पकड़ ले आइना हाथों में बस उनको दिखाता चल

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  • Shah Nawaz
  • हज़ारों साज़िशें कम हैं सियासत की अदावत की
    हर इक चेहरे के ऊपर से नकाबों को हटाता चल

    कभी सच को हरा पाई हैं क्या शैतान की चालें?
    पकड़ ले आइना हाथों में बस उनको दिखाता चल

    करो कुछ काम ऐसे भी अदावत 'इश्क़' हो जाएं
    रहे इंसानियत ज़िंदा, मुहब्बत को निभाता चल

    भले कैसा समाँ हो यह, बदल के रहने वाला है
    कभी मायूस मत होना, यूँही खुशियाँ लुटाता चल

    - शाहनवाज़ 'साहिल' 

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    मेरे वतन में तो 'मज़हब' हैं दोस्ती के लिए...

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  • Shah Nawaz
  • यह हमारा हिन्दोस्तां है, जहाँ मज़हब दोस्ती का सबब है, जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग साथ रहते हैं, खाते हैं, पढ़ते हैं और साथ ही अपनी-अपनी पूजा भी कर लेते हैं....

    हज़ारों साज़िशें कमतर हैं दुश्मनी के लिए
    मेरे वतन में तो 'मज़हब' हैं दोस्ती के लिए
    - शाहनवाज़ 'साहिल'


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    उन जवानों का कर्ज़ा चुकाएंगे कब?

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  • Shah Nawaz
  • सियाचिन ग्लैशियर में हिमस्खलन से हुई हमारे जवानों शहादत की खबर ग़मगीन कर गई! देश की हिफाज़त की ख़ातिर सरहदों पर लड़ने वाले हमारे जवानों की जज़्बे और शहादत को सलाम...


    हम यूँ आज़ादियों की हर इक जद में हैं
    क्योंकि क़ुर्बानियाँ उनके मक़सद में है

    उन जवानों का कर्ज़ा चुकाएंगे कब?
    जो हमारी हिफाज़त को सरहद पे हैं

    - शाहनवाज़ 'साहिल'

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    ग़ज़ल: सच अगर आया ज़ुबाँ पर फासला हो जाएगा

  • by
  • Shah Nawaz
  • यूँ ना देखो दुनियाभर में तब्सिरा हो जाएगा 
    फ़क़्त बस बैठे-बिठाए मसअला हो जाएगा 

    होंट हिलते ही नहीं हैं आप हो जब सामने
    आप ही कोशिश करो तो हौसला हो जाएगा 

    रेत पर बच्चे की मेहनत लहरों से टकरा गई
    पर 'घरौंदा' टुटा तो वो ग़मज़दा हो जाएगा 

    दिल अभी महफूज़ है महफ़िल के कारोबार से
    आप गर चाहेंगे तो यह मुब्तिला हो जाएगा 

    आ करूँ में आज तुझसे दिलरुबा यह फैसला
    और भी कुछ ना हुआ तो तजरुबा हो जाएगा 

    ग़ैर के तो ऐब हमने रात-दिन देखा किये
    अपने देखेंगे तो यह दिल आईना हो जाएगा 

    चापलूसी पर टिकें हैं 'साहिल' रिश्ते आज के
    सच अगर आया ज़ुबाँ पर फासला हो जाएगा 

    - शाहनवाज़ 'साहिल'

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    हर दिल लुभा रहा है, यह आशियाँ हमारा

  • by
  • Shah Nawaz
  • गणतंत्र दिवस पर आप सभी को ढेरों शुभकामनाएँ!

    हर दिल लुभा रहा है, यह आशियाँ हमारा
    हर शय से दिलनशी है, यह बागबाँ हमारा

    हर रंग-ओ-खुशबुओं से हर सूं सजा हुआ है
    गुलशन सा खिल रहा है, हिन्दोस्ताँ हमारा

    हो ताज-क़ुतुब-साँची, गांधी-अशोक-बुद्धा
    सारे जहाँ में रौशन हर इक निशाँ हमारा

    हिंदू हो या मुसलमाँ, सिख-पारसी-ईसाई
    यह रिश्ता-ए-मुहब्बत, है दरमियाँ हमारा

    सारे जहाँ में छाया जलवा मेरे वतन का
    हर दौर में रहा है, भारत जवाँ हमारा

    हमने सदा उठाया इंसानियत का परचम
    हरदम ऋणी रहा है, सारा जहाँ हमारा

    - शाहनवाज़ 'साहिल'

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    ग़ज़ल: मिलने-जुलने का ज़माना आ गया

  • by
  • Shah Nawaz
  • जब भी तेरा ज़िक्र महफिल में हुआ
    मिलने का दिल में बहाना आ गया

    उसने जो देखा हमें बेसाख़्ता
    मायूसी को मुस्कराना आ गया

    आप क्यों बैठे हैं ऐसे ग़मज़दा
    मिलने-जुलने का ज़माना आ गया

    उसने जो महफ़िल में की गुस्ताखियाँ
    हर इक को बातें बनाना आ गया

    हम ज़रा सा नर्म लहज़ा क्या हुए
    दुनिया को आँखे दिखाना आ गया

    अभी तो सोलह भी पूरे ना हुए
    आशिक़ों का दिल चुराना आ गया

    -शाहनवाज़ 'साहिल'

    फ़िलबदीह मुशायरा 042 में लिखी यह ग़ज़ल

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    ग़ज़ल: जो राहे ख़ुदा का निगहबान होगा

  • by
  • Shah Nawaz
  • जो राहे ख़ुदा का निगहबान होगा
    जहाँ में वही तो मुसलमान होगा

    समंदर की लहरे थमी थी जहाँ पर
    वहीँ से शुरू फिर से तूफ़ान होगा

    हर इक का जो दर्द समेटे हुए हो
    नहीं वोह कभी भी परेशान होगा

    किया ज़िन्दगी को जो रब के हवाले
    हर इक सांस फिर उसका मेहमान होगा

    जो दीदार को उसके तड़पेगा 'साहिल'
    वही उसके आँगन का मेहमान होगा

    - शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'



    शमीम अंसारी भाई ने मेरी इस ग़ज़ल को बहुत ही बेहतरीन अंदाज़ में अपनी आवाज़ दी है, आप भी सुनिए!


    जो राहे ख़ुदा का निगहबान होगाजहाँ में वही तो मुसलमान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘समंदर की लहरे थमी थी जहाँ परवहीँ से शुरू फिर से तूफ़ान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘हर इक का जो दर्द समेटे हुए होनहीं वो कभी भी परेशान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘किया ज़िन्दगी को जो रब के हवालेहर इक सांस फिर उसका मेहमान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘जो दीदार को उसके तड़पेगा 'साहिल'वही उसके आँगन का मेहमान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘लेखक ----- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘आवाज़ ----- शमीम अंसारी
    Posted by Mohammad Shamim Ansari on Thursday, January 21, 2016


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    पर्यावरण की रक्षा पर दिल्ली ने दम दिखलाया है...

  • by
  • Shah Nawaz
  • पर्यावरण की रक्षा पर
    दिल्ली ने दम दिखलाया है।
    बदलाव बड़ा लाने हेतु
    #OddEven अपनाया है।

    गर आज नहीं कोशिश होगी
    तो भविष्य तबाह हो जाएगा।
    आने वाली पीढ़ी को
    यह कर्ज़ा आज चुकाया है।

    जो कहते हैं कुछ नहीं होता,
    उन्हें दिल्ली राह दिखाएगी।
    आओ देखो दुनिया वालो
    बदलाव यहाँ पर आया है।

    सेहत वाली सांसों का
    सपना दिल्ली ने देखा है।
    प्रदुषण से बचने का
    अब गीत नया यह गाया है।

    -शाहनवाज़ सिद्दिक़ी 'साहिल'

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    सिर्फ 'लैंगिक' नहीं बल्कि 'सामाजिक' डाइवर्सिटी की ज़रूरत है

  • by
  • Shah Nawaz
  • बड़ी हैरत की बात है कि जो लोग ऑफिसों में महिलाओं को लेकर डाइवर्सिटी पर ज़ोर देते हैं, बराबरी की बाते करते हैं, इसके नाम पर बड़ी-बड़ी नीतियां बनाते हैं,  आखिर वही लोग महिलाओं की ही तरह सदियों से दबे-कुचले और सामाजिक पिछड़ेपन का दंश झेल रहे लोगों को आरक्षण दिए जाने के खिलाफ क्यों हो जाते हैं? 

    क्या ऑफिसों में डाइवर्सिटी के नाम पर महिलाओं को नौकरी और सम्मान की व्यवस्था भी उसी तरह की कोशिश नहीं है जैसी कोशिश सदियों से सामाजिक दुर्व्यवहार झेल रही क़ौमों को बराबरी पर लाने के लिए नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के ज़रिये की जाती है? अगर हाँ, तो फिर यह दोहरा रवैया क्यों? ऑफिसों में चल रही डाइवर्सिटी की कोशिशों का दायरा बढ़ाए जाने की ज़रूरत है। क्यों ना 'लैंगिक बराबरी' के साथ-साथ अब इसमें 'सामाजिक बराबरी' को भी शामिल किया जाए? जिस तरह महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार की कोशिशें की जा रही हैं, ऑफिसों में ज़्यादा-ज़यदा से महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है, क्या कार्यालयों में उसी तरह की कोशिशें सामाजिक भेदभाव झेल रही क़ौमों के साथ भी नहीं की जानी चाहिए? बल्कि मेरे विचार से तो इस मुहीम को समाज में भी आम करने और इसपर युद्धस्तर पर काम करने की ज़रूरत है।

    सदियों से भेदभाव का दंश झेल रहे एक इतने बड़े वर्ग को बराबर ला खड़ा करने के लिए आज देश में एक बड़े सामाजिक आंदोलन की ज़रूरत है। देश के लिए इससे बड़ी त्रासदी कुछ और हो ही नहीं सकती है कि इस युग में भी हम यह देखने के लिए अभिशप्त हैं कि कुछ लोगों को केवल इसलिए साथ बैठने, साथ खाने, साथ पढ़ने, साथ खेलने, धार्मिक स्थलों में घुसने यहाँ तक कि कुओं से पानी लेने की इजाज़त नहीं है क्योंकि वह ऐसी जाती, समूह या धर्म से आते हैं जिन्हे समाज में हीन समझा जाता है।

    हमें एक ऐसा समाज बनाने की ज़रूरत है जहाँ रोटी और बेटी के रिश्ते बनने में ऊंच-नीच की सोच आड़े ना आए। जहाँ व्यापार, नौकरियों और मेलजोल में किसी को छोटा समझकर भेदभाव ना हो। बल्कि काबिलियत के बल पर फैसले होने लगें और उसके लिए सबसे पहली और सबसे ज़रूरी बात सबको सामाजिक बराबरी पर ला खड़ा करने की है। वर्ना जिस तेज़ी से सामाजिक कट्टरता और वर्गीय नफरत बढ़ रही है उसमें और भी तेज़ी आना तय है।

    देश को तरक्की की राह पर ले जाना है तो हमें आज ही कोशिश करनी पड़ेगी कि हमारे अंदर से सामाजिक और  धार्मिक भेदभाव समाप्त हो। जब तक हमारे अंदर भेदभाव रहेगा तब तक सहिष्णुता, संवेदनशीलता आ ही नहीं सकती और हम जब तक संवेदनहीन हैं तब तक सिविलाइज़्ड या सभ्य नहीं कहलाए जा सकते हैं।

    आज हर हिंदुस्तानी चाहता है कि हम फिर से 'विश्वगुरु' बन जाएं। जबकि हमें आज यह समझना पड़ेगा कि विश्वगुरु किसी पदवी का नाम नहीं है, बल्कि सारे विश्व को सही राह दिखाने के लिए हम तब ही तैयार माने जा सकते हैं जबकि सबसे पहले हम स्वयं इसके लायक बन पाएं। हक़ीक़त यह है कि बदलाव तो हमारे अंदर के बदलाव आने से ही आ सकता है।  वर्ना पिछड़ने के लिए तैयार रहे, दुनिया हमसे आगे निकल रही है और निकलती जाएगी। 

    याद रखने की ज़रूरत है कि अगर हम नहीं सुधरे तो हमारे इस निष्कर्म की सज़ा हमारी नस्लों को भोगनी पड़ेगी और हमारी नस्लें हमें इस जुर्म के लिए कभी माफ़ नहीं करेंगी।





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