इश्क-ए-हक़ीकी और उसकी नाराजगी

  • Wednesday, May 22, 2013
  • by
  • Shah Nawaz

  • गुनाहों में मुब्तला रहने का मतलब है कि रब की नाराज़गी का खौफ दिल में नहीं है... और यह इसलिए है क्योंकि उससे इश्क़ का सुरूर अभी दिल पर छाया ही नहीं... महबूब से इश्क़ का अभी बस दावा है, दर-हकीक़त दावे से कोसो दूरी है!

    उससे मिलन की चाहते तो हैं, लेकिन अपने फे`ल से लगता ही नहीं कि उसे भी अपने इश्क में मुब्तला करना चाहते हैं! वर्ना उसकी नाराजगी की ता`ब दिल में लाना मुमकिन हो सकता था क्या?


    महबूब की नाराज़गी भी कोई दीवाना कभी सहन कर सकता है भला!!!

    बल्कि "इश्क़" वोह शय है कि जिससे होता है, आशिक तो उसे सोते-जागते याद करने में ही लुत्फ़-अन्दोज़ होता रहता है। और जिसे मुझसे इश्क हो, फिर अगर मैं उससे मिलन की आस के आनंद में वशीभूत होता हूँ तो क्या वह मुझसे राज़ी नहीं होगा?






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    सख्त कानून और पुलिस की मुस्तैदी भर से रुक जाएगी महिलाओं के प्रति दरिंदगी?

  • Sunday, April 21, 2013
  • by
  • Shah Nawaz
  • केवल सख्त कानून, जल्द सज़ा और पुलिस की मुस्तैदी भर से बलात्कार जैसे घिनौने अपराधों को नहीं रोका जा सकता है। हर बलात्कारी को पता है कि वह एक ना एक दिन पकड़ा ही जाएगा, उसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं इस कदर तेज़ी से बढ़ रही हैं।

    अमेरिका, इंग्लैण्ड, स्वीडन और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में पुलिस भी मुस्तैद है, कानून भी सख्त है और फैसला भी जल्द होता है, इसके बावजूद बलात्कार के सबसे ज़्यादा मामले इन्ही देशों में होते हैं। बल्कि हिन्दुस्तान से कई गुना ज़यादा होते हैं।

    आज ज़रूरत बड़े-बड़े नारों या बड़े-बड़े वादों की नहीं है। बल्कि असल ज़रूरत चल रही कवायदों के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर जागरूकता पैदा करने की है। ज़रूरत महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की है... ज़रूरत महिलाओं को भोग की वस्तु समझने जैसी सोच से छुटकारा पाने की है। ज़रूरत दिमाग से और बाज़ार से अश्लीलता समाप्त करने की है।

    ज़रूरत अपने बच्चों में से भेदभाव को समाप्त करना की है, ज़हन में घर कर गए लड़के-लड़की के फर्क को  मिटाने की है। यह लड़कों का काम है, वोह लड़कियों का काम है जैसी बातों को समाप्त करना होगा।  बचपन से ही महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाना होगा। आखिर कब तब बेटों की दबंगता और बेटियों के छुई-मुई होने पर खुश होते रहेंगे? क्या समाज के ह्रास में और कोई कसर बाकी है?

    आज असल कोशिश महिलाओं को इंसान समझने की होनी चाहिए, मगर उसके लिए कोई आंदोलन नहीं करना चाहता है, क्योंकि उसमें राजनैतिक फायदा मिलने की गुंजाईश नहीं है...

    कम से कम शुरुआत अपने से और अपनों से तो की ही जा सकती है।





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    नफरत की सौदागरी

  • Monday, March 4, 2013
  • by
  • Shah Nawaz

  • उफ्फ! चारो तरफ नफरत... धमाकों पर धमाकें, देख लो नफरत की सौदागरी का नतीजा! सड़कों पर फैलता गर्म खून, चारो और बिखरे हुए गोश्त के लोथड़े, खुनी रंग से सरोबार होते धार्मिक स्थल, खौफ से सजते बाज़ार, दर्द से चिल्लाते मासूम, अपनों को गंवाने के गम में सिसकती आहें... और क्या-क्या साज़-ओ-सामान चाहिए अय्याशी के लिए इन शैतानो को? और कितनी बलि चाहिए इन्हें अपने देवता को खुश करने के लिए।

    जब तक लोगों में ज़हर घोल जाता रहेगा, तब तक इंसानियत शर्मसार होती रहेगी। इस तरह की सोच का फल देखने के बाद भी इन जैसों का समर्थन करने वालों की ऑंखें ना खुलें और अपनी सोच पर विचार ना करें तो फिर बर्बादी से कौन बचा सकता है?

    आज हर तरफ नफरतों के गीत गाए जा रहे हैं, नफरत फैलाने वालों की तारीफों में खुले-आम कसीदे पढ़े जा रहे हैं। उन्हें और ताकतवर बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। शायद शैतानो की तारीफ करने वाले लोगो के लिए भी दूसरों की लाशें सुकून देने वाली ही हैं! उन्हें संतोष हैं कि हमने तो बस लाशों के बदले लाशें बिछाई हैं और गर्व है कि गालियों का बदला लिया है। फिर भूल जाते हैं कि दूसरे भी बस बदला ही तो लेना चाहते हैं। और इस अदला-बदली में इंसानियत ख़त्म होती जा रही है।

    पता नहीं यह मौत के बाज़ार कब तक सजेंगे? बदलों का यह दौर कब तक चलेगा?





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    आतकवाद क्यों और कब तक?

  • Tuesday, February 26, 2013
  • by
  • Shah Nawaz
  • सबसे पहली ज़रूरत आंतकवाद के खात्मे की नियत की है, अभी तो हमारे देश के हुक्मरानों ने इसकी नियत ही नहीं की है, नताईज तो बहुत बाद की बात है। अभी तो सरकार इस रंग, उस रंग, अपना-पराया में ही अटकी हुई है। आतंकवादियों को बिना रंग भेद किये, अपना-पराया सोचे न्याय की ज़द में लाने, जल्द से जल्द और सख्त से सख्त सजाएं देने की ज़रूरत है।

    जिस तरह से जल्दबाजी में जाँच और मिडिया ट्रायल का सिलसिला चलता है, यह बेहद खतरनाक है। कभी इस समुदाय को कभी उस समुदाय को निशाना बनाया जाता है। अगर किसी समुदाय में से कोई गुनाहगार निकलता है तो पुरे समुदाय को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाने लगता है। आज यह विचार करना पड़ेगा आखिर क्या वजह है कि जिस संदिग्ध को पकड़ा गया है, उससे सम्बंधित समुदाय के 90-95 प्रतिशत लोग उसे बेक़सूर समझते हैं? मेरी नज़र में इसके पीछे एक बड़ी वजह आतंकवाद जैसे संगीन अपराध में पकडे गए मुलजिमों का लम्बी अदालती कार्यवाहियों से गुज़रना और अक्सर का बाद में बेक़सूर निकलना हैं।



    सरकारे अपनी लाज बचाने के लिए असंवेदनशीलता बरतती है। आखिर क्यों हमारी जाँच एजेंसियां ऐसे मामलों में शुरुआत से ही लीपापोती की जगह ठोस जाँच नहीं करती? क्यों सारा ठीकरा केवल दूसरे देश में बैठे आकाओं पर फोड़ कर इतिश्री पा ली जाती है? सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर जाँच के नाम पर ऐसा कब तक चलता रहेगा? क्या सरकार इस कारण नौजवानों में बढ़ते हुए आक्रोश को नहीं पहचान पा रही है? या फिर जान बूझ कर ऑंखें बंद किये बैठी है?

    एक-दूसरे पर इलज़ाम लगाने से तो कोई फायदा होने वाला नहीं है। मासूमों का क़त्ल करने वाले आतंकवादी हैं, चाहे किसी धर्म से, किसी समाज से या किसी भी मुल्क से ताल्लुक रखते हो। आतंकवाद का ना ही कोई धर्म हो सकता है और ना ही कोई मुल्क। इस बात को समझने की आवश्यकता है कि अगर वह किसी भी धर्म पर चलते तो आतंकवादी होते ही नहीं। आतंकवादी धर्म की चादर ही इसलिए ओढते हैं, जिससे कि उन्हें धर्मांध लोगो की सहानुभूति एवं मदद मिल जाए। हालाँकि उनका मकसद धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक है।
    हमें हर हाल में इन कातिलों का विरोध करना ही पड़ेगा, चाहे ऐसी हरकत सगा भाई ही क्यों ना करे। जो मासूमों का क़त्ल करता है, वह इंसान ही कहलाने के लायक नहीं है, भाई / रिश्तेदार / दोस्त / मुसलमान / हिन्दू / पडौसी कहलाने की तो बात ही क्या।

    इस परिस्थिति के लिए समाज में आ रही दरार भी कहीं ना कहीं ज़िम्मेदार है। दुनिया में इंसानियत के जज्बे को बचाए रखने की ज़रूरत है और इसके लिए हर उस धर्मान्ध का विरोध करना पड़ेगा जो खुद की सोच से अलग सोच रखने वालों के खिलाफ ज़हर उगलते हैं, अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, उन्हें समाप्त कर देना चाहते हैं। नफरत के सौदागरों की समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए और असल बात यह है कि कानून को इनसे बड़ा बनना पड़ेगा।





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    उनका अहसान फ़र्ज़, हमारा फ़र्ज़ अहसान

  • Thursday, February 21, 2013
  • by
  • Shah Nawaz
  • समाज में महिलाओं के पुरुषों पर अहसान को उनका फ़र्ज़ (ड्यूटी) और अपने फ़र्ज़ पूरे करने को उनपर एहसान बताया जाता है।

    पत्नी का पति के लिए खाना बनाना, घर का ख्याल रखना, बच्चों की परवरिश करना इस्लाम में फ़र्ज़ नहीं है, बल्कि पति पर एहसान है (अगर वोह करना चाहे तो) । अगर पत्नी बच्चे को दूध ना पिलाना चाहे तो दूध पिलाने वाली का इंतजाम करना पति के ऊपर फ़र्ज़ है। और एहसान का बदला एहसान से या फिर कम-अज़-कम हुस्न-सलूक होना चाहिए। लेकिन इसको पत्नी की ड्यूटी बना दिया गया, जिससे कि वोह घर की चार-दिवारी में टिकी रहे।

    यहाँ तक कि माता-पिता की देखभाल करना, उनके खाने-पीने का इंतजाम करना पति पर  फ़र्ज़ बनाया गया है, लेकिन आज उसे पत्नी का फ़र्ज़ बना दिया गया है। ऊपर से किसी भी महिला के अपने माता-पिता के लिए जो फ़र्ज़ हैं उन्हें गुनाह समझा जाने लगा है। कोई महिला अगर अपने माता-पिता की देखभाल करती है, आर्थिक मदद करती है तो उसे बुरा समझा जाता है। अपनी मर्जी चलाई जा सकें, इसलिए  अधर्म को धर्म का जामा पहनाने की कोशिश की जाती है।

    अगर समाज में सभी रिश्ते एक-दूसरे के हक को समझे, दूसरों के अहसान को अहमियत दें रिश्तों में कडवाहट नहीं बल्कि मिठास जागेगी। बहु को अहसास होना चाहिए की उसके सास-ससुर के उस पर कितने अहसान हैं, वहीँ सास-ससुर को अपनी बहु के एहसानों पर मुहब्बत की नज़र रखनी चहिये।  जैसे पत्नी पति के रिश्तों को अहमियत देती है, ठीक उसी तरह पति को भी अपनी पत्नी के रिश्तों को उतनी ही अहमियत देनी चहिये।

    एक दूसरे पर अहसान दर-असल एक दूसरे से मुहब्बत की अलामत है।

    (मेरे द्वारा की गई टिपण्णी का सार)





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    'विश्वरूपम' - बिना मतलब का विवाद

  • Thursday, January 31, 2013
  • by
  • Shah Nawaz
  • 'विश्वरूपम' पर बिना मतलब का विवाद उठाया जा रहा है। मामला कोर्ट में है, जिसे दोनों पक्षों की बात सुनकर फैसला सुनाना चाहिए। राजनितिक कारणों से अथवा पब्लिसिटी के लिए विवाद करना, विरोध स्वरुप जगह-जगह तोड़-फोड़ करना, धमकियाँ देना घटिया मानसिकता है। किसी भी बात का विरोध करने अथवा अपना पक्ष रखने का तरीका हर स्थिति में लोकतान्त्रिक और कानून के दायरे में ही होना चाहिए।

    मैंने 'विश्वरूपम' नहीं देखी, इसलिए फिल्म पर टिपण्णी करना मुनासिब नहीं समझता हूँ, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढोल पीटने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों से इतना ज़रूर मालूम करना चाहता हूँ कि दूसरे पक्ष को सुने बिना अपनी बात को थोपना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कैसे हो सकता है? अगर कल को कोई आतंकवाद के समर्थन या खून खराबे के लिए उकसाने वाली फिल्म बनता है तो क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उस फिल्म का भी समर्थन किया जा सकता है?

    हालाँकि हर एक को अपनी बात रखने का पूरा हक है और होना भी चाहिए, लेकिन कोई फिल्म जैसी चीज़ एक ऐसा ज़रिया नहीं है जिसपर दूसरा पक्ष भी अपनी बात रख सके। किसी फिल्म इत्यादि के द्वारा उठाए गए मुद्दों पर मीडिया, सोशल मीडिया, सेमिनारों इत्यादि पर विमर्श तो हो सकता है लेकिन यह माध्यम सामान्यत: आम लोगो की पहुँच से दूर होते हैं। अर्थात इन माध्यमों से दूर बैठे लोग फिल्म इत्यादि के माध्यम से व्यक्त किये विचार को ही सच मान बैठते हैं। इस नज़रिए से देखा जाए तो फिल्म जैसे माध्यम किसी असहमति पर एक तरफ़ा फैसला सुनाने जैसा है। बड़ा सवाल तो यह है कि किसी पेंटर को तस्वीर बनाने के लिए अथवा फिल्मकार को फिल्म बनाने के लिए विवादित मुद्दे ही क्यों मिलते हैं?

    सबसे बड़ी बात तो यह है कि अभिव्यक्ति की अंध-स्वतंत्रता के पक्षधर यह लोग अपनी बात पर तानाशाही क्यों दिखाना चाहते हैं? वह स्वयं क्यों दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपना पक्ष रखने की आज़ादी को क्यों छीनना चाहते हैं? खुद ही मुद्दा उठाते हैं और खुद ही उसके सही होने पर फैसला भी सुनना चाहते हैं? अपने विरुद्ध उठने वाली आवाज़ पर सहनशीलता क्यों नहीं दिखाते? कमल हासन ने खुद क्यों नहीं कहा कि वह कोर्ट का फैसला आने के बाद ही फिल्म को प्रदर्शित करेंगे?

    अगर किसी के द्वारा उठाए गए मुद्दे पर अदालत में विमर्श होता है और सही गलत का निर्धारण होता है तो इसमें कुछ भी गलत कैसे कहा जा सकता है? जिस तरह कमल हासन को हक है अपनी बात रखने का उसी तरह बाकी जनता को भी हक है विरोध जताने का। इसमें अगर कमल हासन और उनके साथ खड़े बुद्धिजीवी यह सोचते हैं कि इसका फैसला केवल कमल हासन की मर्ज़ी के मुताबिक ही हो तो क्या इस सोच को जायज़ ठहराया जा सकता है? अपने विरुद्ध फैसला आने पर कमल हासन का बौखलाहट दिखाना और देश छोड़ने की धमकी देना क्या कहा जाएगा?
    अगर मामला कोर्ट में है तो कोर्ट को बिना राजनैतिक दबाव का ध्यान रखे दोनों ओर की दलील सुनकर फैसला सुनना चाहिए। इसमें कोर्ट को लगता है कि कमल हासन ने सही कहा तो उसे कहने के हक मिलना ही चाहिए और अगर ग़लत कहा तो कमल हासन तो क्या किसी को भी हरगिज़-हरगिज़ ऐसी इजाज़त नहीं होनी चाहिए।





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    'पुरुष' होने का दंभ

  • Wednesday, December 19, 2012
  • by
  • Shah Nawaz
  • बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए पुरुषों में 'पुरुष' होने का दंभ भी एक कारण है। पुरुषों को बचपन से यह ही यह अहसास दिलाया जाता है कि वह पुरुष होने के कारण महिलाओं से 'अलग' हैं, उनका होना ज्यादा अहमियत रखता है।

    अगर हम बचपन से बेटों को विशेष होने और लड़कियों को कमतर होने का अहसास कराना बंद कर दें तो स्थिति काफी हद तक सुधर सकती है। क्योंकि इसी अहसास के साथ जब वह बाहर निकलते हैं तो लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार करने में मर्दानगी समझते हैं। उनकी नज़रों में लड़कियां 'वस्तु' भर होती हैं।

    यह सब इसलिए है क्योंकि बचपन से बेटों और बेटियों में फर्क किया जाता है। समाज बेटियों को 'सलीकेदार' और बेटों को 'दबंग' बनते देखना चाहता हैं। बेटियां घर का काम करेंगी, बेटे बाहर का काम करेंगे... बचपन से सिखाया जाता है कि खाना बनाना केवल बेटियों को सीखना चाहिए। सारे संस्कार केवल बेटियों को ही सिखाये जाते हैं, कैसे चलना है, कैसे बैठना है, कैसे बोलना है, इत्यादि। क्या हम यह सोचते हैं  कि जिन्हें हमने शुरू से ही निरंकुश बनाया है, वह बड़े होकर शिष्टाचार फैलाएंगे? आज समय इस खामखयाली से बाहर आने का है।

    हमें प्रण लेना चाहिए कि अपने घर में बेटों और बेटियों में फर्क करना बंद करें। बेटों में पुरुष होने के दंभ को ना पनपने दें, बल्कि एक-दूसरों का सम्मान करना सिखाएं।  बचपन से ही सामाजिक जिम्मेदारियों को ना केवल समझाने बल्कि उसको आचरण में लाने पर मेहनत की आवश्यकता है। समाज में हमें कैसे रहना चाहिए यह सीखने-सीखाने की मश्क हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा होना चाहिए।

    घर के हर काम-काज में दोनों की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करें, घर और बाहर के कामों के लिए दोनों में एक सी निपुणता आज के समय की मांग भी है। साथ-ही-साथ बेटियों को शारीरिक तौर पर अपनी सुरक्षा स्वयं करने में सक्षम बनाने की भी कोशिशें होनी चाहिए। और यह केवल नाम मात्र के लिए नहीं बल्कि प्राइमरी कक्षा से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक, शारीरिक अभ्यास के लिए समय निर्धारित होना चाहिए, बल्कि इसको एक अनिवार्य विषय घोषित होने की आवश्यकता है।

    जब तक पुरुषों को ताकतवर और महिलाओं को कमज़ोर समझने की धारणा रहेगी, तब ऐसी घटनाओं का समाप्त होना मुश्किल है।

    केवल सख्त कानून, जल्द सज़ा और पुलिस की मुस्तैदी भर से बलात्कार जैसे घिनौने अपराधों को नहीं रोका जा सकता है। हर बलात्कारी को पता है कि वह एक ना एक दिन पकड़ा ही जाएगा, उसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं इस कदर तेज़ी से बढ़ रही हैं। अमेरिका, इंग्लैण्ड, स्वीडन और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में पुलिस भी मुस्तैद है, कानून भी सख्त है और फैसले भी जल्दी होते है, इसके बावजूद बलात्कार के सबसे ज़्यादा मामले इन्ही देशों में होते हैं। बल्कि हिन्दुस्तान से कई गुना ज़यादा होते हैं।

    आज ज़रूरत बड़े-बड़े नारों या बड़े-बड़े वादों की नहीं है। बल्कि असल ज़रूरत चल रही कवायदों के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर जागरूकता पैदा करने की है, महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की है।

    अगर हम बदलाव लाना चाहते है तो शुरुआत हमें अपने से और अपनों से ही करनी होगी। वर्ना  कहने-सुनने के लिए तो कितनी ही बातें हैं... यूँ ही कहते-सुनते रहेंगे और होगा कुछ भी नहीं!





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    धर्म के नाम पर अधर्म कब तक?

  • Sunday, November 25, 2012
  • by
  • Shah Nawaz
  • धर्म का मकसद इंसान का ताल्लुक पालनहार से जोड़ना है और धर्म इंसानों से मुहब्बत सिखाता है। लेकिन धर्म की सही जानकारी नहीं रखने वाले लोग दुनिया के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं। उन्हें कोई परवाह नहीं होती कि  उनके कारण चाहे किसी को कितनी भी परेशानी होती रहे।

    मुहर्रम के नाम पर कल रात साड़े ग्याराह बजे (11.30 p.m.) तक लोग हमारे घर के सामने कान-फोडू ढोल के साथ हुडदंग मचाते रहे, और उसके बाद आगे निकल गए और लोगो को परेशान करने के लिए। उनके चेहरों की मस्ती बता रही थी कि उन्हें शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन (रज़ी.) की शहादत के वाकिये से कोई वास्ता नहीं था।  उनका वास्ता था, तो केवल और केवल अपने हुडदंग और मस्ती से, जिसे धर्म के नाम पर ज़बरदस्ती बाकी लोगो पर थोपा जा रहा था। 

    अजीब बात है कि आम मुसलमानों को यह दिखाई  नहीं देता कि यह लोग शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन को अपनी श्रद्घांजलि देने की जगह उनके नाम पर मस्ती और हुडदंग मचाते है। और ऐसा किसी खास धर्म या समुदाय के लोग ही नहीं करते, बल्कि हर धर्म में ऐसे लोग मौजूद हैं।

    सुबह सही से होने भी नहीं पाई थी, तड़के 5 बजे प्रभातफेरी के नाम पर लाउडस्पीकर के साथ शोर मचाना शुरू कर दिया गया। धार्मिक स्थलों पर रोजाना सुबह-सुबह इसी तरह लोगो को परेशान किया जाता है। पूजा-अर्चना / इबादत का ताल्लुक स्वयं से होता है, मगर अपनी इबादत में ज़बरदस्ती दूसरों को शामिल क्यों किया जता है? मेरा घर तो फिर भी थोडा दूर है, सोचता हूँ कि जिनका घर बिलकुल करीब है वह कैसे प्रतिदिन इस कडवे घूँट को पीते होंगे। हिंदुस्तान जैसे धर्म प्रधान देश में इस तरह कडवे घूँट पीना मज़बूरी है, क्योंकि जो विरोध करता है उसे धर्म विरोधी ठहरा दिया जाता है। 

    एक दूसरों के धार्मिक स्थल के करीब पहुँच कर तो इस तरह की हुडदंग और भी बढ़ जाती है, देश में सबसे अधिक दंगे इस तरह की प्रवित्तियों के कारण ही होते हैं।

    शहर में अक्सर लोग रात की ड्यूटी करके आते हैं, लेकिन इन लोगो को कोई फर्क नहीं पड़ता है, चाहे कोई बीमार हो, किसी की नींद खराब हो या फिर किसी की पढ़ाई को नुक्सान हो रहा हो। आखिर यह धर्म के नाम पर अधर्म हम पर कब तक थोपा जाएगा? 

    परेशानी का सबब तो यह है कि इस दिखावे नामक अधर्म को धर्म के नाम पर परोसा जा रहा है,  हमारे देश में इन तथाकथित धार्मिक लोगो पर कानून का कोई डर नहीं होता। और सरकार से तो कोई उम्मीद करना ही बेमानी है।




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    मेरी बिटिया 'ऐना' का जन्म दिन

  • Monday, October 22, 2012
  • by
  • Shah Nawaz


  • आज मेरी प्यारी सी बेटी 'ऐना' का जन्म दिन है, माशाल्लाह आज वोह पूरे सात वर्ष की हो गयी है.

    और हाँ उसने एक छोटी सी कविता लिखी है, जिसे मैंने उसी समय मोबाइल पर टाइप कर लिया था। आज उसने उस कविता को अपने ब्लॉग पर भी शेयर किया है. आप उसके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं.

    फूलों की तरह महको 
    चिड़िया की तरह चहको।




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    अरविन्द केजरीवाल और बदलाव की उम्मीद

  • Sunday, September 23, 2012
  • by
  • Shah Nawaz

  • अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में देश को बदलाव की उम्मीद नज़र आती है। लेकिन बदलाव के लिए उन्हें राजनेताओं के घिसे-पिटे तरीके से हट कर चलना होगा। उन्हें साबित करना होगा कि वह देश के वर्तमान नेताओं से अलग हैं, उनके पास केवल वादे या विरोध नहीं है बल्कि नीतियाँ हैं।

    अगर अरविन्द यह कहते हैं कि "एफडीआई देश के गरीबों के खिलाफ है", या यह कि "डीज़ल पर सब्सिडी वापिस ली जानी चाहिए" तो ऐसा तो अन्य  राजनैतिक दलों के नेता भी बोलते हैं। बल्कि उनसे तो देश को यह अपेक्षा है कि वह बताते कि एफ.डी.आई. आखिर कैसे देश के गरीबों के खिलाफ है? इससे देश के गरीबों, किसानो खुदरा व्यापारियों को क्या-क्या नुक्सान उठाने पड़ेंगे। उन्हें यह समझाना चाहिए था कि 'वालमार्ट' ने अपनी सप्लाई-चैन को जिस तरह से सर्वश्रेष्ठ बनाया वह उससे भी अधिक मज़बूत बनाना जानते हैं। उन्हें प्लान देना चाहिए था कि आखिर कैसे वह भारतीय किसानो और खुदरा व्यापारियों के बिचौलियों को समाप्त करेंगे जिससे किसानो को उनका सही हक मिल सके। बल्कि उन्हें प्लान लेकर आना चाहिए कि वह किस तरह मिलावट करने वालों के खिलाफ कार्यवाही करेंगे, जिससे कि आज पूरा देश त्रस्त है। अगर देश को 'वालमार्ट' की कमियों के कारण 'वालमार्ट' नहीं चाहिए तो उसकी खूबियों को कैसे भारतीय कंपनियों का हिस्सा बनाया जाएगा?

    अगर वह यह मानते हैं कि विदेशी कम्पनियाँ देश में नहीं आनी चाहिए तो फिर वह कैसे भारतीय कंपनियों को इस बात पर अमादा करेंगे की वह अपने कर्मचारियों को उनकी योग्यता अनुसार अधिक से अधिक वेतन देकर अपने लाभ को कम करें। अगर वह बदलाव की आशा जगाते हैं तो उन्हें इसका हल निकालना ही होगा कि किस तरह आज भी लाला कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को निम्नतम वेतन पर रखकर उनकी मज़बूरी का फायदा उठाती है और इसी कारण कितनी ही भारतीय प्रतिभाएं देश से पलायन पर मजबूर हो जाती हैं।

    समझदारी केवल यह कह लेने भर में नहीं है कि  "डीज़ल / रसोई गैस पर सब्सिडी वापिस ली जानी चाहिए" बल्कि इसमें है कि वह समझाएं कि आखिर  डीज़ल / रसोई गैस  पर सब्सिडी क्यों नहीं हटाई जानी चाहिए? या सब्सिडी कम ना करने से होने वाले नुक्सान के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। किस तरह आम आदमी के खून-पसीने की कमाई को अमीर ट्रांसपोर्टर्स और महंगी डीज़ल कार अथवा बिजली जेनरेटर्स  के मालकों को फायदा उठाने से रोका जाएगा।

    उन्होंने कहा कि दिल्ली में बिजली महंगी करने में सरकार और बिजली कंपनियों में सांठ-गाँठ है। यहाँ उन्होंने भी बिना सबूत अथवा तथ्य पेश किये, केवल आरोप ही लगाए। फिर उनमें और दूसरे नेताओं में क्या फर्क रहा?

    केवल 'आरोप लगाने के लिए आरोप' तो मैं कम से कम पिछले 25 वर्ष से हर एक नेता से सुनता आ रहा हूँ। फिर बदलाव के लिए उनपर ही भरोसा क्यों करूँ?




    Keywords: arvind kejriwal, future of india, bhrashtachar, india against corruption, wall-mart, wall mart, mnc companies, FDI, subsidy

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