नफरत की राजनीति और उसका परिणाम?

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  • Shah Nawaz
  • कल फिर बुलंदशहर में दो लोगों को नफरत की इस राजनीति ने लील लिया, केवल शक के कारण बवाल हुआ, भीड़ में खुद से सज़ा देने की मानसिकता को भरा गया, जिसका हर्जाना दो लोगो को अपनी जान की कुर्बानी देकर चुकाना पड़ा।

    नफरत की राजनीति का मकसद यह होता है कि लोगों को आपस में दो जगह बाँट दिया जाए। उनके सोचने की ताकत को खत्म कर दिया जाए उनके अंदर इतनी नफरत भर दी जाए कि वह कत्ल जैसे संगीन क्राइम में भी अपना पराया देखने लगे। अगर कहीं कोई हादसा होता है, या कहीं एक्सीडेंट होता है तो एक आम इंसान का क्या कर्तव्य होता है, वह फौरन घायलों की मदद करता है। पर जब समाज के अंदर नफरत पैदा हो जाती है तो ऐसे हादसों में भी सबसे पहले यह देखा जाने लगता हैं कि घायल हिंदू है या मुसलमान है। जब हमारे अंदर यह सोच पैदा होने लगे तो हमें विचार करना पड़ेगा, क्योंकि हमारे अंदर से इंसानियत खत्म होती जा रही है और इंसानियत को खत्म किया जा रहा है, हमारे अंदर जहर भरा जा रहा है।
    अगर आप नफरत की राजनीति करने वालों की गतिविधियों पर ध्यान देंगे तो आपको पता चलेगा कि यह लोग धार्मिक नहीं है बल्कि यह धार्मिक कट्टरता को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाले लोग हैं। अगर आप बड़े परिपेक्ष में देखेंगे तो इसके पीछे आर्थिक वजह होती हैं जिससे कि समाज के ऊपर अपना अधिपत्य जमाया जा सके और इसके पीछे की असल वजह यह है कि करप्शन आसानी के साथ किया जा सके। लोग उनकी कट्टरता पर चर्चा करेंगे, या फिर उनकी नफरत की बातों के खिलाफ होंगे, या नफरत भरी बातों में आकर उनके समर्थक होंगे, लेकिन कोई भी उनके करप्शन पर बात नहीं कर रहा होगा। यही वह चाहते हैं और यह काम पूरी तैयारी के साथ होता है।
    यह लोग अपने समर्थकों को अंधभक्त इसलिए बनाते हैं जिससे कि अगर उनका करप्शन सामने आ भी जाए तो लोग उस पर विश्वास नहीं करें। ऐसे अंधभक्त अक्सर स्वभाव से कट्टरपंथी होते हैं, कट्टरपंथी होने का मतलब यह है कि धर्म या विचार के मामले में यह लोग सोचते हैं कि उनकी राय ही सर्वोपरि है और हर एक को उसी राय को हर हाल में मानना पड़ेगा। नफरत फैलाने वाले अक्सर ऐसी सोच वालों के दिमाग को अपना गुलाम बना लेते हैं। इस तरह की बातें फैलाई जाती हैं, झूठ को प्रपोगेट किया जाता है कि अंधभक्त या अंध समर्थक वही सोचते हैं जो कि नफरत की राजनीति करने वाले चाहते हैं।
    आज हमारे समाज को कट्टरपंथ की जगह उदारवाद की जरूरत है, परेशानी का सबब यह है कि देश के 80 परसेंट उदारवादियों की आवाज केवल 20% कट्टरपंथियों की तेज आवाज के सामने मध्यम हो जाती है। बल्कि यूं कहूं कि छुप जाती है। हमें शांतिपूर्ण तरीके से उस आवाज को सामने लाना होगा और आज वह मेहनत करनी होगी की उदारवाद की आवाज जन जन तक पहुंच सके। देश में बदलाव लाने के लिए यह बेहद जरूरी है, खासतौर पर आज के नौजवानों को यह प्रयास करना होगा कि नफरत की राजनीति के पीछे छुपे मकसद को समझ कर समाज में जागरूकता की कोशिश करें।
    अगर हमने आज कोशिश नहीं की तो हमारी आने वाली पुश्तें हमें माफ नहीं करेंगी। हमें आज यह तय करना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सशक्त हिंदुस्तान देना चाहते हैं या फिर नफरत और भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक कमजोर देश…
    हमें आज ही तय करना होगा इस नफरत की भेंट कोई जुनैद यह कोई अंकित सक्सेना फिर ना चढ़े। जरा सोचिए इन की मांओं ने कैसे पाल-पोसकर इन्हें बड़ा किया होगा, कैसे इनकी बहनों ने इनके नखरे उठाए होंगे, कैसे बाप ने इनके सुनहरे भविष्य के सपने देखे होंगे… और चंद पलों की नफरत ने इनसे सारे सपने छीन लिए। अगर हम आज चुप रहेंगे तो कल को माएँ बच्चे पैदा करते हुए इसलिए भी डरेगी कि कहीं यह भी नफरत के शिकार ना हो जाए, सोचिए और आवाज उठाइए।
    और हां समाज को याद रखना पड़ेगा कि यह लड़ाई इस देश के आम नागरिक को खुद लड़नी है। इस देश से नफरत मिटाने की लड़ाई… और यह मोहब्बतों को बांटकर और नफरतों की साजिश करने वालों को कमजोर करके ही लड़ी जा सकती है। हमें नफरत करने वालों को यह एहसास दिलाना पड़ेगा कि उनकी डाल अब नहीं गलेगी। क्या तैयार है? अगर हां तो आज ही प्रयास शुरु कीजिए, सबसे पहले तो अपने जानने वालों में से ऐसे लोगों को समझाना शुरू कीजिए जो कट्टरपंथ की राह में आगे बढ़ रहे हैं।
    जय हिंद!

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    महिला अधिकारों का दमन क्यों होता है?

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  • Shah Nawaz
  • महिला अधिकारों के हनन के अनेक कारण हो सकते हैं, पर मेरे हिसाब से महिलाओं में शिक्षा तथा आर्थिक सशक्तिकरण की कमी इसके प्रमुख कारण हैं और इनसे भी बड़ा एक वजह है पौरुषीय दंभ। आइये इसी पर चर्चा करते हैं।



    शिक्षा के साथ साथ महिलाओं के अधिकारों के दमन में आर्थिक सशक्तिकरण होना या नहीं होना भी एक महत्वपूर्ण कारक होता है। गरीब परिवारों में महिलाएं भी परिवार को चलाने के लिए उपलब्ध आय के स्रोतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अगर आप देखेंगे तो गरीब किसान परिवारों में महिलाएं फसलों की बुआई तथा कटाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, वहीं गरीब मज़दूर परिवारों में भी महिलाएँ मजदूरी करके परिवार चलाने में अपनी भूमिका निभाती हैं।

    वहीं दूसरी तरफ आर्थिक तौर पर मज़बूत अर्थात अमीर परिवारों में भी महिलाएं आर्थिक तौर पर सशक्त होती हैं। और यही कारण है कि गरीब तथा अमीर परिवारों में महिला अधिकारों का दमन उतने बड़े रूप में नहीं होता जितना कि मध्य आय वर्ग में होता है। मध्य आय वर्ग ही वोह समूह है जहाँ महिलाओं के अधिकारों का सबसे ज़्यादा दमन होता है।

    इसके अलावा हमारा सामाजिक तानाबाना भी महिला अधिकारों के दमन का जिम्मेदार होता है। एक लडकी अपने माता-पिता के घर मे पली-बढ़ी होती है, और एक कम्फर्ट लेवल का जीवन जी रही होती है, पर शादी के बाद उसे ऐसे घर मे जाना होता है, जिसके बारे में वोह ज़्यादा नहीं जानती। उसे वहाँ ऐसे परिवार के सदस्यों के साथ रहना होता है जो पहले से ही उस परिवार का हिस्सा होते हैं। ऐसे में नए घर के सदस्यों की सोच और नई बहु की सोच में बहुत बड़ा गैप आना स्वाभाविक है। नए परिवार में हर कोई दूसरों को अपने हिसाब से चलना चाहता है, यही घर के क्लेश की वजह भी बनती है और यहीं से महिला अधिकारों के दमनचक्र की शुरुआत भी हो सकती है।

    आज समाज को इस व्यवस्था का हल ढूंढना होगा। ऐसा क्यों होता है कि शादी के बाद लड़की ही अपना घर छोड़कर लड़के के घर जाकर रहे? क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि दोनों एक-दूसरे के घर-परिवार में जाकर रहने की जगह मिलकर एक तीसरा घर बसाएं। पर इस व्यवस्था में हमें लड़के और लड़की के बुजुर्ग माता-पाता के भरण-पोषण और बुढ़ापे में ज़रूरी केयर कैसे मिले, इसके ऊपर भी विचार करना पड़ेगा।

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    देश का सबसे बड़े मुद्दा - हमारे न्यूज़ चैनल्स

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  • Shah Nawaz

  • काफी दिनों से सैफ और करीना खासे परेशान चल रहे थे और उन की परेशानी का सबब था कि देश के इकलौते होनहार बालक तैमूर को पोटी नहीं आना, कई दिनों तक पूरा घर ही नहीं बल्कि पूरा देश परेशान था और देश के न्यूज़ चैनल इस बड़े हादसे को पल-पल कवर कर रहे थे, वोह हम तक यह खबर पहुंचाते रहे कि तैमूर इस वजह से दूध भी नहं पी रहे हैं, जब भी तैमूर को टॉयलेट की तरफ ले जाया जाता था तो हमारे न्यूज़ चैनल चौकस होकर खुशखबरी का घंटो एहसास दिलाते रहते थे, हालाँकि 2 दिन तक देश को मायूस होना पड़ा था, पर आखिरकार 2 दिन बाद तैमूर की पोटी आने की खुशखबरी को सबसे पहले सबसे तेज़ चैनल्स होने का दवा करने वाले न्यूज़ चैनल्स ने सबसे पहले हम तक पहुंचा दिया और देश ने चैन की सांस ली, हालाँकि उन दिनों १३ बैंकों में घोटाले की छोटी-मोती खबर भी यदा-कड़ा सुनाई पड़ी, पर इन छोटी-मोटी ख़बरों पर कौन घंटों बर्बाद करता है?

    हमारे न्यूज़ चैनल्स हमेशा देश से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं मसलन आईपीएल में कौन जीता, किस टीम ने कैसे पार्टी करी, सलमान खान गिरफ्तार होकर रातभर सो नहीं सके, उन्होंने दाल-रोटी नहीं खाई... और हाँ चैनल्स ने इतनी महत्वपूर्ण खबर को भी हम तक पहुँचाया कि उन्होंने पकोड़े खाए, सोचिये देश का कितना उद्धार हुआ होगा जब हमें यह पता चला कि उन्हें ज़मानत मिल गई और घर पहुंचकर वह अपने छत पर आकर फैंस से मिले और उन्हें देश को आगे ले जाने का सन्देश दिया। अगर न्यूज़ चैनल्स ने यह नहीं बताया होता तो आज देश कितना पीछे चला गया होता, इसका आपको अंदाज़ा भी नहीं है.

    अभी कल-परसों की बात है, जबकि कांग्रेस के नेता उपवास शुरू करने से पहले सरगी के तौर पर छोले-भठूरे खा रहे थे, आखिर देश के इतने बड़े नुकसान की खबर हमारे न्यूज़ चैनल्स कैसे छोड़ सकते थे, घंटों इस पर विमर्श हुआ, एक-एक छोले और भठूरे का हिसाब लिया गया, हालाँकि चैनल्स 1-2 मिनट के लिए यह भी दिखाया कि उत्तर प्रदेश में जिस युवती का बलात्कार हुआ था, उसे इंसाफ की जगह उसके पिता की हिरासत में हत्या कर दी गई, पर यह न्यूज़ इतने काम की नहीं थी, कौन सा यह हमारे साथ हो रहा था जो हम देखें, हमें क्या फर्क पड़ता है जो किसी को इन्साफ मिले या ना मिले, हमें तो अपना पिज़ा आधे घंटे में मिल जाता है और फिर जो कम्पनियाँ या फिर पार्टियां विज्ञापनों के लिए पैसा देती हैं उनके पक्ष में खबर दिखाना हमारे न्यूज़ चैनल्स का धर्म है, आपने वोह कहावत नहीं सुनी कि ग्राहक ही भगवन होता है.... देखा हमारे न्यूज़ चैनल्स अपनी कर्म के प्रति कितने सच्चे होते हैं? 


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    यह तो है कि मैं यहाँ तन्हा नहीं : ग़ज़ल

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  • Shah Nawaz
  • यह तो है कि मैं यहाँ तन्हा नहीं
    तुझसे भी तो पर कोई रिश्ता नहीं

    तिश्नगी तो है मयस्सर आपकी
    जुस्तजू दिल में मगर रखता नहीं

    साज़िशों से जिसकी हों ना यारियां
    आज कोई भी बशर मिलता नहीं

    नफरतें इस दौर का तोहफा हुईं
    दिल किसी का भी यहाँ दुखता नहीं

    बन गया है मुल्क का जो हुक्मरां 
    ज़ालिमों के साथ वो लड़ता नहीं

    इश्क़ जिससे हो गया इक बार जो
    रिश्ता दिल में फिर कभी मरता नहीं

    फूल के जैसा ही है मासूम यह 
    टूटा दिल भी फिर कभी जुड़ता नहीं

    खुद को हल्का रख गुनाहों से ज़रा
    तूफाँ में घर एक भी बचता नहीं

    - शाहनवाज़ 'साहिल'




    फ़िलबदीह-185(25-06-2016) साहित्य संगम में लिखी ग़ज़ल

    मात्रा:- 2122 2122 212
    बह्र :- बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
    अरकान :- फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
    काफ़िया :- बसता(आ स्वर)
    रदीफ़ :- नही
    क्वाफी (काफ़िया) के उदआहरण
    तन्हा खिलता मिलता जलता सहता सस्ता मरता रिश्ता दिखता सकता चुभता मुड़ता कहता सस्ता रखता जँचता बेचा चलता जुड़ता रहता बचता भरता बहता लड़ता प्यारा धागा ज्यादा ताना साया भाया दाना वादा आदि । इसी प्रकार के अन्य शब्द जिनके अंत में " आ "स्वर आये।
    इसी बह्र पर गीत गुनगुना कर देखें⬇
    ➡ आप के पहलू मे आकर रो दिए
    ➡ दिल के अरमा आंसुओं मे बह गए

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    ग़ज़ल: फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे

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  • Shah Nawaz
  • मेरी यादों में आके क्या करोगे आस दिल में जगा के क्या करोगे ज़माने का बड़ा छोटा सा दिल है सबसे मिल के मिला के क्या करोगे अगर राहों में ही वीरानियाँ हों इतनी बातें बना के क्या करोगे नफरतें और बढ़ जाएंगी दिल में ऐसी बातों में आ के क्या करोगे जो दिल नाआशना ही हो चुके हों फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे - शाहनवाज़ 'साहिल'


    मात्रा:- 1222 1222 122
    बह्र :- बहरे हजज  मुसद्दस महजूफ
    अरकान :- मुफाईलुन मुफाइलुन फ़ऊलुन
    काफ़िया :- क्या(आ स्वर)
    रदीफ़ :- करोगे

    क्वाफी (काफ़िया) के उदाहरण :-
    जागा ऐसा तन्हा खिलता मिलता जलता सहता सस्ता मरता रिश्ता दिखता सकता चुभता मुड़ता कहता सस्ता रखता जचता बेचा चलता जुड़ता जचता रहता बचता भरता बहता कहता लड़ता प्यारा धागा ज्यादा ताना साया भाया दाना वादा आदि । इसी प्रकार के अन्य शब्द जिनके अंत में " आ "स्वर आये।

    इसी बह्र पर कुछ गीत:
    ➡अकेले हैं चले आओ जहां हो
    ➡ मैं तन्हा था मगर इतना नही था

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    ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए - अदम गोंडवी

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  • Shah Nawaz
  • आज के मौजूं पर अदम गोंडवी साहब की कुछ मेरी पसंदीदा ग़ज़लें:

    आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
    अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे
    तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
    आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे
    एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
    चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे

    - अदम गोंडवी


    हिन्‍दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
    अपनी कुरसी के लिए जज्‍बात को मत छेड़िए
    हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
    दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
    ग़र ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्‍मन का घर फिर क्‍यों जले
    ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
    हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
    मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
    छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
    दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए

    - अदम गोंडवी


    काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
    उतरा है रामराज विधायक निवास में
    पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
    इतना असर है खादी के उजले लिबास में
    आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
    जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
    पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
    संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
    जनता के पास एक ही चारा है बगावत
    यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

    - अदम गोंडवी

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    व्यवस्था परिवर्तन के लिए सतत मेहनत की ज़रूरत है

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  • Shah Nawaz
  • "लोकतंत्र कमज़ोर है, वोट खरीदे जाते है, बूथ कैप्चर किये जाते है, मतगणना मे धांधली करवाई जाती है, विधायक और सांसद खरीदे जाते है, पूंजीवादी व्यवस्था है, भ्रष्टाचार फैला हुआ है, व्यवस्था को हरगिज़ नहीं बदला जा सकता है" इत्यादि-इत्यादि.... यह सब लोकतंत्र के विरोध की कमज़ोर दलीलें बनी हुई हैं। जब लोग लोकतंत्र के विरोधी होते हैं तो इसी तरह की कमज़ोर दलीलों को हथियार बना लेते हैं, उन्हें अपने से इतर विचार रखने वालों का खून बहना आसान तथा बदलाव के अहिंसक प्रयास असंभव लगते हैं। 

    दो तरह के लोग ऐसी सोच रखते हैं, जिनमे से एक निराशावादी होते हैं और दूसरे खास तौर पर कट्टरपंथी विचारधारा को मानने वाले होते हैं, क्योंकि उनकी नज़रों में उनके विचार ही अहमियत रखते हैं। इसी कारण वह बाकी दुनिया के विचारों को रद्दी की टोकरी के लायक समझते हैं और उन विचारों को ज़बरदस्ती कुचल देना चाहते हैं। और इसीलिए वह हिंसा का सहारा लेते हैं, जबकि हिंसा को किसी भी हालत में समाधान नहीं कहा जा सकता है। अगर सिस्टम ठीक नहीं है तो फिर हिंसा का सहारा लेने या फिर हाथ पर हाथ धार कर बैठने की जगह सिस्टम को ठीक करने के प्रयास होने चाहिए। 

    हमें यह समझना पड़ेगा कि अगर वोट खरीदे जाते हैं तो बिकने वाले वोटर आम जनता ही होती है। एक बार आम जनता को बस वोट बिकने से उनको होने वाले नुकसान को समझाने की ज़रूरत है, आमजन को समझ में आना ज़रूरी है कि यह लोग एक बार चंद रुपयों के बदले में लगातार भ्रष्टाचार करके हमारा कितना नुकसान करते हैं। जितना खून-पसीना और पैसा हिंसा करने में बहाया जाता है अगर हम उतनी मेहनत लोगो में जागरूकता फ़ैलाने में लगा दें तो बदलाव जाया जा सकता है।

    ऐसा नहीं हैं कि हिन्दुस्तान में एक सीट पर भी लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव नहीं जीता जाता और सारी की सारी भारतीय जनता ही भ्रष्ट हैं। फिर अगर एक सीट भी जीती जा सकती है तो प्रयास से बाकी जगहों पर भी बदलाव लाया जा सकता है। 

    हमारे देश में ही कई बार जनांदोलन और उनके द्वारा व्यवस्था परिवर्तन की गंभीर कोशिशें हुई हैं, पर हर बार वोह जनांदोलन अधिक समय तक नहीं टिक पाए। अगर गंभीरता से उनका विश्लेषण किया जाए तो उनमें जो सबसे बड़ी कमी नज़र आती है वह यह कि तब के जननायकों ने यथार्थ और लक्ष्य की बीच की खाई को एक ही झटके में पाटने या कूदकर पार करने की कोशिश की और इसी प्रयास में वह उस खाई में गिर कर समाप्त हो गए। जबकि होना यह चाहिए था कि जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जनांदोलन किया गया है उसकी प्राप्ति के लिए मज़बूत तंत्र विकसित किया जाए। अगर व्यवस्था परिवर्तन करना है तो वह एक दिन में नहीं होगा, बल्कि उसके लिए व्यवस्थित तरीके से स्थितियों को बदलना पड़ेगा और समयानुसार उसमें परिवर्तन लाते रहना पड़ेगा। 

    समाज का हर क्षेत्र समाज का ही आइना होता है, भ्रष्टाचार जैसी बुराइयाँ अगर समाज में व्याप्त हैं तो एलियन या देवदूत सामने नहीं आएँगे, बल्कि उसी समाज में से छाँटकर अच्छे लोगों को सामने लाना पड़ेगा। और यह भी याद रखना पड़ेगा कि हर व्यक्ति तब तक ईमानदार है जब तक कि उसके पास भ्रष्टाचार का मौक़ा नहीं है, ईमानदारी की असली परीक्षा तभी होती है जबकि भ्रष्टाचार का मौक़ा सामने हो। इसलिए परिवर्तन के लिए दो बातें सबसे ज़रूरी हैं, जिसमें से एक है जनता को जागरूक किया जाना, जिससे कि मौजूदा भ्रष्ट लोगों को राजनीति से बाहर किया जा सके और दूसरी आवश्यकता ऐसी व्यवस्था बनाए जाने की है कि किसी का भी भ्रष्टाचार सामने आने पर उसे कानून के दायरे में लाया जा सके। अगर जनता का दबाव रहेगा तो कोई भी राजनैतिक संगठन भ्रष्ट लोगों को अपने साथ रखने की हिम्मत नहीं करेगा।

    सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात को समझने की है कि आज की राजनैतिक व्यवस्था में बदलाव एक दिन में नहीं लाया जा सकता है, इसके लिए कामयाबियों से दम्भ में आए बिना और नाकामयाबियों से मायूस हुए बिना लगातार प्रयास करने पड़ेंगे। 



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    फलफूल रही है नफरत की राजनीति

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  • Shah Nawaz
  • कट्टरता से नफ़रत, नफ़रत से हिंसा और हिंसा से बर्बादी आती है!

    किसी समुदाय के नाम, पहनावे या चेहरे-मोहरे को देखकर या फिर गौमाँस जैसे इल्जाम पर कट्टरपंथी तत्व लोगों को खुलेआम मार रहे हैं और ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं, जबकि उनसे कहीं बड़ी भीड़ उन बाज़ारों में या फिर ट्रेनों में मौजूद होती है। पर नफरत का आलम यह है कि वोह भीड़ चुप रहती है, बल्कि कई जगह तो कट्टरपंथियों में शामिल हो जाती है और मौके पर इतनी भारी भीड़ होने के बावजूदु पुलिस को गवाह तक नहीं मिलते...

    पहले जब भी दंगे हुए और लोग मरे तब बचाने वाले और दंगाइयों का विरोध करने वाले खुलकर सामने आते थे, पर अब मौन समर्थन सामने आ रहा है। बल्कि विरोध करने वालों को देशद्रोही ठहराया जा रहा है, भले ही वोह 10 साल तक देश का उपराष्ट्रपति ही क्यों ना रहा हो।

    क्या ऐसा होना किसी देश के अल्पसंख्यक समुदाय के लिए चिंता का सबब नही है? और अगर चिंता व्यक्त की गई तो उसपर विचार करके हल खोजने की जगह नफरत भरी प्रतिक्रिया देना क्या खुद में उसी नफरत को साबित नहीं कर रहा है, जिस पर चिंता ज़ाहिर की जा रही है? 

    मैं अपने दोस्तों की सूचि में मौजूद लोगों में भी ऐसी नफरत को देख रहा हूँ। हालाँकि हैरान नहीं हूँ, क्योंकि जानता हूँ कि कट्टरपंथी मुखर होते हैं और मासूम लोगों को बड़ी जल्दी अपनी ज़द में ले लेते हैं, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे मुल्क इसका जीता-जागता उदहारण हैं!

    दरअसल कट्टरपंथी सवाल से डरते हैं, यह कभी नहीं चाहते कि कोई उनके ऊपर उंगली उठाए, उनके फैसलों पर 'सवाल' करे। वोह जो करते हैं, हर हाल में उसे सबसे मनवाना चाहते हैं, सो अब सवाल करने वाला देशद्रोही है। कट्टरपंथी हमेशा से ही सवाल और सवाल पूछने वालों से नफरत करते आए हैं, क्योंकि इनके पास सवालों के जवाब नहीं होते और ना ही जवाब देने की सलाहियत, केवल कुतर्क होते हैं। आप ईरान पर सवाल करेंगे तो यह तूरान का ज़िक्र छेड़ेंगे...

    इन नफ़रत पालने वालों को
    कहां परवाह है सत्य की
    उन्हें बस नफरत है, 
    कुछ नामों से, 
    कुछ चेहरों से,
    कुछ लिबासों से,
    और अपने ख़िलाफ़ 
    उठती हुई आवाज़ों से...

    कट्टरता हमारे मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर लेती है, जिससे हम विपरीत विचारधारा की तार्किक बातों को भी नहीं देख पाते। इंसानियत के दुश्मनों से सख़्ती से निपटने के लिए देश को एकजुट होना चाहिए, कट्टरपंथी किसी एक धर्म के नहीं होते, इसलिए हर तरफ के कट्टरपंथीयों के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। 

    आम हिंदू आम मुस्लिम से नहीं लड़ता और ना ही आम मुस्लिम आम हिंदू से, यह कट्टरपंथी ही हैं जो राजनैतिक आकाओं के इशारों पर नफ़रतें फैलाते हैं। आज हमें यह समझना होगा कि समाज के अंदर फैली यह नफ़रतें हुई नहीं हैं बल्कि पैदा की गईं हैं, इसलिए मुक़ाबले के लिए साज़िशों को बेनक़ाब और मुहब्बतों की कोशिश करनी होंगी। सच्चाई यह है कि नफ़रत की राजनीति 'देशहित' की आड़ में 'देश हिट' कर रही है और इसका जवाब आपसी मौहब्बत और विश्वास है। 

    सहिष्णुता, नरमपंथ और मुहब्बत हमेशा से ही मेरे देश की ताकत रही है, इसलिए मैं उन्हें देशद्रोही मानता हूँ जो इसे नफ़रत में बदलना चाहते हैं। सत्ता के लिए नफ़रत की जो खेतियाँ बोई गईं उसकी फसल आज लहलहा रही है, इसलिए देश में हो रही सांप्रदायिक हत्याओं के ज़िम्मेदार वोह भी हैं जिन्होंने नफ़रत के कारोबारियों का समर्थन किया... यह आज की ज़रूरत है कि कट्टरपंथीयों से लड़ने के लिए नरमपंथियों को आगे आएं! 

    हालाँकि यह सच है कि हमारे देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, आपसी मौहब्बत में अब वोह पहले वाली बात नहीं रही, आपसी रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं... पर हम कोशिश करें, अपने बच्चों को सही सीख दें, मुहब्बत सिखाएं तो शायद फिर से बात बन सकती है... वर्ना नफरत की राजनीति तो अपना काम कर ही रही है!

    और अंत में बस इतना ही कहूंगा कि "जो लोग नफ़रत करते-करते ऊब गए हों वोह मुहब्बत करके देखें, खुशियाँ इसी में हैं!"







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    जीवन नहीं समय अनमोल है

  • by
  • Shah Nawaz
  • डेंगू, चिकन गुनिया जैसी बीमारियों से निपटने में हमारी उदासीनता और जीवन को जोखिम में डालने की हमारी आदतों पर दैनिक जनवाणी में मेरा कटाक्ष...

    "हरियाली होने का भी बड़ा नुकसान है, सबसे पहला नुकसान तो यही है कि फिर इसे बचाए रखने की मेहनत करनी पड़ती है, अब आप ही बताईए कि इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में किसके पास समय है? यह कहावत नहीं बल्कि सच्चाई है कि आज के समय में हमारे पास सांस लेने का भी समय नहीं है। अब यह कोई भी पर्यावरणविद नहीं बताता कि भला जिस काम के लिए हमारे पास समय तक नहीं है, उसके लिए क्यों इतनी मेहनत की जाए?

    असल बात यह है कि आज हमारे पास बाकी कामों के लिए तो फिर भी समय है, लेकिन इस कमबख्त जीने के लिए ही नहीं है। जीवन जीना आज के समय की सबसे बेकार चीज़ हो गई है, अगर विश्वास नहीं होता है तो लोगों को अपने हाथ से पेड़ों को काटते हुए देख सकते है। सरकारी कर्मचारी इस पुन्य के काम में पूरी मदद करते हैं, ना सिर्फ मदद बल्कि अपना भी पूरा योगदान देते हैं। और यही कारण है कि अच्छा-खासा बजट होने के बावजूद सड़कों के इर्द-गिर्द हो सकने वाली ग्रीन बेल्ट अधिकारियों/कर्मचारियों की नामी-बेनामी आय की शोभा बढ़ा रही होती है।

    हम में से अक्सर सभी को पता होता है कि डेंगू/चिकनगुनिया/मलेरिया इत्यादि को फैलाने वाले मच्छर साफ़ पानी में जमा होते हैं और यह बिमारी घर या फिर उसके आस-पास 200 मीटर क्षेत्रफल में 7 दिन तक जमा साफ पानी में पनपे मच्छर से ही लगती है। फिर भी हर साल लाखों लोग बुरी तरह बीमार पड़ते हैं, हज़ारों लोग मर जाते हैं, पर क्या कोई भी अपने घर या फिर आस-पास किसी बोतल, टूटे हुए या फिर प्साटिक के ग्लास, कूलर इत्यादि में जमा साफ पानी को हटाने का समय निकाल पाता है? नहीं ना? क्या करें जब किसी के पास इतना काम करना तो छोडो करने की सोचने का भी समय ही नहीं है! बीमार पड़ेंगे तब की तब देखेंगे, वैसे भी बीमार पड़ने के लिए तो समय निकल ही आएगा, आफिस से भी छुट्टी मिल जाएगी और अगर भगवान को प्यारे हो गए तब तो कईयों को कई दिन की छुट्टी मिल जाएगी।


    वैसे अगर आप सड़क पार करते हुए या फिर गाड़ी चलाते हुए लोगों पर नज़र दौड़ाएंगे तो आपको विश्वास हो जाएगा कि आज के इंसान की नज़र में जीवन से ज़्यादा महत्त्व समय का है, हालांकि यह भी है कि हमारे देश के लोग बड़े जाबांज़ होते हैं, चंद मिनट बचाने के लिए जान पर खेलकर सड़क पास करते हैं, एक-दूसरी गाड़ी को तेज़ हार्न बजाते हुए पूरी जाबांज़ी से ओवरटेक करते हुए सबसे आगे निकल जाते हैं। चाहे राँग साईड से ही क्यों ना निकलना पड़े, पर सबसे आगे निकलकर ही दम लेते हैं। इसे लेकर हम इतने सजग हैं कि बच्चों को प्रतिदिन समय का सदुपयोग सीखाने के लिए स्कूल की वैन या फिर बस के ड्राईवर को नियुक्त किया हुआ है। वोह बचपन से ही बच्चों को जाबांज़ बनना और एक-एक पल बचाना सिखा देते हैं, क्या कहा जीवन? अगर वोह ज़्यादा महत्वपूर्ण होता तो हम मेहनत उसके विरुद्ध नहीं बल्कि उसके लिए कर रहे होते।"





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