निकाह की 'हाँ'



हमारे देश के मुस्लिम समुदाय में विशेषकर उत्तर भारत में लड़कों और खासकर लड़कियों से शादी से पहले अकसर उनकी मर्ज़ी तक मालूम नही की जाती है, एक-दुसरे से मिलना या बात करना तो बहुत दूर् की बात है... रिश्ते लड़के-लड़की की पसंद की जगह माँ-बाप या रिश्तेदारों की पसंद से होते हैं. ऐसी स्थिति में निकाह के समय काज़ी के द्वारा 'हाँ' या 'ना' मालूम करने का क्या औचित्य रह जाता है???


शादी के बाद पति-पत्नी विवाह को नियति समझ कर ढोते रहते हैं और हालत से समझौता करके जीवनी चलाते है...

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम‌) ने शादी का प्रस्ताव देने वाले को वसीयत की है कि वह उस महिला को देख ले जिसे शादी का प्रस्ताव दे रहा है। मुग़ीरा बिन शोअबा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने एक औरत को शादी का पैगाम दिया तो इस पर नबी (स.) ने फरमाया:

 
“तुम उसे देख लो क्योंकि यह इस बात के अधिक योग्य है कि तुम दोनों के बीच प्यार स्थायी बन जाये।’’
इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 1087) ने रिवायत किया है और उसे हसन कहा है तथा नसाई (हदीस संख्या: 3235) ने रिवायत किया है।

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केजरीवाल जी, यह वक़्त ज़िम्मेदारी निभाने का है

यह वक़्त ज़िम्मेदारी से भागने का नही बल्कि ज़िम्मेदारी निभाने का है. लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और अगले 6 महीने में जनता से जो वादे किए हैं उनकी झलक दिखाई जा सकती है. लोकपाल लागू किया जा सकता है, बिजली के दाम कम किए जा सकते हैं, पानी मुफ्त किया जा सकता है, भ्रष्टाचारियों / काला बाज़ारियो पर लगाम लगाई जा सकती है, और सबसे बढ़कर तो यह कि सामाजिक स्तर पर जागरूकता फैलाई जा सकती है. तो फिर आगे बढ़ते क्यों नही?


क्यों नही 'आप' के नव-निर्वाचित विधायक आज से ही सड़कों पर उतरते हैं, यह देखने के लिए कि कहीं सरकारी अस्पतालों में गरीबों को इलाज से वंचित तो नही किया जा रहा है? कहीं पुलिस थानो में आम आदमी की शिकायतों को अनदेखा तो नही किया जा रहा है? दफ्तरों में रिश्वत का जो निज़ाम चलता है, उससे लोगो को बचाने की कोशिश करनी चाहिए. उनको देखना चाहिए कि कहीं सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस जाम हटाने की जगह आज भी चालान का डर दिखा कर अपनी जेबें तो नही भर रही है? आज भी सड़कों पर अवैध पर्किग के द्वारा जनता को परेशान किया जा रहा है, दुकानदारों के द्वारा सड़कों पर अवैध कब्जा किया जा रहा है, ऐसे में इनका फर्ज़ है कि ध्यान दें कि शिकायत संबंधित विभागों में की जा रही है और एक्शन लिया जा रहा है या नही?

आम आदमी ने आपकी तरफ़ उम्मीद की निगाह से देखा है, उनकी उम्मीद की लौ को बुझने से बचाने के लिए कमर कसिये टीम अरविंद! योजना बनानी शुरू करिये कि कैसे आपके क्षेत्र में ट्रैफिक जाम से छुटकारा दिलाया जा सकता है? कहाँ-कहाँ सड़कों पर गड्डों की एमसीडी में शिकयत तक नही हुई हैं? कहाँ पर बिल्डर पैसा खिला कर गैर-कानूनी कम कर रहे हैं? इन सब या इन जैसी अनेकों परेशानियों से आम आदमी को निजात दिलाने की ईमानदार कोशिश के लिए किसी काँग्रेस या भाजपा से समर्थन की ज़रूरत नही है...

हालाँकि सरकार बनाने के लिए भी किसी दल के समर्थन की आवश्यकता नही है बल्कि आज की स्थिति के अनुसार दूसरे दलों को आपकी सरकार गिरानी पड़ेगी, जो किसी भी दल के लिए कम से कम अगले लोकसभा चुनाव से पहले तो संभव नही है. और यही मौका है यह दिखाने का कि बात केवल वादों, प्रदर्शन की नही थी बल्कि ज़मीन पर उनको हक़ीक़त में बदलने का इरादा था. अगर काँग्रेस या भाजपा आपकी सरकार गिराने की कोशिश करेंगे तो ख़ुद अपनी स्थिति ही खराब करेंगे. और फिर कैसे आप इस मुश्किल समय में राजनैतिक नफ़े-नुकसान को जनता के हित से ऊपर करके देख सकते हैं? अगर ऐसा ही है तो फिर क्या फर्क राह जाएगा आपमें और बाकी राजनैतिक दलों में?

आज जनता ने जो मौका दिया है उसे गँवाए बिना अरविंद केजरीवाल को आगे बढ़कर दिल्ली में सरकार बनानी चाहिए. उनको दिखाना चाहिए कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले सरकार चला कर दिखा सकते हैं, बद्लाव ला कर दिखा सकते हैं... वरना मायूस जनता उसी ढर्रे पर वपिस लौट जाएगी, उसी सोच के साथ कि 'कुछ नही हो सकता' और 'यहाँ तो ऐसे ही चलता है'!






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परिस्थितियों को आत्म विश्वास से करें काबू



जब आपका मजाक उड़ाया जाता हैं तब इसको नियति ना बनने दें, बल्कि ऐसी परिस्थिति में इस चुनौती को आप अपने दृढ़ विश्वास के द्वारा और भी अधिक आसानी से अपने हित में कर सकते हैं.

मजाक उड़ाना एक नकारात्मक प्रतिक्रिया है, जिसके कारण सकारात्मक प्रवत्ति के लोग दुगने वेग से आपके पक्ष में आएँगे - Shah Nawaz

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क्या टीम अरविन्द को मौका मिलना चाहिए?


मैं अन्ना जी और अरविन्द केजरीवाल दोनों का मुद्दों पर आधारित प्रशंसक हूँ, (बल्कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जागरूकता के मुद्दे पर बाबा रामदेव की भी प्रशंसा करता हूँ) हालाँकि मैं इनकी किसी भी गलत बात का कभी भी समर्थन नहीं करता, बल्कि खुलकर विरोध करता हूँ। क्योंकि मेरा मानना है कि सही बात का समर्थन हो, या ना हो, मगर गलत बात का विरोध हर हाल में होना चाहिए।

इसी आधार पर मैं यह मानता हूँ कि मुद्दों पर दोनों के बीच मतभेद हो सकते हैं और मतभेदों का होना गलत भी नहीं हैं। दोनों की राहें जुदा भी हो जाएं मगर फिलहाल तक मंज़िल एक ही नज़र आती है।

अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम ने एक कदम आगे बढ़कर जनता के बीच जाने का फैसला किया है, ताकि जनता उन्हें / उनके मुद्दों को / उनके द्वारा मुद्दों को उठाने के तरीके को या फिर उनके द्वारा व्यक्त किए गए समाधान को सीधे चुन सके या नकार सके। मुझे खुद यह लगता रहा है कि उनके द्वारा सुझाया गया भ्रष्टाचार के विरुद्ध 'जन लोकपाल' कानून पूरी तरह से व्यवहारिक नहीं है। कई मुद्दों पर मेरी राय अलग है, जिसे मैंने पहले भी कई बार अपने इस ब्लॉग एवं टिप्पणियों के माध्यम से व्यक्त किया है। मगर उनका यह कदम उन्हें अपने सुझावों को लागु करने का उत्तरदायित्व उठाने वाला दिखाता है।




इसके बावजूद मैं यह भी मानता हूँ कि हममे से अधिकतर ने इन्हे अभी तक मीडिया या व्यक्तिगत तौर पर केवल जाना भर है, पहचाना नहीं है। और मुझे लगता है कि पहचानने के लिए मौका दिया जाना चाहिए, क्योंकि तस्वीर उसके बाद ही साफ़ हो पाएगी।








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घटिया राजनीती - ऊबते लोग


दिल्ली में RaGa और मध्य प्रदेश में NaMo की रैलियों में भीड़ नदारद होने लगी है, लाखों की भीड़ का दावा करने वाले दस-बीस हज़ार लोगो को भी नहीं जुटा पा रहे हैं... यह बताता है कि जनता नेताओं से ऊब रही है... जिस तरह की राजनीती और बयानबाज़ी चल रही है, उससे देख कर यह ऊब जायज़ भी लगती है...


देश में अनेकों बार चुनाव हुए, लेकिन जिस तरह की घटिया राजनीती इस बार हो रही है, वैसी कम से कम मेरे सामने तो कभी नहीं हुई. चुनाव में जीत के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, अपशब्द बोले जा रहे हैं, दंगे करवाये जा रहे हैं, साज़िशें रची जा रही हैं, तथ्यों को तोडा-मरोड़ा ही नहीं जा रहा बल्कि सिरे से ही बदलने की कोशिशें है...

और अगर आप इनके खिलाफ कुछ बोलों तो फौजें तैयार है आपके ऊपर सायबर हमलें करने के लिए.... पता नहीं अभी २०१४ तक क्या-क्या देखने / सहने को मिलने वाला है?

ख़ुदा खैर करे!!!
 
 
(Photo courtesy: Aajtak)

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शहादत-ए-हुसैन का पैग़ाम


यजीद अपनी बदबख्तियों पर दीन की मुहर लगाना चाहता था और इसीलिए वोह चाहता था कि हज़रत मुहम्मद मुस्तफा के प्यारे नवासे हुसैन (र.) उसकी बातों पर मुहर लगाएं, मतलब कि उसके हाथ पर बै'त करें। मगर हुसैन (र.) ने खुद अपने आप और अहल-ओ-अयाल का शहीद हो जाना पसंद किया लेकिन दीन को मिटते देखना गंवारा नहीं किया।

जिन लोगो ने मुहर्रम की दसवीं तारीख मतलब आज ही के दिन हज़रत हुसैन (रज़ी.) और उनके साथियों को इस कदर वहशियाना तरीके से शहीद किया वोह लोग यजीद और यजीदी सोच के पेरुकार थे... और उनका मक़सद किसी भी क़ीमत पर सत्ता पर कब्ज़ा था...

और यह सोच आज भी जिंदा है, चाहे वोह सत्ता मुल्कों की हो या समूहों की... और ऐसी सोच के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना और मज़हब के नाम पर हो रही बदबख्तियों के खिलाफ आवाज़ उठाना ही शहादत-ए-हुसैन का पैग़ाम है।

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इंसानी ग़ैर-बराबरी के खिलाफ आवाज़ बुलंद करें

जिस तरह से मेरा नाम मेरी पहचान है उसी तरह मेरे सरनेम से मेरे खानदान की पहचान जुडी है। इससे मैं किसी से बड़ा या छोटा नहीं होता। कोई भी इंसान बड़ा या छोटा केवल और केवल अपने विचारों और उस पर अमल से होता है। दुनिया में हर इंसान बराबर है। ज़ात/बिरादरी और मज़हब के नाम से जुडी इस छोटे-बड़े की ज़ंजीरों से निजात पाना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

इसके लिए ज़रूरत अपना सरनेम छोड़ने की नहीं बल्कि घटिया विचारों को छोड़ने की है। ऐसी सोच वालों की इस तरह की सोच का खुलकर विरोध कीजिये। जिस तरह मस्जिद में बिना भेदभाव कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होते है, आप ठीक उसी तरह दिलों में सबको बराबरी का भागिदार बनाइये।

उठिए, आवाज़ उठाइये!








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सृजन एवं सर्जक


एक तरफ सारी दुनियाओं का 'रब' है जो समंदर के अंधेरों में छोटे से कोमल जीव की रक्षा के लिए भी कठोर सीपियाँ बनाता है और वोह भी ला'तादाद एवं किसी की मदद के बिना...

ऐसी सीपियाँ जो देखने में खूबसूरती का बेजोड़ नमूना होती हैं, जबकि उन्हें देखने वाला कोई 'अक्लमंद' इंसान वहां मौजूद नहीं होता।

और दूसरी तरफ इंसान है जो बिना मशीनरी और कच्चे माल के कुछ भी बनाने में असमर्थ है, मगर फिर भी अकड़ता फिरता है।

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सत्य में पक्षपात कैसा?

हिन्दू की बात हो, ना कोई मुसलमान की
अब तो हर इक बात हो बस ईमान की

हिन्दू-मुसलिम की जगह सत्य की तरफदारी होनी चाहिए। अक्सर लोग ऐसा करते भी हैं, मगर कुछ लोगो को छोड़कर। जिनके लिए सही-गलत को देखने का चश्मा धार्मिक अथवा जातीय भेदभाव से प्रभावित होकर गुज़रता है। कुछ अज्ञानतावश ऐसा करते हैं तो कुछ राजनैतिक दुष्प्रचार के कारण पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर।

इस हालात से तभी निजात पाई जा सकती है, जबकि देश को धर्मों-जातियों में बाटने की राजनीति का देश से खात्मा कर दिया जाए!

 
हम शौक़ से हिन्दू या मुसलमान बनें
कुछ भी बन जाएँ मगर पहले इक इंसान बनें।

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रावण-दहन ना देख पाने की मायूसी


बेटियां बहुत नाराज़ थी! बड़ी बिटिया 'ऐना' बोली कि आप अच्छे नहीं हैं, आपने promise किया था और break कर दिया!

कल दोनों बेटियों को रावण दहन दिखाने ले कर गया था, मगर कल बहुत ही व्यवस्थित कार्यक्रम था। इस बार खाली मैदान के आगे बैठने का इंतजाम किया गया था, जिसको बड़े से पांडाल से कवर किया गया था। मगर उसमें अन्दर जाने के लिए बहुत लम्बी लाइन लगी थी।

हालाँकि पीछे से वीआईपी पास से जाने का इंतजाम था, मगर मुझे वहां से अन्दर जाना घंटों से लाइन में लगी इतनी भारी भीड़ के साथ अन्याय लगा। इसलिए मैं बाहर से ही बेटियों को किसी तरह समझा-बुझा कर वापिस ले आया... मगर उनका सारा उत्साह मायूसी में तब्दील हो गया!

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नेताओं की नकली धर्मनिरपेक्षता

नकली धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर 'धर्मनिरपेक्षता' को बदनाम करने वाली पार्टियाँ चाहे जितना मर्ज़ी धार्मिक भेदभाव फैलाएं, वोटों के लिए दंगों की साजिशों में शामिल रहें, इनकी छवि धर्मनिरपेक्ष ही रहने वाली है। 

हमारे बौद्धिक विकास के स्तर का इसी से अंदाज़ा लग जाता है। आज भी हम बड़े दुश्मन से निपटने के लिए छोटे दुश्मन का सहारा लेने वाली सोच के ग़ुलाम हैं

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हुक़्म नहीं है 'फतवा'

'फतवा' केवल सवाल करने पर ही दिया जाता है और मालूम करने वाले व्यक्ति के लिए ही होता है। ज़रूरी नहीं कि वह दूसरों के लिए भी सही हो। क्योंकि फतवा विशेष परिस्थिति के अनुसार इस्लामिक उसूलों की रौशनी में दी गयी 'सलाह' या 'मार्गदर्शन' का नाम है। तथा सम्बंधित व्यक्ति उसका पालन अथवा नज़रअंदाज़ कर सकता है। यहाँ तक कि एक ही परिस्थिति पर अलग-अलग राय के अनुसार 'फतवा' भी अलग-अलग हो सकता है।

किसी भी 'फतवे' की व्याख्या के लिए मालूम किये गए प्रश्न और परिस्थितियों का गहरा अध्यन आवश्यक होता है।

अक्सर 'फतवा' को 'हुक्म' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह सच नहीं है। हालाँकि जानकारी के अभाव में अक्सर लोग फतवे को हुक्म ही समझते हैं।



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क्योंकि मानसिक विक्षिप्त वोटर नहीं हैं


क्या विकास का फटा ढोल बजाने वाली सरकारों के पास सड़कों पर दर-बदर की ठोकरे खाने वाले मानसिक विक्षिप्त लोगो के लिए कोई प्लान नहीं है? उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है? उनकी मदद के लिए कोई बजट नहीं? या कोई ऐसा बिल जो मंत्रिमंडल समूह ने अप्रूव कर दिया हो या लोकसभा/राज्यसभा में हो? 

कुछ मानवीय संवेदनाएं बची हैं या बस वोटरों को ही लुभाया जाएगा? 

नहीं, बस यूँ ही मालूम कर लिया... सुना है आजकल 'भारत निर्माण' हो रहा है..

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पेन्सिल वर्क - रॉक स्टार

ऑफिस के एक सीनियर सहकर्मी के लिए पेन्सिल से बनाया उनका यह रॉक स्टार अवतार :-)










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'बेहया' औरतों का रेप करना मर्दों का हक़ है?

निर्भया केस में रेपिस्टों के वकील ने अपने घटिया बयान में क्या गलती की है? वह तो उसी सोच को ज़ाहिर कर रहा है जो इस पुरुष प्रधान समाज ने बनाई है। वह ही क्या बल्कि अधिकतर पुरुष सोचते है कि औरतें मर्दों की ग़ुलाम हैं। 

उनके हिसाब से बलात्कार के केस में गुनाहगार लड़की ही होती है। वह अकेली बाहर निकलेगी तो उस 'बेहया' की बोटियाँ नोचना मर्दों का हक़ बनता है। समाज चाहता है कि औरत पहले पति की गुलाम बने और उसके बाद बेटों की। और अगर पति या बेटे ना हों तो समाज के ठेकेदारों या फिर जिस्म के दलालों की ग़ुलामी करें, नहीं तो उन्हें पेट्रोल छिड़क कर जला दिया जाएगा या फिर तेज़ाब से झुलसा दिया जाएगा।

यक़ीन मानिये निर्भय केस पर भी अगर मिडिया/सोशल मिडिया और सड़क पर नौजवानों  के द्वारा आन्दोलन नहीं चलाया गया होता तो इस केस का हाल भी अन्य लंबित केसों जैसा ही होता। 

जिन लोगो को उसके बयान पर शर्म आ रही है, तो पहले वोह अपने समाज की सोच बदलने की चिंता करें, क्योंकि यह हमारे समाज की दबी हुई या छुपी हुई आवाज़ है।




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यह कौन से राजनेताओं की फोटो है?

Guess who are the politicians in the following picture?












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चुनावी मौसम में मासूमों की बलि

सेनाएँ तैयार हो चुकी हैं, सेनापति ताल ठोक रहे हैं... मासूम जनता की बलि चढ़ाई जा रही है... देश की फिज़ा को बदबूदार बनाए जाने की कोशिशें रंग ला रही हैं। पिद्दी से पिद्दी पार्टी का नेता भी हर हाल में प्रधानमंत्री बनना चाहता है... आखिर यह इलेक्शन होते ही क्यों हैं???

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वोटों के लालची इंसानियत की लाश के चीथड़े उड़ा रहे हैं


कुछ को लग रहा है मुसलमान मारे जा रहे हैं और कुछ को लग रहा है हिन्दू... किसी का भाई दंगो का शिकार हुआ है किसी का बेटा और किसी बाप... कितनी ही औरतों की आबरू को कुचल दिया गया... मगर हर इक अपने-अपनों के गम में उबल रहा है और दूसरों की मौत पर अट्टहास कर रहा है... घिन आती है इस सोच पर!

यक़ीन मानिये इन देशद्रोही नेताओं के हाथों इंसानियत को सरे-आम क़त्ल किया जा चुका है और अब रोज़-बरोज़ इंसानियत की मृत देह चीथड़े-चीथड़े की जा रही हैं।

ख़ुदा खैर करे!!! देश में इलेक्शन आने वाला है।

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कहानी हर घर की...

सास चाहती है बहु उसके 'हिसाब' से चले और बहु चाहती है कि सास उसके 'हिसाब' से!

वहीँ पिता चाहता है बेटा उसके 'हिसाब' से चलना चाहिए, मगर बेटे का 'हिसाब' कुछ दूसरा ही होता है। उधर पति चाहता है कि पत्नी पर उसका 'हिसाब' चले मगर पत्नी अपना 'हिसाब' चलाना चाहती है।

आखिर दूसरों पर अपनी सोच थोपने की जगह सब अपने-अपने 'हिसाब' से क्यों नहीं चलते?


वैसे मज़े की बात यह है कि जो दूसरों को अपने 'हिसाब' से चलाना चाहते हैं, वह खुद भी उस 'हिसाब' से नहीं चलते!!!



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कार्टून: रुपया गिर रहा है या सरकार?

Cartoon: It's a downfall of Rupees or Government?












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Juvenile Act बदलने के लिए आन्दोलन की आवश्यकता


दामिनी कांड के तथाकथित नाबालिग अभियुक्त को जो सज़ा हुई है, वोह कानून के मुताबिक तो एकदम ठीक हई है, मगर न्याय के एतबार से इस सज़ा को नहीं के बराबर ही कहा जाएगा। मुझे लगता है ध्यान और कोशिश इस सज़ा से भी अधिक ऐसे कानून को बदलने पर होनी चाहिए जिसके तहत रेप विक्टिम को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया। Juvenile Act को बदलने के लिए एक  बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है।

समय रहते चेतना होगा, ना केवल बलात्कार जैसे घृणित कृत बल्कि आतंकवाद जैसे समाज के लिए खतरनाक अपराधों में भी इस तरह के कानूनों के दुरूपयोग की पूरी संभावनाएं हैं। 

ज़रा सोचिए अगर कसाब 17 वर्ष का होता तो क्या होता???

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पश्चिम जगत अब उन्ही आतंकवादियो का समर्थक क्यों है?


जिन आतंकवादी संगठनों की हरक़तों के कारण पश्चिम जगत दुनिया के सारे मुसलमानों को आतंकवादी ठहराने पर तुला हुआ था, आज वही संगठन उनके लिए सीरिया में मुजाहिदीन हो गए? अब उन पर ड्रोन हमले नहीं बल्कि हथियार पहुंचाएं जा रहे हैं... आम फौजियों की तरह सैलिरी, हथियार और अन्य सुविधा मुहैय्या करवाई जा रही हैं?

और जब सारे हित साध लिए जाएँगे तो फिर से उनकी नज़र में सारे मुसलमान आतंकवादी हो जाएँ।

बंदर लडवा रहें हैं और बिल्लियाँ लड़ रही हैं और दूर बैठी बाकी बिल्लियाँ अपनी-अपनी पसंद की बिल्लीयोँ का समर्थन कर रहीं है।

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राजनेताओं के पोस्टर देखकर ख़याल आता है

सच-सच बताना...









अगर आपका सहमत हैं तो कहिये फिर











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प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह


हालाँकि प्रशासक के तौर पर प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह मेरी पसंद नहीं हैं, लेकिन प्रधानमंत्री होने के नाते और देश के तरक्की की राह पर अग्रसर होने में उनकी महत्तवपूर्ण भूमिका के कारण में उनकी इज्ज़त करता हूँ। हालांकि इस इज्ज़त का मतलब नाकामयाबियों पर चुप रहना भी नहीं हो सकता है।


उनके कार्यकाल के पहले आठ वर्ष बेहतरीन रहे हैं, जिसमें देश ने आर्थिक तौर पर तरक्की की नयी उचाईयों को छुआ है... और इसका क्रेडिट उनको मिलना चाहिए। चाहे जो भी कारण रहे हों, लेकिन उनके कार्यकाल में ना सिर्फ कश्मीर जैसे अशांत क्षेत्रों में हिंसा में कमी आई, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी आतंकवादी वारदातों में काफी कमी आई। उनके ही कार्यकाल में आरटीआई, नरेगा, शिक्षा का अधिकार और डायरेक्ट कैश ट्रान्सफर जैसे अनेकों महत्त्वपूर्ण निर्णय हुए हैं। हालाँकि बाद के दिनों में अर्थव्यवस्था की हालत नाज़ुक हुई, मगर इसके लिए सरकारी निर्णयों के साथ-साथ वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां भी ज़िम्मेदार कही जा सकती हैं।

लेकिन इसके बावजूद प्रशासक के तौर पर उन्हें अक्षम ही कहा जाएगा। और इसी कमी के कारण वह भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में नाकामयाब रहे हैं। सरकारी तंत्र की क्या बात की जाए, जबकि स्वयं उनके मंत्रियों पर ही भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे हों। हालाँकि जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उनको पद मुक्त किया गया और उन पर पुलिस कार्यवाही भी हुई। लेकिन सरकारी तौर पर उनको बचाने के भी भरपूर प्रयास हुए।

देश का प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की तरह ज़मीन से जुड़ा हुआ और इंदिरा गाँधी जैसा अच्छा प्रशसक होना चाहिए।  ऐसा व्यक्ति जो देश की अखंडता, आंतरिक सुरक्षा और देश के सामाजिक ताने-बाने को और मज़बूत करने एवं रखने में आगे बढ़कर नेतृत्व कर सके। केवल देश को तरक्की की राह पर अग्रसर रखने वाला ही नहीं बल्कि उस तरक्की को आम आदमी तक पहुचाने वाला भी होना चाहिए। अच्छे अर्थशास्त्री को तो देश का वित्त मंत्री बना कर भी काम चलाया जा सकता है। 

लोग अक्सर डॉ मनमोहन सिंह के कम बोलने का मज़ाक उड़ाते हैं, मगर मेरा मानना है कि देश को ज्यादा बोलने वाले और तेज़-तर्रार नेताओं ने ही डुबोया है, ज़रूरत बोलने वालो की नहीं बल्कि कम बोलने और ज्यादा काम करने वालो की है… फर्क बोलने ना-बोलने से नहीं बल्कि काम करने ना-करने से पड़ना चाहिए!









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सभी खास-ओ-आम को यौम-ए-आजादी मुबारक!


आप सभी को यौम-ए-आज़ादी मुबारक हो... इस आज़ादी को हासिल करने और बचाए रखने के लिए अनगिनत कुर्बानियाँ दी गयी हैं! आइये इस स्वतंत्रता दिवस पर हम प्रण करें कि हमारी कोशिश ऐसी हो कि वोह कुर्बानियाँ ज़ाया ना जाए। हमारी कोशिशें देश की फिज़ा को खुशगवार और तरक्की की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए, जहाँ कोई इतना गरीब ना हो कि भूख से मर जाए, हर इक को इलाज मयस्सर हो, हर बच्चा स्कूल जा पाए।

दुआ करें कि हम मानसिक गुलामी से जल्द से जल्द आज़ाद हो जाएँ! रब करे हमारे मुल्क़ को जल्द से जल्द मुकम्मल आज़ादी हासिल हो!

जय हिन्द!








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बयान और बस बयान


हमारे सैनिकों को शहीद करने वाले चाहे पाकिस्तानी सैनिक थे या नहीं थे, परन्तु आये तो उसी धरती से थे। वहीँ पर खुलेआम आतंकवादियों के ट्रेनिंग शिविर भी लगते हैं, जिन्हें वहां की सरकार खुलेआम संरक्षण देती है। जब आपने इतनी जल्दी उनकी पहचान पता कर के हमपर इतना उपकार कर ही दिया है तो आपको उनके ठिकानों की भी ज़रूर जानकारी होगी ही? तो कयों नहीं नेस्तनाबूद कर देते हैं एंटनी बाबू? फिर तो पाकिस्तानी सैनिक और आतंकवादियों का पर्दा भी नहीं रहेगा!

मानता हूँ कि हमारी सेनाएँ उनकी तरह नामर्द नहीं हैं जो चुपके से वार करें, मगर कमज़ोर भी नहीं हैं जो दुश्मन को उसके घर में घुसकर सबक ना सिखा सके!

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देशभक्ति की नई परिभाषा

आजकल देशभक्त (नई परिभाषानुसार "राष्ट्रवादी") होना कितना आसान है ना? किसी विशेष धर्म से ताल्लुक रखो, या फिर विशेष पार्टी अपना लो, या फिर देशभक्ति पर शेरो-शायरी करो, कविताएँ रचो, क्रिकेट टीम के जीतने पर जश्न मनाओ, पटाखे छोडो...

छोडिये, यह सब भी बस का नहीं है तो ब्लॉग / फेसबुक / ट्विटर पर स्टेटस / पोस्ट अपडेट करो, बस बन गए देशभक्त। फिर कुछ भी करते फिरो, चाहे घृणा फैलाओ, दंगे करो, रिश्वत लो-दो, दब कर मिलावट करो, खूब सड़कों पर कूड़ा फेकों, सड़के घेरों, अवैध कब्ज़े करो, झूठ बोल कर सामान बेचो, रास्तों के अवरोधक बनो, जगह-जगह थूकते फिरो इत्यादि इत्यादि...

सरहदों पर दुश्मन हवाओं का रुख मोड़ने और शहीद होने के लिए तो सेना के जवान हैं ना... बस उनकी याद में झूठे आंसू बहाना मत भूलना या फिर स्टेटस अपडेट!










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कब बनेंगे इंसान?

बटला हाउस इनकाउंटर हो या मालेगाँव ब्लास्ट, मामला चाहे इशरत जहाँ का हो या फिर साध्वी प्रज्ञा का, सबको अपने-अपने धर्म के चश्मे से देखा जाता है। मीडिया जिसके सपोर्ट में रिपोर्ट दिखाए वोह खुश दूसरों के लिए बिकाऊ मिडिया बन जाता है... कितने ही इन्सान मर गए या मार दिए गए, मगर किसी को गोधरा का ग़म है तो किसी को गुजरात दंगो का...

कब हर मामले को सभी चश्मे हटाकर इंसानियत की निगाह से देखा जाएगा? धर्मनिरपेक्षता पर लफ्फाजी और राजनीति की जगह इसकी रूह को समझने और अपनाने की ज़रुरत है... यक़ीन मानिये जब तक हम सब इसपर नही चलेंगे, देश में शांति, खुशहाली और तरक्की आ ही नहीं सकती है..

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मुसलमान और आज की ज़रूरत

भारत के मुसलमानों को लीडरशिप से ज़्यादा शिक्षा की ज़रूरत है... देश से मांगने की जगह देने के हालात बनाने होंगे।

मेरा यह मानना है कि समाज में बदलाव साक्षरता और जागरूकता फैलाने तथा गरीबों को ख़ुदमुख्तार बनाए जाने से ही आ सकता है। खासतौर पर आज की ज़रूरत महिलाओं और पुरुषों में शिक्षा का विस्तार, स्वास्थ्य, सामाजिक बराबरी, सामाजिक साझेदारी, दयानतदारी की भावना और अपने समाज के अन्दर तथा अन्य समाजों के साथ जोड़ की पुरज़ोर कोशिशों की है।

हकीक़त यह है कि इमदाद, ज़कात, फितरा, खैरात का अगर सही इस्तेमाल होने लगे तो किसी की ओर देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। इसके लिए ज़रूरी है अपना पैसा दान करते समय पूरी तरह छानबीन करें, बिना उचित जानकारी के एक भी पैसा ना दें। थोडा-थोडा पैसा अनेकों जगह देने की जगह कोशिश करें कि किसी एक ही जगह दें, जिससे कि बाद में हालात पर नज़र रखना आसान रहे। मदद अगर किसी शिक्षा संस्थान को दे रहे हैं तो यह अवश्य ध्यान रखें कि केवल दीनी तालीम से काम नहीं चलेगा, इसलिए अच्छी तरह से पुष्टि करलें कि शिक्षा स्तरीय हो। बल्कि खुद भी कभी-कभी जा कर चेक करें। ध्यान रखना ज़रूरी है कि अगर पैसा सही जगह नहीं लगा तो उसका सवाब (पुन्य) नहीं मिलेगा  और जो फ़र्ज़ है  उसे फिर से अता करना पड़ेगा।

आजादी के बाद जितनी भी मुस्लिम लीडर्स उभरे हैं, उसमें से अधिकतर ने राजनैतिक पार्टियों के हाथों कौम के वोटों के मोलभाव के अलावा कुछ नहीं किया।

मैं अपने स्तर पर कोशिशें कर रहा हूँ, आप अपने स्तर पर करें। लीडरशिप की ओर देखना छोड़ो, खुद उठो और आगे बढ़ो।










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कार्टून: सबसे आखिरी 'तार' राहुल गाँधी को मिला


मेरा द्वारा बनाया तीसरा कार्टून आपकी खिदमत में पेश है ;-)











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कार्टून: प्रणव मुखर्जी ने "खाद्य सुरक्षा बिल" की तारीफ की

मेरे द्वारा बनाया गया दूसरा कार्टून ;-) :










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बेहतरीन इबादत

सबसे बेहतरीन इबादतों में से एक है तन्हाई में अपने ईश्वर को याद करना, जहाँ तीसरा कोई नहीं हो... जैसे कि रात के अंधेरों में उससे बातचीत करना या फिर शौच या स्नान के समय कहना कि जिस तरह शरीर की गन्दगी से मुझे पाक़ किया उसी तरह मेरे विचारों की गन्दगी को भी दूर कर दे...

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मेरा पहला कार्टून - पीएम इन वेटिंग ने टिकट केंसिल किया

आखिरकार पीएम इन वेटिंग ने खुद ही टिकट केंसिल करके वेटिंग लिस्ट से अपना नाम वापिस ले लिया...





और कितना इंतज़ार किया जाए भाई? और वोह भी तब, जबकि टीटी पिछले दरवाज़े से किसी दूसरे का टिकट कन्फर्म करने की जुगत में है।

 





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आस्था या अंध-भक्ति

मुझे नहीं लगता कि कोई भी धार्मिक व्यक्ति कभी भी किसी बाबा या तांत्रिक के चक्कर में पड़ कर अपनी इज्ज़त-आबरू या पैसा बर्बाद कर सकता है... हाँ अंध-भक्त हमेशा ऐसा ही करते हैं। कितना सरल है ऐसे बाबाओं को पहचानना... अनैतिकता, पैसों के लालच का धर्म से कोई सम्बन्ध हो ही नहीं सकता है।

हमें यह समझना होगा कि यह सारी खराबी धर्म के साथ पैसे के घाल-मेल से ही शुरू होती हैं। अगर आप कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो सबसे अच्छा है कि ज़रुरतमंदों की मदद की जाए।

सबसे बड़ी कमी हमारी इस सोच में है कि जो धार्मिक है वह कभी गलत हो ही नहीं सकता है। और इसीलिए हम खोजबीन अथवा अपनी अक्ल लगाने की जगह उस पर आंख मूँद कर विश्वास कर लेते हैं। हम जिसे बड़ा मानते हैं कभी तहकीक ही नहीं करते कि वह जो कह रहा है वह धर्म सम्मत है भी या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह फ़कीर के भेस में शैतान हो।

किसी बाबा या धार्मिक स्थल पर दान देने से समाज का भला होने वाला नहीं है बल्कि इससे ही हज़ारों-लाखों धर्म की दुकाने चल निकली हैं। अगर धार्मिक स्थलों अथवा बाबाओं को दान देने पर रोक लगा दी जाए और हर एक धार्मिक नेता की बातों को आंखे बंद करके विश्वास कर लेने की जगह उसकी सच्चाई पर खोजबीन शुरू कर दी जाए तो धार्मिक दुकानदारी की समस्या जड़ से ही समाप्त हो जाएगी।

अभी पिछले दिनों कश्मीर में एक ढोंगी बाबा (गुलजार अहमद बट) युवतियों को पवित्र करने के नाम पर उनका दैहिक शोषण करता रहा और बेवक़ूफ़ अंध-भक्त उसके जाल में फंसते रहे। उसका कहना था कि जन्नत का रास्ता उसके साथ सेक्स करने से खुलता है... हद है बेवकूफी की भी। आखिर किसी अनैतिक कार्य का धर्म से सम्बन्ध कैसे हो सकता है?

धर्म सजगता सिखाता हैं अंध-भक्ति नहीं, ना तो किसी को धौखा दिया जाए और इतनी सजगता कि कोई हमें धौखा दे भी ना पाए।




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हिंसा के कुतर्क


"लोकतंत्र कमज़ोर है, वोट खरीदे जाते है, बूथ कैप्चर किये जाते है, मतगणना मे धांधली करवाई जाती है, विधायक और सांसद खरीदे जाते है, पूंजीवादी व्यवस्था है, भ्रष्टाचार फैला हुआ है" इत्यादि-इत्यादि.... यह सब हिंसा के समर्थन की कमज़ोर दलीलें बनी हुई हैं। जब लोग हिंसा के समर्थक होते हैं तो इसी तरह की कमज़ोर दलीलों को हथियार बना लेते हैं, उन्हें अपने से इतर विचार रखने वालों का खून बहना आसान तथा बदलाव के अहिंसक प्रयास असंभव लगते हैं। ऐसे लोग खास तौर पर लोकतंत्र के विरोधी होते हैं, क्योंकि उनकी नज़रों में उनके विचार ही अहमियत रखते हैं। इसी कारण  वह बाकी दुनिया के विचारों को रद्दी की टोकरी के लायक समझते हैं और उन विचारों को ज़बरदस्ती  कुचल देना चाहते हैं। और इसीलिए वह हिंसा का सहारा लेते हैं, जबकि हिंसा को किसी भी हालत में समाधान नहीं कहा जा सकता है... अगर सिस्टम ठीक नहीं है तो फिर सिस्टम को ठीक करने के प्रयास होने चाहिए।

ऐसा नहीं हैं कि हिन्दुस्तान में एक सीट पर भी लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव नहीं जीता जाता और सारी की सारी भारतीय जनता ही भ्रष्ट हैं। फिर अगर एक सीट भी जीती जा सकती है तो प्रयास से बाकी जगहों पर भी बदलाव लाया जा सकता है।

हमें यह समझना पड़ेगा कि अगर वोट खरीदे जाते हैं तो बिकने वाले वोटर आम जनता ही होती है। जितना खून-पसीना और पैसा हिंसा करने में बहाया जाता है अगर उतनी मेहनत लोगो में जागरूकता फ़ैलाने में लगाईं जाए तो बदलाव जाया जा सकता है। और अगर फिर भी लोगो में बदलाव नहीं आता तो समझ लीजिये लोग बदलना ही नहीं चाहते... फिर इतना खून-खराबा किसके लिए???





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नक्सलवाद या आतंकवाद


बेगुनाहों को क़त्ल करने का किसी को भी कोई हक़ नहीं है बल्कि गुनाहगारों को भी क़त्ल करने का हक़ किसी इंसान को नहीं होना चाहिए। गुनाहगारों को सज़ा हर हाल में कानून के दायरे में ही होनी चाहिए। और अगर किसी गुनाहगार को उसका गुनाह साबित किये बिना ही सज़ा होती है तो मेरी नज़र में वह बेगुनाह ही है।


हिंसा किसी भी हालत में जायज़ नहीं हो सकती है, अगर व्यवस्था गलत है तो व्यवस्था बदलो... अगर सरकार गलत है तो सरकारें बादलों... अगर कानून गलत हैं तो कानून बदलो... मगर बेगुनाहों को क़त्ल करने और क़ातिलों की कैसी भी दलील से समर्थन करने का हक़ किसी को भी नहीं है।

आखिर इतनी विभत्स तरीके से आतंक फ़ैलाने वाले नक्सलियों को क्यों आतंकवादी नहीं कहा जाता? आखिर क्यों नहीं यहाँ भी कश्मीरी आतंकवादियों को खत्म करने के तरीके की तरह लाखों की तादाद में फौजी भेजे जाते?

और सबसे अजीब बात यह है की अन्य आतंकवादी घटनाओं पर खौलने वाला खून आज ठंडा क्यों पड़ा है???






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इश्क-ए-हक़ीकी और उसकी नाराजगी


गुनाहों में मुब्तला रहने का मतलब है कि रब की नाराज़गी का खौफ दिल में नहीं है... और यह इसलिए है क्योंकि उससे इश्क़ का सुरूर अभी दिल पर छाया ही नहीं... महबूब से इश्क़ का अभी बस दावा है, दर-हकीक़त दावे से कोसो दूरी है!

उससे मिलन की चाहते तो हैं, लेकिन अपने फे`ल से लगता ही नहीं कि उसे भी अपने इश्क में मुब्तला करना चाहते हैं! वर्ना उसकी नाराजगी की ता`ब दिल में लाना मुमकिन हो सकता था क्या?


महबूब की नाराज़गी भी कोई दीवाना कभी सहन कर सकता है भला!!!

बल्कि "इश्क़" वोह शय है कि जिससे होता है, आशिक तो उसे सोते-जागते याद करने में ही लुत्फ़-अन्दोज़ होता रहता है। और जिसे मुझसे इश्क हो, फिर अगर मैं उससे मिलन की आस के आनंद में वशीभूत होता हूँ तो क्या वह मुझसे राज़ी नहीं होगा?






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पति-पत्नी: आज की ज़रूरत

हालाँकि सच यही है कि वैवाहिक रिश्ता एक-दूसरे से मुहब्बत और अपने 'हक़' की कुर्बानी पर ही टिका होता है। मगर कडुवी सच्चाई यह है कि अक्सर यह कुर्बानी लड़कियाँ ही ज्यादा देती हैं।


आज के हालातों को देखते हुए माता-पिता के द्वारा लड़कियों को बचपन से ही कम से कम इतना 'ताकतवर' और 'आत्मनिर्भर' बनाए जाने की कोशिशों की सख्त ज़रूरत है कि अगर पति 'ज़्यादती' करे तो वह उसे लात मार सके। कुर्बानियाँ देना तो बहरहाल सिखाया ही जाता है!

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सख्त कानून और पुलिस की मुस्तैदी भर से रुक जाएगी महिलाओं के प्रति दरिंदगी?

केवल सख्त कानून, जल्द सज़ा और पुलिस की मुस्तैदी भर से बलात्कार जैसे घिनौने अपराधों को नहीं रोका जा सकता है। हर बलात्कारी को पता है कि वह एक ना एक दिन पकड़ा ही जाएगा, उसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं इस कदर तेज़ी से बढ़ रही हैं।

अमेरिका, इंग्लैण्ड, स्वीडन और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में पुलिस भी मुस्तैद है, कानून भी सख्त है और फैसला भी जल्द होता है, इसके बावजूद बलात्कार के सबसे ज़्यादा मामले इन्ही देशों में होते हैं। बल्कि हिन्दुस्तान से कई गुना ज़यादा होते हैं।

आज ज़रूरत बड़े-बड़े नारों या बड़े-बड़े वादों की नहीं है। बल्कि असल ज़रूरत चल रही कवायदों के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर जागरूकता पैदा करने की है। ज़रूरत महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की है... ज़रूरत महिलाओं को भोग की वस्तु समझने जैसी सोच से छुटकारा पाने की है। ज़रूरत दिमाग से और बाज़ार से अश्लीलता समाप्त करने की है।

ज़रूरत अपने बच्चों में से भेदभाव को समाप्त करना की है, ज़हन में घर कर गए लड़के-लड़की के फर्क को  मिटाने की है। यह लड़कों का काम है, वोह लड़कियों का काम है जैसी बातों को समाप्त करना होगा।  बचपन से ही महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाना होगा। आखिर कब तब बेटों की दबंगता और बेटियों के छुई-मुई होने पर खुश होते रहेंगे? क्या समाज के ह्रास में और कोई कसर बाकी है?

आज असल कोशिश महिलाओं को इंसान समझने की होनी चाहिए, मगर उसके लिए कोई आंदोलन नहीं करना चाहता है, क्योंकि उसमें राजनैतिक फायदा मिलने की गुंजाईश नहीं है...

कम से कम शुरुआत अपने से और अपनों से तो की ही जा सकती है।





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दिल्ली में घूमती हैवानो की भीड़

दिल्ली के बाशिंदे हैवानियत की सारी सीमाएँ रोंदते जा रहे हैं, आखिर इसका ज़िम्मेदार कौन है?  हर बलात्कारी को पता है कि वह एक ना एक दिन पकड़ा ही जाएगा, उसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं इस कदर तेज़ी से बढ़ रही हैं।


परसों बस के अन्दर एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार किया गया, कल एक नेपाली युवती के साथ गैंग रेप और अब गांधी नगर इलाके में बच्ची से किराएदार के कई दिनों तक रेप करने का मामला सामने आ रहा है। हैरान कर देने वाली बात यह है कि अस्पताल में जिंदगी के लिए लड़ाई लड़ रही इस मासूम के पेट से डॉक्टरों को प्लास्टिक की शीशी और मोमबत्ती मिली है।
नर्सरी में पढ़ने वाली इस बच्ची को बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले युवक ने ही अगवा किया था। घरवाले बच्ची को इधर-उधर ढूंढते रहे, जबकि बच्ची उन्हीं के नीचे के कमरे में चार दिनों तक भूखी-प्यासी कैद रही। बच्ची के हाथ-पैर बांध दिए गए थे और बुरी तरह पीटा भी गया। वोह तो अचानक बच्ची के पिता को उसके रोने की आवाज़ आई, वर्ना वोह मासूम वहीँ दम तोड़ देती।

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जागते रहो

मेरे द्वारा सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने पर यह नहीं समझ लेना कि मैं कोई संत हूँ और बुराइयाँ मेरे अंदर नहीं हैं... बल्कि मेरा मानना है कि मेरे आवाज़ उठाने से सबसे पहला फायदा मुझे ही होगा... कोई माने ना माने, मेरे स्वयं के मान जाने की तो पूरी उम्मीद है ही...

जहाँ मुझे लगता है कि कोई बुराई समाज में व्याप्त है, वहां आवाज़ उठता हूँ, जिससे कि वह बुराई मेरे अन्दर से समाप्त हो जाए।

'जागते रहो' कि सदा लगाने वाले का मकसद कम-अज़-कम खुद को जगाने का तो होता ही है...


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तो क्या डंडों से सफाया होगा आतंकवाद का?


हद है... सीआरपीएफ के जवानों को कश्मीर पुलिस द्वारा घाटी में बिना हथियारों के लड़ने पर मजबूर किया जा रहा है। मतलब आधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों से लड़ने के लिए लकड़ी का डंडा??? इससे वह खुद की सुरक्षा करेंगे या आम जनता की?


 
इससे अच्छा तो यह है कि सीआरपीएफ की ज़िम्मेदारी कश्मीर पुलिस को ही दे दो, खुद ही भिड़ें आतंकवादियों से और वह भी लकड़ी डंडों के साथ!

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ईनाम की इच्छा







स्वर्ग तो अच्छे कर्म करने वालों के लिए रब की तरफ से ईनाम है और ईनाम की लालसा में अच्छे कर्म करने वाला श्रेष्ठ कैसे हुआ भला? हालाँकि फायदे या नुक्सान की सम्भावना आमतौर पर मनुष्य को कार्य करने के लिए  प्रोत्साहित अथवा हतोत्साहित करती ही हैं।






लेकिन मेरी नज़र में तो बुरे कर्म से अपने रब की नाराजगी का डर और अच्छे कर्म से अपने रब के प्यार की ख़ुशी ही सब कुछ है।



मैं अपने पैदा करने वाले और मेरे लिए यह दुनिया-जहान की अरबों-खरबों चीज़ें बनाने वाले का शुक्रगुज़ार ही नहीं बल्कि आशिक़ हूँ, फिर जिससे इश्क होता है उसकी रज़ा में लुत्फ़ और नाराज़गी ही से दुःख होना स्वाभाविक ही है।





और मेरे नज़दीक आशिक के लिए माशूक़ से मिलने से बड़ा कोई और ईनाम क्या हो सकता है?

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ज़ालिम का विरोध और मजलूम का समर्थन


अगर परिवर्तन चाहते है तो गलत को गलत कहने का साहस जुटाना ही पड़ेगा, ज़ालिम का विरोध और मजलूम का समर्थन हर हाल में करना पड़ेगा। 

और ऐसा तभी संभव है जबकि तेरा-मेरा छोड़कर इंसानियत के खिलाफ उठने वाले हर कदम का विरोध हो। जैसा कि अजमेर शरीफ दरगाह की कमिटी ने हमारे सेनिकों की बेहुरमती के विरोध में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की यात्रा का बहिष्कार करने का फैसला किया।

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यह तेरा घर, यह मेरा घर?

आखिर यह रीत किसने बनाई कि पत्नी ही शादी के बाद अपना घर छोड़ कर ससुराल जाए, इक्का-दुक्का जगह पति भी जाते हैं पत्नी के घर। मगर यह रीत क्यों? पति-पत्नी मिलकर घर क्यों नहीं बनाते हैं?

जहाँ उन दोनों को और उन दोनों के परिवार वालों को एक सा सम्मान, एक सा प्यार और एक से अधिकार मिले।

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नफरत की सौदागरी


उफ्फ! चारो तरफ नफरत... धमाकों पर धमाकें, देख लो नफरत की सौदागरी का नतीजा! सड़कों पर फैलता गर्म खून, चारो और बिखरे हुए गोश्त के लोथड़े, खुनी रंग से सरोबार होते धार्मिक स्थल, खौफ से सजते बाज़ार, दर्द से चिल्लाते मासूम, अपनों को गंवाने के गम में सिसकती आहें... और क्या-क्या साज़-ओ-सामान चाहिए अय्याशी के लिए इन शैतानो को? और कितनी बलि चाहिए इन्हें अपने देवता को खुश करने के लिए।

जब तक लोगों में ज़हर घोल जाता रहेगा, तब तक इंसानियत शर्मसार होती रहेगी। इस तरह की सोच का फल देखने के बाद भी इन जैसों का समर्थन करने वालों की ऑंखें ना खुलें और अपनी सोच पर विचार ना करें तो फिर बर्बादी से कौन बचा सकता है?

आज हर तरफ नफरतों के गीत गाए जा रहे हैं, नफरत फैलाने वालों की तारीफों में खुले-आम कसीदे पढ़े जा रहे हैं। उन्हें और ताकतवर बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। शायद शैतानो की तारीफ करने वाले लोगो के लिए भी दूसरों की लाशें सुकून देने वाली ही हैं! उन्हें संतोष हैं कि हमने तो बस लाशों के बदले लाशें बिछाई हैं और गर्व है कि गालियों का बदला लिया है। फिर भूल जाते हैं कि दूसरे भी बस बदला ही तो लेना चाहते हैं। और इस अदला-बदली में इंसानियत ख़त्म होती जा रही है।

पता नहीं यह मौत के बाज़ार कब तक सजेंगे? बदलों का यह दौर कब तक चलेगा?





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आतकवाद क्यों और कब तक?

सबसे पहली ज़रूरत आंतकवाद के खात्मे की नियत की है, अभी तो हमारे देश के हुक्मरानों ने इसकी नियत ही नहीं की है, नताईज तो बहुत बाद की बात है। अभी तो सरकार इस रंग, उस रंग, अपना-पराया में ही अटकी हुई है। आतंकवादियों को बिना रंग भेद किये, अपना-पराया सोचे न्याय की ज़द में लाने, जल्द से जल्द और सख्त से सख्त सजाएं देने की ज़रूरत है।

जिस तरह से जल्दबाजी में जाँच और मिडिया ट्रायल का सिलसिला चलता है, यह बेहद खतरनाक है। कभी इस समुदाय को कभी उस समुदाय को निशाना बनाया जाता है। अगर किसी समुदाय में से कोई गुनाहगार निकलता है तो पुरे समुदाय को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाने लगता है। आज यह विचार करना पड़ेगा आखिर क्या वजह है कि जिस संदिग्ध को पकड़ा गया है, उससे सम्बंधित समुदाय के 90-95 प्रतिशत लोग उसे बेक़सूर समझते हैं? मेरी नज़र में इसके पीछे एक बड़ी वजह आतंकवाद जैसे संगीन अपराध में पकडे गए मुलजिमों का लम्बी अदालती कार्यवाहियों से गुज़रना और अक्सर का बाद में बेक़सूर निकलना हैं।



सरकारे अपनी लाज बचाने के लिए असंवेदनशीलता बरतती है। आखिर क्यों हमारी जाँच एजेंसियां ऐसे मामलों में शुरुआत से ही लीपापोती की जगह ठोस जाँच नहीं करती? क्यों सारा ठीकरा केवल दूसरे देश में बैठे आकाओं पर फोड़ कर इतिश्री पा ली जाती है? सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर जाँच के नाम पर ऐसा कब तक चलता रहेगा? क्या सरकार इस कारण नौजवानों में बढ़ते हुए आक्रोश को नहीं पहचान पा रही है? या फिर जान बूझ कर ऑंखें बंद किये बैठी है?

एक-दूसरे पर इलज़ाम लगाने से तो कोई फायदा होने वाला नहीं है। मासूमों का क़त्ल करने वाले आतंकवादी हैं, चाहे किसी धर्म से, किसी समाज से या किसी भी मुल्क से ताल्लुक रखते हो। आतंकवाद का ना ही कोई धर्म हो सकता है और ना ही कोई मुल्क। इस बात को समझने की आवश्यकता है कि अगर वह किसी भी धर्म पर चलते तो आतंकवादी होते ही नहीं। आतंकवादी धर्म की चादर ही इसलिए ओढते हैं, जिससे कि उन्हें धर्मांध लोगो की सहानुभूति एवं मदद मिल जाए। हालाँकि उनका मकसद धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक है।
हमें हर हाल में इन कातिलों का विरोध करना ही पड़ेगा, चाहे ऐसी हरकत सगा भाई ही क्यों ना करे। जो मासूमों का क़त्ल करता है, वह इंसान ही कहलाने के लायक नहीं है, भाई / रिश्तेदार / दोस्त / मुसलमान / हिन्दू / पडौसी कहलाने की तो बात ही क्या।

इस परिस्थिति के लिए समाज में आ रही दरार भी कहीं ना कहीं ज़िम्मेदार है। दुनिया में इंसानियत के जज्बे को बचाए रखने की ज़रूरत है और इसके लिए हर उस धर्मान्ध का विरोध करना पड़ेगा जो खुद की सोच से अलग सोच रखने वालों के खिलाफ ज़हर उगलते हैं, अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, उन्हें समाप्त कर देना चाहते हैं। नफरत के सौदागरों की समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए और असल बात यह है कि कानून को इनसे बड़ा बनना पड़ेगा।





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धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता


धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता के एक साथ चलने में कोई भी परेशानी नहीं है लेकिन धर्मान्धता और धर्मनिरपेक्षता का एक साथ चलना मुश्किल है। 

मेरी नज़र में धर्मनिरपेक्षता का मतलब है किसी के धर्म पर नज़र डाले बिना सबके लिए समानता और हर धर्म का आदर। हालाँकि धर्मनिरपेक्षता का मतलब मेरे लिए हर एक धर्म में समानता नहीं है। 

मैं जिस धर्म को सही मानता हूँ उस पर चलूँगा और आपको हक़ है अपनी सोच के अनुसार अपने धर्म को सही मानने का, इसमें झगडे वाली बात क्या हो सकती है भला? झगडा तो तब है जबकि मैं यह सोचूं कि मेरी ही चलेगी क्योंकि मैं सही हूँ। मेरी बात मानो, नहीं तो तुम्हे इस दुनिया में रहने का हक़ नहीं है। या फिर दूसरों के धर्म या आस्था का मज़ाक बनाता फिरूं। ऐसी सोच वाले मेरी नज़र में धार्मिक नहीं बल्कि धर्मांध हैं और मैं हर एक ऐसे शख्स के खिलाफ हूँ जो ऐसा करता है या सोचता है।

यह तो रब के कानून की अवहेलना है, जिसने दुनिया में सबको अपनी मर्ज़ी से जिंदगी गुज़ारने का हक़ दिया है।

तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म - [109:6] कुरआन

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उनका अहसान फ़र्ज़, हमारा फ़र्ज़ अहसान

समाज में महिलाओं के पुरुषों पर अहसान को उनका फ़र्ज़ (ड्यूटी) और अपने फ़र्ज़ पूरे करने को उनपर एहसान बताया जाता है।

पत्नी का पति के लिए खाना बनाना, घर का ख्याल रखना, बच्चों की परवरिश करना इस्लाम में फ़र्ज़ नहीं है, बल्कि पति पर एहसान है (अगर वोह करना चाहे तो) । अगर पत्नी बच्चे को दूध ना पिलाना चाहे तो दूध पिलाने वाली का इंतजाम करना पति के ऊपर फ़र्ज़ है। और एहसान का बदला एहसान से या फिर कम-अज़-कम हुस्न-सलूक होना चाहिए। लेकिन इसको पत्नी की ड्यूटी बना दिया गया, जिससे कि वोह घर की चार-दिवारी में टिकी रहे।

यहाँ तक कि माता-पिता की देखभाल करना, उनके खाने-पीने का इंतजाम करना पति पर  फ़र्ज़ बनाया गया है, लेकिन आज उसे पत्नी का फ़र्ज़ बना दिया गया है। ऊपर से किसी भी महिला के अपने माता-पिता के लिए जो फ़र्ज़ हैं उन्हें गुनाह समझा जाने लगा है। कोई महिला अगर अपने माता-पिता की देखभाल करती है, आर्थिक मदद करती है तो उसे बुरा समझा जाता है। अपनी मर्जी चलाई जा सकें, इसलिए  अधर्म को धर्म का जामा पहनाने की कोशिश की जाती है।

अगर समाज में सभी रिश्ते एक-दूसरे के हक को समझे, दूसरों के अहसान को अहमियत दें रिश्तों में कडवाहट नहीं बल्कि मिठास जागेगी। बहु को अहसास होना चाहिए की उसके सास-ससुर के उस पर कितने अहसान हैं, वहीँ सास-ससुर को अपनी बहु के एहसानों पर मुहब्बत की नज़र रखनी चहिये।  जैसे पत्नी पति के रिश्तों को अहमियत देती है, ठीक उसी तरह पति को भी अपनी पत्नी के रिश्तों को उतनी ही अहमियत देनी चहिये।

एक दूसरे पर अहसान दर-असल एक दूसरे से मुहब्बत की अलामत है।

(मेरे द्वारा की गई टिपण्णी का सार)





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मर्द हमेशा कोशिश करते हैं कि किसी न किसी तरीके से औरतों को गुलाम बनाये रखा जा सके। इसके लिए वह धार्मिक बातों को अपने फायदे के लिए तोड़-मरोड़ते हैं। और महिलाऐं उसी को धर्म समझ कर चुपचाप करती रहती हैं।

एक औरत का अपने पति के लिए खाना बनाना, घर का ख्याल रखना, बच्चों की परवरिश करना इस्लाम में फ़र्ज़ नहीं है, बल्कि पति पर एहसान है (अगर वोह करना चाहे तो). यहाँ तक कि अगर पत्नी बच्चे को दूध ना पिलाना चाहे तो ...फ़ौरन दूध पिलाने वाली का इंतजाम करना पति के ऊपर फ़र्ज़ है। और एहसान का बदला एहसान से या फिर कम-अज़-कम हुस्न-सलूक से चुकाया जाता है। लेकिन इसको पत्नी की ड्यूटी बना दिया गया, जिससे कि वोह घर की चार-दिवारी में टिकी रहे।
पति के माता-पिता की देखभाल करना पति की ज़िम्मेदारी है लेकिन उसे पत्नी की ज़िम्मेदारी बना दिया गया। ऊपर से किसी भी महिला के अपने माता-पिता के ऊपर जो फ़र्ज़ हैं उन्हें गुनाह समझा जाने लगा है। कोई महिला अगर अपने माता-पिता की आर्थिक मदद करती है तो उसे बुरा समझा जाता है।
ज़बरदस्ती अपनी मर्जी को धर्म का जामा पहनाया जाता है, जिससे कि उनसे अपनी मर्जी के काम करवाए जा सकें।



अराधना चतुर्वेदी की पोस्ट http://www.facebook.com/aradhana.chaturvedi/posts/4257068594434 पर मेरा कमेन्ट।

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'विश्वरूपम' - बिना मतलब का विवाद

'विश्वरूपम' पर बिना मतलब का विवाद उठाया जा रहा है। मामला कोर्ट में है, जिसे दोनों पक्षों की बात सुनकर फैसला सुनाना चाहिए। राजनितिक कारणों से अथवा पब्लिसिटी के लिए विवाद करना, विरोध स्वरुप जगह-जगह तोड़-फोड़ करना, धमकियाँ देना घटिया मानसिकता है। किसी भी बात का विरोध करने अथवा अपना पक्ष रखने का तरीका हर स्थिति में लोकतान्त्रिक और कानून के दायरे में ही होना चाहिए।

मैंने 'विश्वरूपम' नहीं देखी, इसलिए फिल्म पर टिपण्णी करना मुनासिब नहीं समझता हूँ, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढोल पीटने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों से इतना ज़रूर मालूम करना चाहता हूँ कि दूसरे पक्ष को सुने बिना अपनी बात को थोपना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कैसे हो सकता है? अगर कल को कोई आतंकवाद के समर्थन या खून खराबे के लिए उकसाने वाली फिल्म बनता है तो क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उस फिल्म का भी समर्थन किया जा सकता है?

हालाँकि हर एक को अपनी बात रखने का पूरा हक है और होना भी चाहिए, लेकिन कोई फिल्म जैसी चीज़ एक ऐसा ज़रिया नहीं है जिसपर दूसरा पक्ष भी अपनी बात रख सके। किसी फिल्म इत्यादि के द्वारा उठाए गए मुद्दों पर मीडिया, सोशल मीडिया, सेमिनारों इत्यादि पर विमर्श तो हो सकता है लेकिन यह माध्यम सामान्यत: आम लोगो की पहुँच से दूर होते हैं। अर्थात इन माध्यमों से दूर बैठे लोग फिल्म इत्यादि के माध्यम से व्यक्त किये विचार को ही सच मान बैठते हैं। इस नज़रिए से देखा जाए तो फिल्म जैसे माध्यम किसी असहमति पर एक तरफ़ा फैसला सुनाने जैसा है। बड़ा सवाल तो यह है कि किसी पेंटर को तस्वीर बनाने के लिए अथवा फिल्मकार को फिल्म बनाने के लिए विवादित मुद्दे ही क्यों मिलते हैं?

सबसे बड़ी बात तो यह है कि अभिव्यक्ति की अंध-स्वतंत्रता के पक्षधर यह लोग अपनी बात पर तानाशाही क्यों दिखाना चाहते हैं? वह स्वयं क्यों दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपना पक्ष रखने की आज़ादी को क्यों छीनना चाहते हैं? खुद ही मुद्दा उठाते हैं और खुद ही उसके सही होने पर फैसला भी सुनना चाहते हैं? अपने विरुद्ध उठने वाली आवाज़ पर सहनशीलता क्यों नहीं दिखाते? कमल हासन ने खुद क्यों नहीं कहा कि वह कोर्ट का फैसला आने के बाद ही फिल्म को प्रदर्शित करेंगे?

अगर किसी के द्वारा उठाए गए मुद्दे पर अदालत में विमर्श होता है और सही गलत का निर्धारण होता है तो इसमें कुछ भी गलत कैसे कहा जा सकता है? जिस तरह कमल हासन को हक है अपनी बात रखने का उसी तरह बाकी जनता को भी हक है विरोध जताने का। इसमें अगर कमल हासन और उनके साथ खड़े बुद्धिजीवी यह सोचते हैं कि इसका फैसला केवल कमल हासन की मर्ज़ी के मुताबिक ही हो तो क्या इस सोच को जायज़ ठहराया जा सकता है? अपने विरुद्ध फैसला आने पर कमल हासन का बौखलाहट दिखाना और देश छोड़ने की धमकी देना क्या कहा जाएगा?
अगर मामला कोर्ट में है तो कोर्ट को बिना राजनैतिक दबाव का ध्यान रखे दोनों ओर की दलील सुनकर फैसला सुनना चाहिए। इसमें कोर्ट को लगता है कि कमल हासन ने सही कहा तो उसे कहने के हक मिलना ही चाहिए और अगर ग़लत कहा तो कमल हासन तो क्या किसी को भी हरगिज़-हरगिज़ ऐसी इजाज़त नहीं होनी चाहिए।





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