जीवन नहीं समय अनमोल है

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  • Shah Nawaz
  • डेंगू, चिकन गुनिया जैसी बीमारियों से निपटने में हमारी उदासीनता और जीवन को जोखिम में डालने की हमारी आदतों पर दैनिक जनवाणी में मेरा कटाक्ष...

    "हरियाली होने का भी बड़ा नुकसान है, सबसे पहला नुकसान तो यही है कि फिर इसे बचाए रखने की मेहनत करनी पड़ती है, अब आप ही बताईए कि इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में किसके पास समय है? यह कहावत नहीं बल्कि सच्चाई है कि आज के समय में हमारे पास सांस लेने का भी समय नहीं है। अब यह कोई भी पर्यावरणविद नहीं बताता कि भला जिस काम के लिए हमारे पास समय तक नहीं है, उसके लिए क्यों इतनी मेहनत की जाए?

    असल बात यह है कि आज हमारे पास बाकी कामों के लिए तो फिर भी समय है, लेकिन इस कमबख्त जीने के लिए ही नहीं है। जीवन जीना आज के समय की सबसे बेकार चीज़ हो गई है, अगर विश्वास नहीं होता है तो लोगों को अपने हाथ से पेड़ों को काटते हुए देख सकते है। सरकारी कर्मचारी इस पुन्य के काम में पूरी मदद करते हैं, ना सिर्फ मदद बल्कि अपना भी पूरा योगदान देते हैं। और यही कारण है कि अच्छा-खासा बजट होने के बावजूद सड़कों के इर्द-गिर्द हो सकने वाली ग्रीन बेल्ट अधिकारियों/कर्मचारियों की नामी-बेनामी आय की शोभा बढ़ा रही होती है।

    हम में से अक्सर सभी को पता होता है कि डेंगू/चिकनगुनिया/मलेरिया इत्यादि को फैलाने वाले मच्छर साफ़ पानी में जमा होते हैं और यह बिमारी घर या फिर उसके आस-पास 200 मीटर क्षेत्रफल में 7 दिन तक जमा साफ पानी में पनपे मच्छर से ही लगती है। फिर भी हर साल लाखों लोग बुरी तरह बीमार पड़ते हैं, हज़ारों लोग मर जाते हैं, पर क्या कोई भी अपने घर या फिर आस-पास किसी बोतल, टूटे हुए या फिर प्साटिक के ग्लास, कूलर इत्यादि में जमा साफ पानी को हटाने का समय निकाल पाता है? नहीं ना? क्या करें जब किसी के पास इतना काम करना तो छोडो करने की सोचने का भी समय ही नहीं है! बीमार पड़ेंगे तब की तब देखेंगे, वैसे भी बीमार पड़ने के लिए तो समय निकल ही आएगा, आफिस से भी छुट्टी मिल जाएगी और अगर भगवान को प्यारे हो गए तब तो कईयों को कई दिन की छुट्टी मिल जाएगी।


    वैसे अगर आप सड़क पार करते हुए या फिर गाड़ी चलाते हुए लोगों पर नज़र दौड़ाएंगे तो आपको विश्वास हो जाएगा कि आज के इंसान की नज़र में जीवन से ज़्यादा महत्त्व समय का है, हालांकि यह भी है कि हमारे देश के लोग बड़े जाबांज़ होते हैं, चंद मिनट बचाने के लिए जान पर खेलकर सड़क पास करते हैं, एक-दूसरी गाड़ी को तेज़ हार्न बजाते हुए पूरी जाबांज़ी से ओवरटेक करते हुए सबसे आगे निकल जाते हैं। चाहे राँग साईड से ही क्यों ना निकलना पड़े, पर सबसे आगे निकलकर ही दम लेते हैं। इसे लेकर हम इतने सजग हैं कि बच्चों को प्रतिदिन समय का सदुपयोग सीखाने के लिए स्कूल की वैन या फिर बस के ड्राईवर को नियुक्त किया हुआ है। वोह बचपन से ही बच्चों को जाबांज़ बनना और एक-एक पल बचाना सिखा देते हैं, क्या कहा जीवन? अगर वोह ज़्यादा महत्वपूर्ण होता तो हम मेहनत उसके विरुद्ध नहीं बल्कि उसके लिए कर रहे होते।"

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    मेरा वजूद बदलता दिखाई देता है

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  • Shah Nawaz
  • उधर से चिलमन सरकता दिखाई देता है
    इधर नशेमन फिसलता दिखाई देता है

    तुझे पता क्या तेरे फैसले की कीमत है
    मेरा वजूद बदलता दिखाई देता है

    उमड़-उमड़ के जो आते हैं मेघ आँगन में
    फटा सा आँचल तरसता दिखाई देता है

    कई रातों से भूखा सो रहा था जो बच्चा
    आज फिर माँ से उलझता दिखाई देता है

    झूठे वादों की लोरियों से परेशां है जो
    वही हाकिम से झगड़ता दिखाई देता है

    अरे पैसों के गुलामों कभी तो यह देखो
    क़ैद में पंछी तड़पता दिखाई देता है

    - शाहनवाज़ 'साहिल'

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    कहो कब तलक यूँ सताते रहोगे

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  • Shah Nawaz

  • कहो कब तलक यूँ सताते रहोगे  
    कहाँ तक हमें आज़माते रहोगे  

    सवालों पे मेरे बताओ ज़रा तुम  
    यूँ कब तक निगाहें झुकाते रहोगे  

    हमें यूँ सताने को आख़ीर कब तक  
    रक़ीबों से रिश्ते निभाते रहोगे  

    वो ग़म जो उठाएँ हैं सीने पे तुमने  
    बताओ कहाँ तक छुपाते रहोगे 

    - शाहनवाज़ 'साहिल' 

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    पकड़ ले आइना हाथों में बस उनको दिखाता चल

  • by
  • Shah Nawaz
  • हज़ारों साज़िशें कम हैं सियासत की अदावत की
    हर इक चेहरे के ऊपर से नकाबों को हटाता चल

    कभी सच को हरा पाई हैं क्या शैतान की चालें?
    पकड़ ले आइना हाथों में बस उनको दिखाता चल

    करो कुछ काम ऐसे भी अदावत 'इश्क़' हो जाएं
    रहे इंसानियत ज़िंदा, मुहब्बत को निभाता चल

    भले कैसा समाँ हो यह, बदल के रहने वाला है
    कभी मायूस मत होना, यूँही खुशियाँ लुटाता चल

    - शाहनवाज़ 'साहिल' 

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    मेरे वतन में तो 'मज़हब' हैं दोस्ती के लिए...

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  • Shah Nawaz
  • यह हमारा हिन्दोस्तां है, जहाँ मज़हब दोस्ती का सबब है, जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग साथ रहते हैं, खाते हैं, पढ़ते हैं और साथ ही अपनी-अपनी पूजा भी कर लेते हैं....

    हज़ारों साज़िशें कमतर हैं दुश्मनी के लिए
    मेरे वतन में तो 'मज़हब' हैं दोस्ती के लिए
    - शाहनवाज़ 'साहिल'


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    उन जवानों का कर्ज़ा चुकाएंगे कब?

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  • Shah Nawaz
  • सियाचिन ग्लैशियर में हिमस्खलन से हुई हमारे जवानों शहादत की खबर ग़मगीन कर गई! देश की हिफाज़त की ख़ातिर सरहदों पर लड़ने वाले हमारे जवानों की जज़्बे और शहादत को सलाम...


    हम यूँ आज़ादियों की हर इक जद में हैं
    क्योंकि क़ुर्बानियाँ उनके मक़सद में है

    उन जवानों का कर्ज़ा चुकाएंगे कब?
    जो हमारी हिफाज़त को सरहद पे हैं

    - शाहनवाज़ 'साहिल'

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    ग़ज़ल: सच अगर आया ज़ुबाँ पर फासला हो जाएगा

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  • Shah Nawaz
  • यूँ ना देखो दुनियाभर में तब्सिरा हो जाएगा 
    फ़क़्त बस बैठे-बिठाए मसअला हो जाएगा 

    होंट हिलते ही नहीं हैं आप हो जब सामने
    आप ही कोशिश करो तो हौसला हो जाएगा 

    रेत पर बच्चे की मेहनत लहरों से टकरा गई
    पर 'घरौंदा' टुटा तो वो ग़मज़दा हो जाएगा 

    दिल अभी महफूज़ है महफ़िल के कारोबार से
    आप गर चाहेंगे तो यह मुब्तिला हो जाएगा 

    आ करूँ में आज तुझसे दिलरुबा यह फैसला
    और भी कुछ ना हुआ तो तजरुबा हो जाएगा 

    ग़ैर के तो ऐब हमने रात-दिन देखा किये
    अपने देखेंगे तो यह दिल आईना हो जाएगा 

    चापलूसी पर टिकें हैं 'साहिल' रिश्ते आज के
    सच अगर आया ज़ुबाँ पर फासला हो जाएगा 

    - शाहनवाज़ 'साहिल'

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    हर दिल लुभा रहा है, यह आशियाँ हमारा

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  • Shah Nawaz
  • गणतंत्र दिवस पर आप सभी को ढेरों शुभकामनाएँ!

    हर दिल लुभा रहा है, यह आशियाँ हमारा
    हर शय से दिलनशी है, यह बागबाँ हमारा

    हर रंग-ओ-खुशबुओं से हर सूं सजा हुआ है
    गुलशन सा खिल रहा है, हिन्दोस्ताँ हमारा

    हो ताज-क़ुतुब-साँची, गांधी-अशोक-बुद्धा
    सारे जहाँ में रौशन हर इक निशाँ हमारा

    हिंदू हो या मुसलमाँ, सिख-पारसी-ईसाई
    यह रिश्ता-ए-मुहब्बत, है दरमियाँ हमारा

    सारे जहाँ में छाया जलवा मेरे वतन का
    हर दौर में रहा है, भारत जवाँ हमारा

    हमने सदा उठाया इंसानियत का परचम
    हरदम ऋणी रहा है, सारा जहाँ हमारा

    - शाहनवाज़ 'साहिल'

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    ग़ज़ल: मिलने-जुलने का ज़माना आ गया

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  • Shah Nawaz
  • जब भी तेरा ज़िक्र महफिल में हुआ
    मिलने का दिल में बहाना आ गया

    उसने जो देखा हमें बेसाख़्ता
    मायूसी को मुस्कराना आ गया

    आप क्यों बैठे हैं ऐसे ग़मज़दा
    मिलने-जुलने का ज़माना आ गया

    उसने जो महफ़िल में की गुस्ताखियाँ
    हर इक को बातें बनाना आ गया

    हम ज़रा सा नर्म लहज़ा क्या हुए
    दुनिया को आँखे दिखाना आ गया

    अभी तो सोलह भी पूरे ना हुए
    आशिक़ों का दिल चुराना आ गया

    -शाहनवाज़ 'साहिल'

    फ़िलबदीह मुशायरा 042 में लिखी यह ग़ज़ल

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