की परेशानी का सबब था कि देश के इकलौते होनहार बालक तैमूर को पोटी नहीं आना, कई दिनों तक पूरा घर ही नहीं बल्कि पूरा देश परेशान था और देश के न्यूज़ चैनल इस बड़े हादसे को पल-पल कवर कर रहे थे, वोह हम तक यह खबर पहुंचाते रहे कि तैमूर इस वजह से दूध भी नहं पी रहे हैं, जब भी तैमूर को टॉयलेट की तरफ ले जाया जाता था तो हमारे न्यूज़ चैनल चौकस होकर खुशखबरी का घंटो एहसास दिलाते रहते थे, हालाँकि 2 दिन तक देश को मायूस होना पड़ा था, पर आखिरकार 2 दिन बाद तैमूर की पोटी आने की खुशखबरी को सबसे पहले सबसे तेज़ चैनल्स होने का दवा करने वाले न्यूज़ चैनल्स ने सबसे पहले हम तक पहुंचा दिया और देश ने चैन की सांस ली, हालाँकि उन दिनों १३ बैंकों में घोटाले की छोटी-मोती खबर भी यदा-कड़ा सुनाई पड़ी, पर इन छोटी-मोटी ख़बरों पर कौन घंटों बर्बाद करता है?

    हमारे न्यूज़ चैनल्स हमेशा देश से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं मसलन आईपीएल में कौन जीता, किस टीम ने कैसे पार्टी करी, सलमान खान गिरफ्तार होकर रातभर सो नहीं सके, उन्होंने दाल-रोटी नहीं खाई... और हाँ चैनल्स ने इतनी महत्वपूर्ण खबर को भी हम तक पहुँचाया कि उन्होंने पकोड़े खाए, सोचिये देश का कितना उद्धार हुआ होगा जब हमें यह पता चला कि उन्हें ज़मानत मिल गई और घर पहुंचकर वह अपने छत पर आकर फैंस से मिले और उन्हें देश को आगे ले जाने का सन्देश दिया। अगर न्यूज़ चैनल्स ने यह नहीं बताया होता तो आज देश कितना पीछे चला गया होता, इसका आपको अंदाज़ा भी नहीं है.

    अभी कल-परसों की बात है, जबकि कांग्रेस के नेता उपवास शुरू करने से पहले सरगी के तौर पर छोले-भठूरे खा रहे थे, आखिर देश के इतने बड़े नुकसान की खबर हमारे न्यूज़ चैनल्स कैसे छोड़ सकते थे, घंटों इस पर विमर्श हुआ, एक-एक छोले और भठूरे का हिसाब लिया गया, हालाँकि चैनल्स 1-2 मिनट के लिए यह भी दिखाया कि उत्तर प्रदेश में जिस युवती का बलात्कार हुआ था, उसे इंसाफ की जगह उसके पिता की हिरासत में हत्या कर दी गई, पर यह न्यूज़ इतने काम की नहीं थी, कौन सा यह हमारे साथ हो रहा था जो हम देखें, हमें क्या फर्क पड़ता है जो किसी को इन्साफ मिले या ना मिले, हमें तो अपना पिज़ा आधे घंटे में मिल जाता है और फिर जो कम्पनियाँ या फिर पार्टियां विज्ञापनों के लिए पैसा देती हैं उनके पक्ष में खबर दिखाना हमारे न्यूज़ चैनल्स का धर्म है, आपने वोह कहावत नहीं सुनी कि ग्राहक ही भगवन होता है.... देखा हमारे न्यूज़ चैनल्स अपनी कर्म के प्रति कितने सच्चे होते हैं? 


    Read More...

    यह तो है कि मैं यहाँ तन्हा नहीं : ग़ज़ल

  • by
  • Shah Nawaz
  • यह तो है कि मैं यहाँ तन्हा नहीं
    तुझसे भी तो पर कोई रिश्ता नहीं

    तिश्नगी तो है मयस्सर आपकी
    जुस्तजू दिल में मगर रखता नहीं

    साज़िशों से जिसकी हों ना यारियां
    आज कोई भी बशर मिलता नहीं

    नफरतें इस दौर का तोहफा हुईं
    दिल किसी का भी यहाँ दुखता नहीं

    बन गया है मुल्क का जो हुक्मरां 
    ज़ालिमों के साथ वो लड़ता नहीं

    इश्क़ जिससे हो गया इक बार जो
    रिश्ता दिल में फिर कभी मरता नहीं

    फूल के जैसा ही है मासूम यह 
    टूटा दिल भी फिर कभी जुड़ता नहीं

    खुद को हल्का रख गुनाहों से ज़रा
    तूफाँ में घर एक भी बचता नहीं

    - शाहनवाज़ 'साहिल'




    फ़िलबदीह-185(25-06-2016) साहित्य संगम में लिखी ग़ज़ल

    मात्रा:- 2122 2122 212
    बह्र :- बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
    अरकान :- फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
    काफ़िया :- बसता(आ स्वर)
    रदीफ़ :- नही
    क्वाफी (काफ़िया) के उदआहरण
    तन्हा खिलता मिलता जलता सहता सस्ता मरता रिश्ता दिखता सकता चुभता मुड़ता कहता सस्ता रखता जँचता बेचा चलता जुड़ता रहता बचता भरता बहता लड़ता प्यारा धागा ज्यादा ताना साया भाया दाना वादा आदि । इसी प्रकार के अन्य शब्द जिनके अंत में " आ "स्वर आये।
    इसी बह्र पर गीत गुनगुना कर देखें⬇
    ➡ आप के पहलू मे आकर रो दिए
    ➡ दिल के अरमा आंसुओं मे बह गए

    Read More...

    ग़ज़ल: फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे

  • by
  • Shah Nawaz
  • मेरी यादों में आके क्या करोगे आस दिल में जगा के क्या करोगे ज़माने का बड़ा छोटा सा दिल है सबसे मिल के मिला के क्या करोगे अगर राहों में ही वीरानियाँ हों इतनी बातें बना के क्या करोगे नफरतें और बढ़ जाएंगी दिल में ऐसी बातों में आ के क्या करोगे जो दिल नाआशना ही हो चुके हों फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे - शाहनवाज़ 'साहिल'


    मात्रा:- 1222 1222 122
    बह्र :- बहरे हजज  मुसद्दस महजूफ
    अरकान :- मुफाईलुन मुफाइलुन फ़ऊलुन
    काफ़िया :- क्या(आ स्वर)
    रदीफ़ :- करोगे

    क्वाफी (काफ़िया) के उदाहरण :-
    जागा ऐसा तन्हा खिलता मिलता जलता सहता सस्ता मरता रिश्ता दिखता सकता चुभता मुड़ता कहता सस्ता रखता जचता बेचा चलता जुड़ता जचता रहता बचता भरता बहता कहता लड़ता प्यारा धागा ज्यादा ताना साया भाया दाना वादा आदि । इसी प्रकार के अन्य शब्द जिनके अंत में " आ "स्वर आये।

    इसी बह्र पर कुछ गीत:
    ➡अकेले हैं चले आओ जहां हो
    ➡ मैं तन्हा था मगर इतना नही था

    Read More...

    ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए - अदम गोंडवी

  • by
  • Shah Nawaz
  • आज के मौजूं पर अदम गोंडवी साहब की कुछ मेरी पसंदीदा ग़ज़लें:

    आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
    अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे
    तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
    आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे
    एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
    चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे

    - अदम गोंडवी


    हिन्‍दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
    अपनी कुरसी के लिए जज्‍बात को मत छेड़िए
    हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
    दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
    ग़र ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्‍मन का घर फिर क्‍यों जले
    ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
    हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
    मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
    छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
    दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए

    - अदम गोंडवी


    काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
    उतरा है रामराज विधायक निवास में
    पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
    इतना असर है खादी के उजले लिबास में
    आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
    जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
    पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
    संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
    जनता के पास एक ही चारा है बगावत
    यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

    - अदम गोंडवी

    Read More...

    Popular Posts of the Months

     
    Copyright (c) 2010. प्रेमरस All Rights Reserved.