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क्या आपका वोट सुरक्षित है? बंगाल में 89 लाख नाम कटने से उठे लोकतंत्र पर बड़े सवाल!

क्या आपका वोट… सच में आपका है? या कोई सिस्टम, कोई लिस्ट, चुपचाप आपका हक छीन सकता है…?



सोचिए… आप सालों से वोट दे रहे हैं। हर चुनाव में लाइन में खड़े हुए, अपनी आवाज़ उठाई।
लेकिन अचानक एक दिन पता चले — आपका नाम ही वोटर लिस्ट से गायब है!

यही दर्द आज पश्चिम बंगाल के लाखों लोगों का है… 😔


क्या हुआ आखिर?

2026 के चुनाव से ठीक पहले Special Intensive Revision (SIR) के नाम पर
लगभग 89 लाख (8.9 मिलियन) वोटर्स के नाम लिस्ट से हटा दिए गए —
यानी करीब 11% से ज्यादा पूरा वोट बैंक गायब!  

कुछ रिपोर्ट्स तो ये भी कहती हैं कि ये आंकड़ा 90 लाख के आसपास है।  


मामला इतना गंभीर क्यों है?

  • लाखों लोगों ने अपील की… लेकिन करीब 27 लाख लोग फिर भी वोट नहीं दे पाएंगे
  • कई इलाकों में आधे तक वोटर्स के नाम कट गए
  • खासकर अल्पसंख्यक और गरीब तबकों पर असर ज़्यादा बताया जा रहा है  

सोचिए… एक झटके में आपकी पहचान, आपका अधिकार — सब खत्म!


ममता बनर्जी का बड़ा आरोप

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुलकर सवाल उठाए:

👉 उन्होंने चुनाव आयोग पर “पक्षपात” का आरोप लगाया
👉 अधिकारियों से कहा — “डर के नहीं, ईमानदारी से काम करो”
👉 ये भी कहा कि कुछ लोग जानबूझकर चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं  


लोगों का दर्द…

  • कई बुजुर्ग, जो 40-50 साल से वोट दे रहे थे… अब बाहर
  • जो लोग कभी “बेघर” थे और बाद में नागरिक बने… उनका नाम फिर से गायब
  • रोज़गार छोड़कर लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं  

ये सिर्फ एक “लिस्ट” नहीं…
ये लोगों की पहचान, सम्मान और लोकतंत्र का सवाल बन चुका है।


दूसरी तरफ क्या कहा जा रहा है?

सरकार और चुनाव आयोग का कहना है:
✔️ ये प्रक्रिया “फर्जी वोटर्स” हटाने के लिए है
✔️ टेक्नोलॉजी और AI का इस्तेमाल पारदर्शिता के लिए किया जा रहा है  

लेकिन सवाल वही है…
👉 अगर असली लोग ही बाहर हो जाएं, तो ये सफाई है या साज़िश?


सबसे बड़ा सवाल

अगर लाखों लोग वोट ही नहीं दे पाए…
तो क्या चुनाव सच में “जनता की आवाज़” रहेगा?

या फिर…
एक ऐसा सिस्टम बन जाएगा जहां कुछ लोगों की आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी जाएगी?


आप क्या सोचते हैं?
क्या ये सिर्फ एक प्रशासनिक गलती है… या लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी?

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क्या चुनाव में भी बराबरी नहीं? 700 हस्तियों ने PM मोदी पर उठाए सवाल, चुनाव आयोग से कार्रवाई की मांग!


यह सिर्फ एक ख़बर नहीं है… ये सवाल है कि क्या सच में चुनाव के दौरान सब कुछ बराबरी से हो रहा है… या फिर कहीं खेल कुछ और ही चल रहा है?

हाल ही में एक बड़ा विवाद सामने आया है, जहाँ देशभर के 700 से ज़्यादा पूर्व IAS अफसर, शिक्षाविद, पत्रकार और एक्टिविस्ट एक साथ खड़े हो गए। इन लोगों ने चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर सीधे तौर पर आरोप लगाया कि Narendra Modi ने अपने एक भाषण में चुनाव आचार संहिता यानी MCC का उल्लंघन किया है। हालांकि पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग भी स्वतंत्र संस्था की जगह सरकार के अंग की तरह ही बिहेव करता आ रहा है।

ये मामला उस वक्त का है जब देश के कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं और MCC लागू है। आरोप है कि प्रधानमंत्री का जो राष्ट्र के नाम संबोधन था, वो सरकारी प्लेटफॉर्म्स—जैसे दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो—पर दिखाया गया… और यह पहली बार है कि किसी प्रधानमंत्री के द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में राजनीतिक बातें की गईं। भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह अपने आप में ही पीएम पद की गरिमा को गिराने वाला कदम है।

लोगों का कहना है कि ये सिर्फ एक भाषण नहीं था… बल्कि “चुनावी प्रचार” था, वो भी सरकारी संसाधनों के जरिए। और अगर ऐसा है, तो क्या ये बाकी पार्टियों के साथ नाइंसाफी नहीं है?

चिट्ठी में ये भी कहा गया कि जब चुनाव चल रहे हों, तब सत्ता में बैठी सरकार को ज़्यादा जिम्मेदारी निभानी चाहिए… ताकि मैदान सबके लिए बराबर रहे। लेकिन अगर वही सरकार अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके जनता को प्रभावित करे… तो फिर लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है।

दिलचस्प बात ये है कि सिर्फ एक्टिविस्ट ही नहीं, बल्कि कुछ नेताओं ने भी इसी मुद्दे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस तरह के भाषण “राजनीतिक और पक्षपातपूर्ण” थे और चुनाव के माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। 

अब सबसे बड़ा सवाल ये है…

क्या चुनाव आयोग इस पर कोई कार्रवाई करेगा? या फिर ये मामला भी बाकी मामलों की तरह बस बहस बनकर रह जाएगा?

आप क्या सोचते हैं?

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क्या ये सच में “महिला सशक्तिकरण” है… या फिर राजनीति?


क्या ये सच में “महिला सशक्तिकरण” है… या फिर राजनीति की एक ऐसी चाल, जिसमें महिलाओं का नाम लेकर खेल कुछ और ही खेला जा रहा है?

आज संसद में जो बहस चल रही है, वो सिर्फ महिला आरक्षण की नहीं है… बल्कि उसके पीछे छुपी राजनीति की भी है। सरकार कह रही है—देश की संसद में महिलाओं को 33% हिस्सा मिलेगा, उनकी आवाज़ और मज़बूत होगी। सुनने में ये सपना जैसा लगता है… लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 

असल पेंच यहाँ आता है—इस आरक्षण को डिलिमिटेशन यानी सीटों के नए बंटवारे से जोड़ दिया गया है। मतलब, पहले पूरे देश का चुनावी नक्शा बदलेगा… फिर महिलाओं को आरक्षण मिलेगा। और यही वो बात है, जिस पर सियासत गरमा गई है। 

विपक्ष का कहना है—अगर नीयत साफ है, तो आज की 543 सीटों में ही महिलाओं को हिस्सा क्यों नहीं दिया जा सकता? इंतज़ार क्यों? ये सवाल सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि भरोसे का है।   सरकार परिसीमन 2026 की जनगणना के आधार पर कराने की जगह 2011 की जनगणना के आधार पर कराना चाहती है। ऐसा इसलिए क्योंकि तब जाति आधार पर जनगणना नहीं हुई थी। 

अगर इसकी इजाज़त दे दी जाए तो OBC पिछड़े समाज का हक़ मार लिया जाएगा। दूसरी तरफ़ साउथ के लीडर्स का तर्क है कि उन्होंने केंद्र सरकार की जनगणना नीति को आगे बढ़ाया, जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाई, तो क्या हमने गलती की कि संसद में हमारा प्रतिनिधित्व कमजोर करने की साजिश रची जा रही है।

बात में पेंच यह है कि हर राज्य में 50% प्रतिशत सीटों की वृद्धि की जाएगी। मतलब जिनकी सीटें कम हैं उनकी कम बढ़ेगी। जैसे कि एक साथ सब के लिए समान 50% वेतन बढ़ाने का ऐलान हो तो जिनको आय 5 लाख है उसकी लाखों में बढ़ेगी और जिनकी 50 हज़ार उनकी हज़ारों में। इसका विरोध साउथ में बहुत तेज़ी से हो रहा है। उनके सवाल वाजिब हैं एयूए गृहमंत्री को उनका जवाब देना चाहिए, उन्हें संतुष्ट करना चाहिए।

कुछ नेताओं का आरोप है कि ये “महिलाओं के नाम पर राजनीति” है… एक ऐसा दांव, जिसमें अगर कोई विरोध करे तो उसे “महिला विरोधी” साबित कर दिया जाए। यानी चाल ऐसी कि हर तरफ से फायदा ही फायदा। 

दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि देश बदल रहा है, आबादी बढ़ रही है, और संसद को भी उसी हिसाब से बदलना ज़रूरी है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी तो लोकतंत्र और मजबूत होगा।  
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वहीं है…
क्या ये बिल सच में महिलाओं को उनका हक दिलाएगा?
या फिर ये सिर्फ एक “टाइमिंग वाला वादा” है, जो चुनावी गणित में फिट बैठता है? चुनाव ख़त्म और बात ख़त्म…

सच ये है कि भारत की आधी आबादी आज भी पूरी ताकत से राजनीति में नहीं दिखती। और अगर ये बिल सही नीयत से लागू हुआ—तो इतिहास बदल सकता है। लेकिन अगर इसके पीछे राजनीति भारी पड़ गई… तो ये एक और अधूरा सपना बनकर रह जाएगा।

आख़िरी बात:
ये सिर्फ एक बिल नहीं… ये भरोसे की लड़ाई है।
महिलाओं के हक़ और राजनीति की नीयत के बीच।


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कोर्ट में टकराव! जज ने Arvind Kejriwal से कहा — ‘मुझे घूरिए मत’…


दिल्ली हाई कोर्ट का वो पल अब सुर्खियों में है, जब अदालत की गंभीर दीवारों के बीच शब्दों की तल्खी भी दिखी और तंज भी। अरविंद केजरीवाल खुद कोर्ट में खड़े थे, अपने ही केस में दलीलें दे रहे थे… लेकिन माहौल तब अचानक बदल गया, जब जज जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने उन्हें कहा— आरोप लगाकर इस तरह मुझे घूरिए मत। केजरीवाल बोले मैं पहली बार आया हूं इस कोर्ट में, इसलिए थोड़ा नर्वस हूं।

यह सिर्फ एक सुनवाई नहीं थी, बल्कि भरोसे और शक के बीच की टकराहट थी। केजरीवाल ने अदालत में एक तेजतर्रार वकील की तरह नज़र आए। उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के 4 बार RSS के कार्यक्रमों में शामिल होने का हवाला देते हुए पक्षपात की आशंका जताई। उन्होंने कहा कि “हम उनकी विचारधारा के कट्टर विरोधी हैं, ऐसे में मेरे मन में डर पैदा होता है कि मुझे इस पीठ से इंसाफ़ मिलेगा या नहीं।”

केजरीवाल ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट का फैसला आया था, और हैरानी की बात ये है कि सिर्फ 4 घंटे के अंदर ही CBI ने इस हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। उन्होंने बताया कि वो फैसला 500 पन्नों से भी ज़्यादा का था, जिसमें कोर्ट ने हर एक आरोप को बारीकी से जांचा और फिर विस्तार से अपनी राय दी। जबकि सीबीआई की अपील में किसी भी फाइंडिंग को लेने के कोई फाइंडिंग नहीं है। ऐसे में इस अपील को तो पहले ही दिन खारिज कर देना चाहिए था, क्योंकि वह डिफेक्टिव है। पर उस डिफेक्टिव पिटीशन पर ही स्वीपिंग ऑर्डर पास किया गया।

कोर्टरूम में हर शब्द भारी था… एक तरफ एक पूर्व मुख्यमंत्री, जो खुद अपनी लड़ाई लड़ रहा था, और दूसरी तरफ न्याय की कुर्सी। इस दौरान माहौल कई बार भावुक भी हुआ, तो कई बार तीखा भी।

आख़िर में पीठ ने कहा आपने बहुत अच्छी बहस की। आप वकील भी बन सकते हैं। इस पर केजरीवाल ने कहा धन्यवाद मैडम, मैं जो अभी कर रहा हूँ उसमे खुश हूँ। इसके ऊपर अधिवक्ता हेगड़े ने मज़ाक करते हुए कहा कि मै भी यही कह रहा हूं आप वकील बनकर हमारे साथ प्रतिस्पर्धा मत बढ़ाइए। 😊

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया— क्या इंसाफ सिर्फ होना ही काफी है, या इंसाफ होता हुआ “दिखना” भी उतना ही ज़रूरी है? अदालत ने फिलहाल इस मांग पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन इस टकराव ने कानून, राजनीति और भरोसे के रिश्ते को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।


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नार्थ कोरिया चुनाव 2026: लोकतंत्र की “मास्टरक्लास”

ताज़ा चुनावी नतीजे आ चुके हैं, और इस बार भी इतिहास खुद को दोहराने से खुद को रोक नहीं पाया।

आंकड़े देखिए और गर्व कीजिए:

 • कुल वोटिंग: 99.9%

 • विजेता उम्मीदवार: 100%

 • विपक्ष: सर्चिंग… Not Found

 • NOTA: “ये क्या होता है?” 🤔


कहते हैं लोकतंत्र में जनता अपने नेता चुनती है…

लेकिन यहाँ तो जनता का काम बस ये कन्फर्म करना है कि नेता वही है, जो पहले से है 😌


रिज़ल्ट का गणित भी बड़ा दिलचस्प है:

 • 100% वोट एक ही उम्मीदवार को

 • 0% असहमति

 • 0% विवाद

 • 0% एग्जिट पोल की ज़रूरत


इतना क्लियर रिज़ल्ट तो मैथ्स के एग्जाम में भी नहीं आता 😄


चुनाव आयोग ने भी बयान जारी किया:

“इस बार भी जनता ने पूरी आज़ादी के साथ वही फैसला लिया, जो उन्हें लेना था।”


मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें थीं,

लेकिन किसी को जल्दी नहीं थी… क्योंकि रिज़ल्ट तो पहले से ही “सेव” था 


मीडिया कवरेज भी शानदार रही:

“देश की जनता ने एक बार फिर से ऐतिहासिक समर्थन दिया!”

(इतिहास हर बार वही रहता है, बस तारीख बदल जाती है)


विपक्ष ने भी शानदार प्रदर्शन किया:

उन्होंने चुनाव में हिस्सा लेकर माहौल को संतुलित रखा…

(हालाँकि उन्हें ढूंढने के लिए माइक्रोस्कोप चाहि)


सबसे बड़ी बात —

यहाँ हारने का कोई डर नहीं,

क्योंकि जीतने वाला पहले से तय है… और बाकी सब “भागीदारी” निभा रहे हैं।


अगर दुनिया के बाकी लोकतंत्रों में भी इतनी “स्थिरता” आ जाए,

तो एग्जिट पोल, डिबेट, और रिज़ल्ट वाले दिन का ड्रामा ही खत्म हो जाए 😄


निष्कर्ष:

नार्थ कोरिया ने फिर साबित कर दिया कि

“लोकतंत्र” सिर्फ एक व्यवस्था नहीं,

बल्कि एक फिक्स्ड डिपॉज़िट है — जहाँ रिज़ल्ट गारंटीड होता है 😌


#NorthKorea #ElectionSatire #Vyanga #PoliticalHumor #Democracy

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साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की राजनीति और इसका नुक़सान


मैं अपने बचपन से चुनावों में सांप्रदायिक नफरत का चक्रव्यूह देखता आ रहा हूं। चुनाव करीब आते ही बीजेपी तुरंत हिन्दू मुस्लिम पर और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां जनता के कामों पर सवाल करने या हिसाब-किताब देने की जगह बीजेपी के चक्रव्यूह में फंसकर उसके एजेंडे पर बात करती नज़र आती हैं। 

यह दोनों तरफ़ की पार्टियां चाहती हैं कि चुनाव सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता पर लड़ा जाए। क्योंकि इससे दोनों तरफ के लोगों को किसी एक पार्टी को वोट देना मजबूरी बन जाता है। फिर चुनाव में लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि उनके काम हुए या नहीं हुए, देश या राज्य तरक़्क़ी की राह पर जा रहा है या नहीं।

हालांकि कांग्रेस जैसी पार्टियां यह भूल जाती हैं कि जब नफरतें चरम पर होती हैं, तो फिर चाहे सेकुलर माइंडसेट वाले हिंदू हों या फिर मुसलमान, दोनों ही कम्युनल एजेंडे पर वोट देने को मजबूर हो जाते हैं और इनकी हार की यही वजह है!

देश के लोगों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि चुनाव इमोशनल इशुज़ की जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता के कामों पर होने चाहिए। मतलब क्या काम किए, क्या नाकामी रही और आगे का क्या एजेंडा है, लोकतंत्र इसी का नाम है कि चुनाव के वक्त जनता अपने कामों के हिसाब से वोट दे! 

साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के नाम से होने वाली राजनीति को हाशिए पर लाने का मेरी नज़र में सिर्फ यही एक हल है।

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मुस्लिम प्रजनन दर और उसकी आड़ में जनसंख्या वृद्धि के हौव्वे की राजनीति

भारत में मुस्लिम प्रजनन दर 1992 में 4.4 थी जो कि 2019 में गिरकर 2.4 हो गई। वहीं हिन्दू प्रजनन दर जो कि 1992 में 3.3 थी वो 2019 में गिरकर 1.9 हो गई है। अगर सरकार के इस आंकड़ें को देंखेंगे तो मुस्लिम प्रजनन दर में जितनी तेज़ी से गिरावट आई है, उतनी किसी और समाज में नहीं आई है।

अभी सभी समुदायों की प्रजनन दर तक़रीबन 2 के आसपास है। जिसका अर्थ है 2 लोगों (पति-पत्नि) के द्वारा जन्म दिए बच्चों की संख्या 2 के आसपास है और इसका अर्थ है कि भविष्य में जल्दी ही ऐसा समय आने वाला जबकि देश की जनसख्या बढ़ने की जगह घटने लग जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हर समुदाय में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। आप शिक्षा के असर का इससे अंदाज़ा लगाइये कि शहरों में प्रजनन दर 1.6 रह गई है, जबकि गांवों में यह 2.1 प्रतिशत है। अगर राज्यों की बात करें तो बिहार 3, मेघालय में 2.9, यूपी में 2.4, झारखंड 2.3 और मणिपुर में 2.2 है।

और अगर देखा जाए तो हिन्दू समुदाय की प्रजनन दर (1.9), बौद्ध (1.4), जैन (1.6) और सिख (1.6) समुदाय से ज़्यादा है तो क्या इन समुदायों को हिन्दू समुदाय के विरुद्ध झंडा उठाना चाहिए? 
जन्मदर का ताल्लुक शिक्षा के स्तर से होता है, पर बेशर्मी यह है कि भाजपा इसके हल अर्थात शिक्षा के स्तर को बढ़ाने पर मंथन करने की जगह इसे भी नफरत का हथियार बनाती है।

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दिल्ली की जनता के अधिकार और वोट की कीमत आधी क्यों?

कोई सरकार सिर्फ किसी पार्टी की सरकार भर नहीं होती है बल्कि जनता की प्रतिनिधि होती है और वह अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्षेत्र में काम करती है, उसी के अनुरूप जनता में उसकी जवाबदेही तय होती है और उसी जवाबदेही के अनुसार किये गए कार्यों को लेकर अगले चुनाव में सरकार से संबधित पार्टी मैदान में उतरती है।   इसलिए लोकतंत्र का तकाज़ा यह है कि हर सरकार को उससे सम्बंधित कार्यक्षेत्र में कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो, यही जनतंत्र अर्थात जनता का शासन कहलता है।

केंद्र सरकार ने तानाशाही दिखाते हुए दिल्ली सरकार के अधिकारों को समाप्त किया:

केंद्र सरकार ने  दिल्ली सरकार की राह में रोड़ा अटकाने की, कार्यों को रोकने की हर संभव कोशिश की। दिल्ली सरकार से सर्विस मैटर और एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) को छीन लिया गया, जिसका मतलब यह हुआ कि अगर दिल्ली सरकार किसी काम को करती है तो उसके लिए अपनी पसंद के अधिकारी अपॉइंट नहीं कर सकती है। अगर अधिकारी काम करने में ढील बरते, काम नहीं करे तो उसके खिलाफ एक्शन नहीं ले सकती है और अगर कोई अधिकारी दिल्ली सरकार के काम करने में रिश्वत लेता है तो उसके खिलाफ जाँच और कार्यवाही नहीं कर सकती है। क्या इस तरह कोई सरकार काम कर सकती है?

सरकारी अधिकारी अगर सरकार की जगह विपक्षी पार्टी के अधीन होंगे तो जनता के काम कैसे होंगे:

सोचिये अगर किसी कॉलोनी में गन्दा पानी आ रहा है और अधिकारी इस समस्या पर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो मुख्यमंत्री तक को यह पावर नहीं है कि अधिकारी के विरुद्ध एक्शन ले सके, जबकि जल बोर्ड दिल्ली सरकार के अधीन आता है। अगर सरकार को अपने अधीन आने वाले कार्यक्षेत्र में भी काम नहीं करने वाले या रिश्वत लेकर काम बिगाड़ने वाले सरकारी अधिकारियों पर कार्यवाही करने का अधिकार नहीं होगा तो जनता के काम कैसे होंगे? और फिर यह जनता का राज कहाँ से हुआ?

आप स्वयं विचार करिये कि उन अधिकारीयों/कर्मचारियों को नियुक्त करने का, काम नहीं करने या फिर रिश्वत लेकर काम खराब करने पर जांच करने का, एक्शन लेने का, अधिकार अगर जनता के द्वारा चुने जान प्रतिनिधियों की जगह विपक्षी पार्टी के पास हुआ तो फिर क्या जनता के मत का अपमान नहीं हुआ? और विपक्षी क्यों चाहेगा कि सरकार सही से काम करे? आखिर दिल्ली में यह नियम किस लॉजिक से बनाया गया है?

स्टाफ नियुक्त नहीं होने के कारण मौहल्ला क्लिनिक, हॉस्पिटल्स, स्कूलों सहित सभी विभागों में काम बाधित:

आज दिल्ली सरकार के 7०% से ज़्यादा पद खाली पड़ें हैं, अगर यह पद भर जाते हैं तो कई लाख लोगो को रोज़गार मिल सकता है और दिल्ली सरकार के कामों में कई गुना तेज़ी आ सकती है। पर नौकरियां भरने का अधिकार विपक्षी पार्टी को है और यही वजह है कि सरकार के हर डिपार्टमेंट में पद खाली हैं, काम बेहद धीमा है। कई मोहल्ला क्लिनिक बनकर कई महीनों से धूल चाट रहे हैं, कई स्कूलों में टीचर कम होने की वजह से पढ़ाई बाधित है, कई हॉस्पिटल्स में स्टाफ कम होने की वजह से मरीज़ों का नुकसान हो रहा है, इसकी जवाबदेही किसकी है?

सरकार को नीचा दिखाने के लिए बिना सबूत के गिरफ्तारियाँ और सीबीआई रेड की गईं:

दिल्ली की जनता द्वारा चुने गए 25 से ज़्यादा विधायकों को बिना किसी सबूत के सड़क से उठाकर जेल में डाल दिया, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों पर सीबीआई रेड डलवाकर खुलेआम जनता द्वारा चुनी गई सरकार की बेइज़्ज़ती की गई, पर इसके बावजूद उनके ख़िलाफ़ कोई एक भी सबूत नहीं मिला। गोदी मीडिया द्वारा खूब जमकर ज़हर उगला गया, किसी भी विज़िबल सबूत के ना होने के बावजूद दोषारोपण ऐसे किया गया जैसे दोष साबित हो गया हो, पर हर बार अदालत में आरोपों के झूठा पाए जाने पर मीडिया को साँप सूंघ गया! उसने फिर एक भी स्टोरी नहीं चलाई और ना ही अपनी गलती स्वीकार की।

चुनी गई सरकार के कार्यों को को नियुक्त किये गए LG के माध्यम से रोका गया:

केंद्र सरकार द्वारा LG के माध्यम से दिल्ली की जनता के हर बिल को अटकाया गया, जाँच के नाम पर कई महीने तक दिल्ली सरकार की सारी फाइलें उठाकर दिल्ली के हर काम को रोक दिया गया। यह तो शुक्र है अदालत का जहाँ से न्याय मिला। विधायक बरी हुए और LG के नाम पर केंद्र की दादागिरी काफी हद तक ख़त्म हुई। यह तो सिर्फ दिल्ली की झलक है, देश में जो तानाशाही की गई, वोह तो इससे भी कहीं ज़्यादा बड़ी है।

फिर भी भाजपा समर्थक पूछते हैं कि तानाशाही कहाँ है? यह किस मुँह से केजरीवाल के इस तानाशाही को ख़त्म करने के विरुद्ध किये जा रहे संघर्ष पर सवाल उठा रहे हैं?

विपक्षी पार्टियों और करप्शन पर आम आदमी पार्टी का रुख:

अरविंद केजरीवाल ने कभी नहीं कहा कि कांग्रेस, भाजपा सहित सारी पार्टियों के सभी नेता करप्ट हैं। उन्होंने हमेशा कहा कि जिस भी नेता के विरुद्ध विज़िबल सबूत सामने आए हैं, उनकी लोकपाल जैसी संस्था से निष्पक्ष जाँच कराई जाए और तब तक सरकारी पद से ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी द्वारा भी निलंबित किया जाए। आरोप साबित होने पर सख़्त से सख़्त सज़ा दी जानी चाहिए, या फिर बरी होने पर ही सरकारी या पार्टी पद पर वापिस लिया जाना चाहिए।

आम आदमी पार्टी ने अपने मंत्रियों के विरुद्ध भी विज़िबल सबूत सामने आने पर तुरंत कार्यवाही की थी, करप्शन ही नहीं बल्कि कैरेक्टर लेस होने के विज़िबल सबूत सामने आने पर तुरंत ही मंत्रिपद ही नहीं बल्कि पार्टी से भी निलंबित किया था, वहीँ एक पूर्व मंत्री को सीबीआई द्वारा जाँच में बरी होने पर ही पार्टी निलंबन ख़त्म किया है।

पर करप्शन खतरनाक होने के बावजूद ऐसा मुद्दा है जो देश से बड़ा नहीं है, अगर देश में लोकतंत्र समाप्त करने, संविधान को ख़त्म करने, संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाने की कोशिशें होती हैं, देश को नफरत के नाम पर बाँटने की कोशिश होती है, तो देश के हर व्यक्ति और हर पार्टी का फर्ज है कि देश को बचाने की मुहिम में शामिल हो। उनमें से अगर कोई करप्ट भी होगा तो अगर संविधान बचेगा, लोकतंत्र बचेगा तो लोकपाल जैसी निष्पक्ष संस्था बनाकर, सख़्त नियम कानून और फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट बनाकर, उन्हें सज़ा दी जा सकती है।

करप्शन ख़त्म किया जा सकता है, दिल्ली सरकार ने तो बिना एसीबी जैसी किसी भी जांच एजेंसी के भी ऑटोप्रोसेस, डोर स्टेप डिलीवरी जैसी इनोवेटिव योजनाओं के द्वारा करप्शन पर रोक लगाई है, जबकि दिल्ली के सभी अधिकारियों की रिपोर्टिंग LG को कर दी गई थी।


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फलफूल रही है नफरत की राजनीति

कट्टरता से नफ़रत, नफ़रत से हिंसा और हिंसा से बर्बादी आती है!

किसी समुदाय के नाम, पहनावे या चेहरे-मोहरे को देखकर या फिर गौमाँस जैसे इल्जाम पर कट्टरपंथी तत्व लोगों को खुलेआम मार रहे हैं और ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं, जबकि उनसे कहीं बड़ी भीड़ उन बाज़ारों में या फिर ट्रेनों में मौजूद होती है। पर नफरत का आलम यह है कि वोह भीड़ चुप रहती है, बल्कि कई जगह तो कट्टरपंथियों में शामिल हो जाती है और मौके पर इतनी भारी भीड़ होने के बावजूदु पुलिस को गवाह तक नहीं मिलते...

पहले जब भी दंगे हुए और लोग मरे तब बचाने वाले और दंगाइयों का विरोध करने वाले खुलकर सामने आते थे, पर अब मौन समर्थन सामने आ रहा है। बल्कि विरोध करने वालों को देशद्रोही ठहराया जा रहा है, भले ही वोह 10 साल तक देश का उपराष्ट्रपति ही क्यों ना रहा हो।

क्या ऐसा होना किसी देश के अल्पसंख्यक समुदाय के लिए चिंता का सबब नही है? और अगर चिंता व्यक्त की गई तो उसपर विचार करके हल खोजने की जगह नफरत भरी प्रतिक्रिया देना क्या खुद में उसी नफरत को साबित नहीं कर रहा है, जिस पर चिंता ज़ाहिर की जा रही है? 

मैं अपने दोस्तों की सूचि में मौजूद लोगों में भी ऐसी नफरत को देख रहा हूँ। हालाँकि हैरान नहीं हूँ, क्योंकि जानता हूँ कि कट्टरपंथी मुखर होते हैं और मासूम लोगों को बड़ी जल्दी अपनी ज़द में ले लेते हैं, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे मुल्क इसका जीता-जागता उदहारण हैं!

दरअसल कट्टरपंथी सवाल से डरते हैं, यह कभी नहीं चाहते कि कोई उनके ऊपर उंगली उठाए, उनके फैसलों पर 'सवाल' करे। वोह जो करते हैं, हर हाल में उसे सबसे मनवाना चाहते हैं, सो अब सवाल करने वाला देशद्रोही है। कट्टरपंथी हमेशा से ही सवाल और सवाल पूछने वालों से नफरत करते आए हैं, क्योंकि इनके पास सवालों के जवाब नहीं होते और ना ही जवाब देने की सलाहियत, केवल कुतर्क होते हैं। आप ईरान पर सवाल करेंगे तो यह तूरान का ज़िक्र छेड़ेंगे...

इन नफ़रत पालने वालों को
कहां परवाह है सत्य की
उन्हें बस नफरत है, 
कुछ नामों से, 
कुछ चेहरों से,
कुछ लिबासों से,
और अपने ख़िलाफ़ 
उठती हुई आवाज़ों से...

कट्टरता हमारे मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर लेती है, जिससे हम विपरीत विचारधारा की तार्किक बातों को भी नहीं देख पाते। इंसानियत के दुश्मनों से सख़्ती से निपटने के लिए देश को एकजुट होना चाहिए, कट्टरपंथी किसी एक धर्म के नहीं होते, इसलिए हर तरफ के कट्टरपंथीयों के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। 

आम हिंदू आम मुस्लिम से नहीं लड़ता और ना ही आम मुस्लिम आम हिंदू से, यह कट्टरपंथी ही हैं जो राजनैतिक आकाओं के इशारों पर नफ़रतें फैलाते हैं। आज हमें यह समझना होगा कि समाज के अंदर फैली यह नफ़रतें हुई नहीं हैं बल्कि पैदा की गईं हैं, इसलिए मुक़ाबले के लिए साज़िशों को बेनक़ाब और मुहब्बतों की कोशिश करनी होंगी। सच्चाई यह है कि नफ़रत की राजनीति 'देशहित' की आड़ में 'देश हिट' कर रही है और इसका जवाब आपसी मौहब्बत और विश्वास है। 

सहिष्णुता, नरमपंथ और मुहब्बत हमेशा से ही मेरे देश की ताकत रही है, इसलिए मैं उन्हें देशद्रोही मानता हूँ जो इसे नफ़रत में बदलना चाहते हैं। सत्ता के लिए नफ़रत की जो खेतियाँ बोई गईं उसकी फसल आज लहलहा रही है, इसलिए देश में हो रही सांप्रदायिक हत्याओं के ज़िम्मेदार वोह भी हैं जिन्होंने नफ़रत के कारोबारियों का समर्थन किया... यह आज की ज़रूरत है कि कट्टरपंथीयों से लड़ने के लिए नरमपंथियों को आगे आएं! 

हालाँकि यह सच है कि हमारे देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, आपसी मौहब्बत में अब वोह पहले वाली बात नहीं रही, आपसी रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं... पर हम कोशिश करें, अपने बच्चों को सही सीख दें, मुहब्बत सिखाएं तो शायद फिर से बात बन सकती है... वर्ना नफरत की राजनीति तो अपना काम कर ही रही है!

और अंत में बस इतना ही कहूंगा कि "जो लोग नफ़रत करते-करते ऊब गए हों वोह मुहब्बत करके देखें, खुशियाँ इसी में हैं!"







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कब तक चुप रहोगे नफ़रत‬ की इस खेती पर?

आज दादरी में किसी को गौ-मांस के नाम पर मारा है, कल एक को आतंकवादी बता कर मार दिया गया था... इलेक्शन आ रहा है और रोज़ाना गाहे-बगाहे ऐसी ख़बरें भी आती जा रही हैं। इस भुलावे में मत रहना कि यह सब किसी मांस के टुकड़े या आतंक के कारण हो रहा है, क्योंकि अगर यही कारण होता तो हमला इन निर्बल लोगों पर नहीं परन्तु दुनिया में गौमांस के सबसे बड़े निर्यातक हमारे देश की बड़ी-बड़ी मांस निर्यातक कंपनियों पर होता, या फिर विरोध उन्हें करों में बढ़चढ़ कर छूट और प्रोत्साहन देने वाली हमारी सरकार का होता, परन्तु कभी ऐसा नहीं हुआ क्योंकि इस हिंसक प्रवत्ति के पीछे कारण एक ही है और वोह है ‎सत्ता की मलाई के लिए 'नफ़रत‬ की खेती'।

ज़रा ग़ौर कीजिये कि क्या आप अपने-आसपास इस नफ़रत के बारूद को महसूस नहीं कर रहे हैं? हैरत की बात है कि आप महसूस कर भी रहे हैं फिर भी चुप हैं। यह धीरे-धीरे हर इक की नसों में बहता जा रहा है, बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि इस ज़हर को सुनियोजित तरीके से हमारी नसों में बहाया जा रहा है।

नफ़रत का तो यही नतीजा होना था, सो हो रहा है! पर अगर आज भी इस गंदगी के विरुद्ध खड़ा नहीं हुआ गया तो इन नफरतों का यूँ ही कई गुना तेज़ी से बढ़ना तय है। 

अगर ज़िंदा रहना चाहते हो और इंसानियत को ज़िंदा रखना चाहते हो तो उठो और इन कट्टरपंथी विचारों वाले दलों और संगठनों को अपने जीवन से लात मार कर बाहर करो! और हाँ यह कट्टरपंथी हर इक धर्म, समाज में मौजूद हैं, कुछ बड़ी मछलियाँ हैं जो नज़र आ रही हैं, मगर इनके चक्कर में छोटी मछलियों को प्रश्रय मत दे देना!

या फिर आज खूब सारा अफ़सोस करना और अगले अफ़सोस के दिन का इंतज़ार करते रहना... नौटंकीबाज़ो!

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पहले देश के हालात ठीक करिये फिर 'Make in India'

'Make in India' की विफलता का कारण ही यही है कि पहले देश के हालात को ठीक नहीं किया गया। अगर घर में कूड़ा पड़ा हो तो आप लोगों को दावत पर नहीं बुला सकते हैं, इसके लिए पहले घर की सफाई करनी पड़ेगी, तब जाकर लोग आएँगे। 

इसलिए पहली ज़रूरत समाज से नफ़रत, भ्रष्टाचार और अपराध की राजनीति को समाप्त करने की है, जहाँ देश के नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए 'नफ़रत की खेती' करते हों वहां 'Make in India' कैसे संभव है भला? हमें यह समझना होगा कि  Business without peace संभव ही नहीं है, अनिश्चितताओं और हिंसा के भय में रह रहे क्षेत्र में व्यापार कभी फल-फूल नहीं सकता।

सौजन्य: 'दा हिन्दू'
क्या देश में चरम पर पहुँच चुके भ्रष्टचार के चलते विदेशी कम्पनियाँ देश में आकर विनिर्माण  (Manufacturing) में इच्छुक होंगी, जबकि छोटे से छोटे काम के लिए सरकारी दफ्तरों में बड़े से बड़े ऑफिसर और बाबुओं से लेकर चपरासी तक भ्रष्टाचार में पूरी तरह डूबे हुए हों, जहाँ प्रोजेक्ट्स को पास करवाने के लिए मंत्रियों, संतरियों से लेकर माफियाओं तक को पैसा देना पड़ता हो!  

क्या देश में शिक्षा के हालात ठीक किये बिना कंपनियों को कार्य करने के लिए Skilled Labour मिल पाएगी? जबकि देश में शिक्षा की हालत बदतर है और शिक्षा उद्योगपतियों की बपौती बन कर रह गई हो?

इसलिए पहली ज़रूरत समाज से नफ़रत, भ्रष्टाचार और अपराध और इसमें लिप्त राजनीति को समाप्त करने की है,  इसके साथ-साथ शिक्षा, न्याय, स्वास्थ्य, इंफ्रास्टक्चर में निवेश करना पड़ेगा। देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए इंफ्रास्टक्चर में आमूलचूल परिवर्तन लाना पड़ेगा।

मतलब ‪#‎MakeIndiaFirst‬ करना पड़ेगा और अगर ऐसा हो गया तो हमें किसी के आगे जाकर हाथ फैलाने, गिड़गिड़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी बल्कि देश में विनिर्माण के लिए इन विदेशी कंपनियों की ख़ुद-बा-ख़ुद लाइन लगेगी । 

सबसे पहले देश के हालात ठीक करिये प्रधानमंत्री जी! 

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अबकी बार, कैसी सरकार?

लोकसभा इलेक्शन ख़त्म हुए 7 महीने से ज़्यादा समय हो चुका है। भाजपा का नारा था कि "बहुत हुआ भ्रष्टाचार, अबकी बार मोदी सरकार"...

तो अब तो सरकारी दफ्तरों में बिना रिश्वतों के काम होने लगा है ना? पुलिस बिना रिश्वत के ही काम करने लगी हैं और नगर निगम वाले भी सुधर गए हैं? नहीं?

"बहुत हुआ नारी पर वॉर, अबकी बार मोदी सरकार"... मतलब महिलाएं पूर्णत: सुरक्षित हैं? अब उन्हें बलात्कार का दंश नहीं झेलना पड़ता है? भाजपा और उसकी सरकार के द्वारा नारी पर अत्याचार करने वालों से सख्ती से निपटा जा रहा है? नहीं?

"बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार"... अब दवाइयाँ, सब्ज़ियाँ, अनाज, दालें, फल इत्यादि-इत्यादि बेहद सस्ते हो गए हैं? अस्पतालों, डॉक्टरों की फीस तो आधी रह गई है?

"बहुत हुआ घौटालों का व्यापार, अबकी बार मोदी सरकार"... मतलब सरकार / भाजपा ने घौटाले के आरोपियों को जेल / बाहर का रास्ता दिखा दिया है? कम से कम पार्टी में तो अब एक भी दाग़ी नेता नहीं है? हैं ना?

"बहुत हुआ रोज़गार का इंतज़ार, अबकी बार मोदी सरकार"... आज हालात यह है कि नौजवानों के लिए रोज़गार की बाढ़ आ गई है, तनख्वाहें तक कई गुना बढ़ गई हैं? क्या कहते हैं?

"बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार"... मतलब अब तो देश में किसानों की मुश्किलें हल हो ही गई हैं? उनकी आर्थिक स्थिति में ज़बरदस्त सुधार आ गया हैं ना? कम से कम उनकी आत्म हत्याएँ तो बंद हो ही गई होंगी? नहीं?

कालेधन से जन-जन को धनवान करने का वादा था, 15 लाख रूपये की बात थी... कम से कम लोगों को पहली क़िस्त तो मिल ही गई होगी? है कि नहीं?

क्योंकि सुना है जादू अभी तक चल रहा है..




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चाइना का दुःसाहस और हमारा ढुलमुल रवैया


पिछले दिनों जिस तरह देश के प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि स्वयं चीनी राष्ट्रपति की मौजूदगी में गुजरात सरकार के द्वारा चीन के साथ व्यापारिक एमओयू पर साइन करने के बाद बाँटे गए नक़्शे में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को विवादित क्षेत्र दिखाया गया, यह बिलकुल चीनी दावे पर हमारी सरकार के द्वारा मुहर लगाने जैसा है
साभार: Times Now
मोदी जी ने कहा था कि व्यापार उनकी रगों में है, वहीँ उनकी पार्टी भी केवल स्वयं को ही राष्ट्रवादी दर्शाती है... तो क्या यह भी किसी शिष्टाचार / व्यापार / राष्ट्रवादिता का हिस्सा है? मेरा प्रश्न यह है कि गूगल मैप को अपनी साइट पर दिखाने जैसी छोटी सी गलती पर 'आम आदमी पार्टी' को देशद्रोही बताने और 49 दिनों तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे उसके नेता अरविन्द केजरीवाल और AK49 जैसी स्तरहीन बातें कहने वाले नरेंद्र मोदी आखिर अब इस देशद्रोह पर मौन क्यों हैं?
कुछ दिन पहले आपने इलेक्ट्रॉनिक्स मिडिया को ज़ोर-जोर से चिल्लाते हुए सुना होगा कि मोदी जी के दो-टूक कहते ही चाइनीज़ आर्मी वापिस चली गई, जो कि बाद में फेक न्यूज़ निकली...
हालत यह है कि चाइना की आर्मी अभी तक हमारे क्षेत्र पर कब्ज़ा जमाए हुए है और वहां के राष्ट्रपति सेना को क्षेत्रीय युद्ध के लिए तैयार रहने का हुक़्म दे रहे हैं। उनके द्वारा सीमा विवाद पर कड़ा रुख अपनाया जा रहा है, लद्दाख में अतिक्रमण को उनके राष्ट्रीय हित से जोड़ा जा रहा है
हमें यह तय करना होगा कि हमारे लिए चाईना से व्यापारिक रिश्ते इतने ज़रूरी हैं कि उनका राष्ट्रपति हमारे मुल्क में आए तो हम उनके सामने स्वयं अपनी जगह को विवादित दिखा दें, वोह हमारे क्षेत्र पर कब्ज़ा करें, हमारे ही घर में घुसकर हमारे सैनिकों को आँख दिखाए, अपशब्द कहें, उनका घेराव करके कब्ज़ा जमाए और हम उनके साथ अपना रूहानियत का रिश्ता बताएं?
क्या हमारे लिए अपने देश में उनको व्यापार के ज्यादा अवसर देना, उनके उधार से स्मार्ट सिटी बनाना ज़्यादा ज़रूरी है या फिर अपने जवानों के मनोबल, उनकी इज्ज़त देश की संप्रभुता, सम्मान और अपनी ज़मीन की रक्षा करना?
जब तक चाईना अपना रवैया नहीं बदलता है, कम से कम तब तक तो हमें सख्त रवैया अपनाना ही चाहिए
कारगिल में पाकिस्तानी सेना के दुस्साहस पर हमारी सेना ने उन्हें फ़ौरन मज़ा चखाया था... मगर इस बार व्यापार की चिंता ज़्यादा नज़र आ रही है या फिर नोबेल पुरस्कार की! 
देश की संप्रभुता कहीं पीछे छूट गई लगती है।

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सेवक या शासक?

कोई फर्क नहीं पड़ता, चाहे नरेन्द्र मोदी हों या मनमोहन सिंह, वाजपेयी हों या कोई और... कोई भी प्रधानमंत्री, जनता का सेवक तब तक नहीं हो सकता जब तक कि देश की जनता हद दर्जे तक असुरक्षित हो और वोह लाल किले से झंडा फहराने के लिए आए तो 700 से ज़्यादा सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षाबलों के 30-35 हज़ार जवानों से घिरा हो। यहाँ तक कि इतने भारी-भरकम बंदोबस्त के बवाजूद आस-पास के रिहायशी घरों को अपनी खिड़कियाँ बंद करने पर मजबूर किया गया हो।

जबकि देश की महिलाऐं और बच्चे बिना कपड़ो के ज़िन्दगी गुजारते हों और उनके कपड़े देश ही नहीं दुनिया के मशहूर ड्रेस डिज़ाईनर ट्रॉय कॉस्टा जैसों के द्वारा डिज़ाईन किये जा रहे हों! 

माहिलाओं के सम्मान की बात करते हो जबकि ना केवल देश की संसद में अनेकों बलात्कार के आरोपी बैठे हों, बल्कि कैबिनेट में भी बलात्कार के आरोपी मंत्री बने बैठे हो!

पता नहीं वोह राजनेता जनता के सेवक कैसे बन सकते हैं जिनपर देश के लाला उद्योगपति चुनावों में खर्च के नाम पर सट्टा लगाते हों???





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पेशेवर मंत्रालय और ग़ैर-पेशेवर मंत्री

लोगो को लगता है कि किसी अनपढ़ के मंत्री या किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने तथा किसी कम पढ़े लिखे या अनप्रोफेशनल के प्रोफेशनल मंत्रालय को देखने में कोई फर्क ही नहीं है?

बंधुओं योग्यता पढ़ाई की मोहताज नहीं होती, मगर इसका मतलब यह नहीं कि कालीन बनाने के हुनरमंद को सोफ्टवेयर बनाने का काम दे दो। योग्यता और पेशेवर योग्यता में फर्क होता है... किसी कम्पनी का मालिक होने का मतलब यह नहीं कि वह कम्पूटर प्रोग्रामिंग से लेकर फाइनेंस और मार्केटिंग से लेकर ग्राफ़िक्स डिजाइनिंग तक करने की क्षमता स्वयं रखता हो, बल्कि उसे इस तरह के पेशेवर कार्यों के लिए पेशेवर लोग रखने पड़ेंगे। इसलिए उसके ग़ैर-पेशेवर या पेशेवर होने से फर्क नहीं पड़ता, शिक्षित होने से भी उतना फर्क नहीं पड़ेगा जितना अयोग्य होने से पड़ेगा।

आम से काम तो सभी कर सकते हैं, केवल योग्यता की आवश्यकता होती है। मगर पेशेवर कार्यों के लिए पेशेवर लोगो को ही आगे करना चाहिए...

अब तक चलता रहा तो कब तक चलता रहेगा? अगर मेरी बात समझ रहें हैं तो आपको याद होगा कि अब स्वास्थ मंत्री डॉक्टर ही बनने लगे हैं... ऐसे ही खेल मंत्री किसी खिलाड़ी को बनाया जाना चाहिए और देश में उच्च शिक्षा और साक्षरता जैसे अहम काम की ज़िम्मेदारी शिक्षा के क्षेत्र के किसी उच्च शिक्षित व्यक्ति को ही मिलनी चाहिए, बारहवीं वाले को नहीं! जिससे शिक्षा में अनिच्छुक लोगों में गलत सन्देश ना जाए और उच्च शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा रखने वालों को उनकी हसरतों / ज़रूरतों के मुताबिक़ अवसर प्राप्त हो सकें... जान-पहचान के बल पर तो और भी मंत्रालय दिए जा सकते हैं।

यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति साक्षरता के लिए लोगों को प्रोत्साहित कर सकता है, जो स्वयं स्नातक तक की डिग्री ना रखता हो तथा स्वयं अपनी शिक्षा को लेकर हलफनामों में गलत जानकारी देता रहा हो?

अगर कोई यह तर्क देता है कि पढ़े-लिखों ने सिवाए घोठालों के क्या किया? तो यहाँ यह समझना आवश्यक है कि शिक्षा भ्रष्ठ होने से नहीं रोक सकती जबतक नैतिकता ना हो! और इससे यह परिपाठी भी नहीं बनाई जा सकती है कि अगर कोई प्रोफेशनल व्यक्ति सफल नहीं हुआ इसलिए अशिक्षित को ज़िम्मेदारी सौंपी जाए!

यहां बात किसी के सफ़लता पूर्वक करने या ना करने की है भी नहीं, बल्कि पेशेवर कार्यों के नियम पेशेवर तरीके से ही बनने चाहिए, कभी अच्छे रिज़ल्ट नहीं भी आएं, तब भी...  मतलब अगर कोई ग़ैर-पेशेवर सफल भी हो जाए तब भी इसे नियम नहीं बनाया जाना चाहिए!





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भारत-पाक संबंध: आहिस्ता चलिए!

पाकिस्तान से बातचीत का विरोध की जगह स्वागत होना चाहिए, मगर यह भी हक़ीक़त है कि बिना किसी ठोस शुरुआत के सीधे-सीधे उनके प्रधानमंत्री को बुलाने से पब्लिसिटी के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होगा। अगर रिश्तों को ठीक करना है तो इसके लिए कोशिश दोनों तरफ से होनी चाहिए। आंखमूंद कर और एकदम से विश्वास नुक्सान दे सकता है, पुराना अनुभव भी इसका गवाह रहा है।


बल्कि संबंधों को बेहतर बनाने के लिए छोटे-छोटे निर्णयों के साथ वक़्त देना चाहिए। वक़्त इसलिए भी क्योंकि पाकिस्तान में सारी ताक़त सरकार के पास नहीं है। यह एक हकीक़त है कि वहां की सरकार चाह कर भी सबकुछ नहीं कर सकती। हमारे लिए यह याद रखना अत्यंत आवश्यक है कि ग्राउंड रिएलिटीज़ पर काम किये बिना करे गए इसी तरह के प्रयास पर वाजपेयी जी को भी धोखा खाना पड़ा था। और उसकी भरपाई के लिए कारगिल युद्ध में हमारे सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी।

बल्कि मेरा यह मानना है कि सम्बन्धो के विस्तार के लिए सबसे पहले दोनों तरफ के सैनिक-असैनिक बंदियों को रिहा करने, व्यापार को आसान बनाने और एक दूसरे देश में कारोबारियों और आम नागरिकों की आवाजाही को आसान बनाने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए। सबसे ज़रूरी है कि अच्छे संबंधों के लिए दोनों देशों की जनता तैयार हो और इसके लिए परस्पर विश्वास का बहाल होना आवश्यक है। बल्कि मेरा मानना है कि सम्बन्धो की बहाली तभी संभव है, जबकि इसके लिए जनता की बीच में से आवाज़ उठे!

पाकिस्तान से संबंधों पर मनमोहन सरकार की नीति बेहतरीन थी, हालंकि उनकी सरकार ने भाजपा के ज़बरदस्त दबाव के कारण इस पर कुछ ज़्यादा ही सुस्ती से काम किया। कम से कम भाजपा सरकार के पास बिना किसी दबाव के काम करने का एक अच्छा मौका है और नरेन्द्र मोदी को इसका फायदा उठाना चाहिए।




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क्या EVM हैक करना संभव है?

फेसबुक / ट्विटर जैसी सोशल साइट्स पर आजकल इस तरह की फोटो लगातार शेयर्स की जा रही हैं, जिसमें एक तथाकथित भाजपा कार्यकर्ता के द्वारा फेसबुक पर एक फोटो शेयर की गई है। जिसमें वह अपने घर पर चुनाव से पहले EVM मशीन के साथ दिखाई दे रहा है और उसके मित्र उससे इस बारे में कॉमेंट कर रहे हैं।

इस पर पठान परवेज़ लिखते हैं कि "क्या हम चुनाव से ठीक एक दिन पहले EVM को अपने घर ला सकते हैं? यहाँ इस फोटो में एक भाजपा सपोर्टर EVM के साथ अपने घर पर दिखाई दे रहा है। वाराणसी में प्रयोग होने वाली EVM में 42 उम्मीदवार और एक नोटा को मिलकर टोटल 43 बटन होने चाहिए, जो कि फोटो में दिखाई भी दे रहे हैं।
 
आपसे अनुरोध है कि इस फोटो को इलेक्शन कमीशन को फॉरवर्ड करें, जिससे कि सत्यता की जाँच हो सके. यह एक बड़ा फ्रॉड दिखाई दे रहा है, अगर सच हुआ तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा।"

इसी फोटो पर समीर लिखते हैं कि "बीजेपी समर्थको द्वारा इस तरह की फोटो अपलोड की जा रही है। मै सभी राजनितिक दलों और चुनाव आयोग से यह जवाब चाहूँगा कि  वो इस तरह की खबर पता लगने के बाद भी शांत क्यों बैठा है? चाहे कुछ भी है, चुनाव आयोग को इसका जवाब देना पड़ेंगा की सरकारी मशीन किसी पार्टी विशेष के कार्यकर्ता के घर कैसे जा सकती है। क्या इसमें चुनाव आयोग भी मिला हुआ है?"

इस विषय पर मैंने चुनाव से पहले ही 5 अप्रेल को शबनम हाशमी की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का ज़िक्र करते हुए फेसबुक पर स्टेटस डाला था:

"क्या इलेक्शन कमीशन की राजनैतिक दलों से हैक हो सकने वाली वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर कोई सेटिंग हो सकती है? यह सवाल खड़ा किया है शबनम हाशमी ने। उन्होंने बताया कि दो दिन पहले खुद चुनाव आयोग ने ईवीएम हैकिंग को पकड़ा है, जहां किसी भी बटन को दबाने पर वोट भाजपा के खाते में ही गया था, मगर इसके बावजूद कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। उन्होंने एक फिल्म के द्वारा समझाया कि कैसे ईवीएम की मॉस हैकिंग की जा सकती है, मतलब एक साथ हज़ारों मशीनों से मन-पसंद वोट डलवाए जा सकते हैं।

उन्होंने बैलेट पेपर्स के द्वारा चुनाव कराए जाने की मांग की, जिससे कि वोट करने वाले को पता रहे कि उसका वोट किस प्रत्याशी को पड़ा। इस मुद्दे पर प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए शबनम हाशमी।"

इस बीच हरियाणा और महाराष्ट्र जैसी कई जगहों से भी यह खबरे आईं की EVM पर कोई भी बटन दबाने से एक ही उम्मीदवार को वोट डल रहे हैं।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि चुनाव नतीजा किसी EVM हैक के कारण आया है! वैसे भी मैं ऐसा इलज़ाम बिना किसी ठोस सबूत के नहीं लगा सकता हूँ। मैं सिर्फ इस ओर ईशारा कर रहा हूँ कि कई लोगो ने यह दावा किया है कि EVM आसानी से और एक साथ बड़ी तादाद में हैक हो सकती हैं। और इसके साथ ही मैं यह मालूम करना चाहता हूँ कि पार्टी विशेष के कार्यवाकर्ताओं के इस तरह के फोटो पर जाँच क्यों नहीं हुई? और अगर हुई तो क्या हुई? यह आम लोगो को जानने का हक़ है।

साथ ही साथ आम जनता को यह जानने का अधिकार है कि EVM पर चुनाव आयोग किस तरह की सिक्योरिटी अपनाता है। मेरी मांग है कि इसे और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि वोटर को पता चल सके कि उसका दिया वोट उसके पसंद के प्रत्याशी को ही मिलता है या नहीं। यहाँ यह भी एक पॉइंट है यह सूचना वोट की गोपनीयता के उसूल के भी खिलाफ है कि लोकसभा चुनाव में ब्लॉक / कॉलोनी स्तर अथवा विधानसभा स्तर पर किस पार्टी को कितने मत मिले। बैलेट पेपर्स में गिनती से पहले सारे बैलेट्स को पहले मिलाया जाता था, जिससे कि क्षेत्रवार नतीजा पता नहीं चल पाएं, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है।
अगर चुनाव लोकसभा सीट का है तो उम्मीदवारों को जानकारी केवल सीट के स्तर पर ही मिलनी चाहिए, जिससे कि जीतने के बाद सांसद किसी क्षेत्र विशेष से दुर्भावना से काम ना करे अथवा किसी तरह का पक्षपात नहीं कर सके।


देशनामा.कॉम पर पढ़ें:







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चुनाव, सर्वेक्षण और रियेक्शन

पता नहीं लोग चुनावी सर्वों को लेकर इतने उत्साहित या फिर नाराज़ क्यों हैं? चुनावी प्रक्रिया समाप्त होने से पहले तो फिर भी इनकी विश्वसनीयता पर संदेह किया जा सकता है,  Paid Servey का आरोप भी ठीक हो सकता है, लेकिन एक्ज़िट पोल पर इतनी हाय-तौबा करना ठीक नहीं है। 

मानता हूँ कि सर्वेक्षण करने का जो तरीका देश में इस्तेमाल किया जाता है उसमें अनेक कमियाँ हैं, मगर यह कमियाँ ना भी हो तब भी इसकी अपनी एक सीमा है। सर्वेक्षण पूरी तरह से 'लिए गए सेम्पल और सर्वे के लिए गए अधिकारी' की काम के प्रति निष्ठा पर निर्भर करता है। गाँव, कस्बों और शहरों में एक ही विधि से किये गए सर्वेक्षण दोषपूर्ण हो सकते हैं, वहीँ अगर अलग-अलग समूहों अथवा सोच के हिसाब से गहन अध्यन ना किया जाए तो परिणामों से मिलान दूर की कौड़ी साबित होगा। इसी के साथ किसी एक तरह के क्षेत्र अथवा समूह में किया गया सर्वेक्षण दूसरी जगह अथवा समूह का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।

हमें यह समझना होगा कि सर्वेक्षण का काम केवल रुझान बताना ही होता है, इनको कभी भी शत-प्रतिशत सही नहीं समझा जाता है और ना ही समझा जाना चाहिए। ठीक ऐसे ही पूरी तरह नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जाता और किया भी नहीं जाना चाहिए।





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क्या चुनावी सर्वे भी फिक्स होते हैं?

देश में चुनाव के मौसम में सर्वे कंपनियों का बोलबाला है। मिडिया चैनल्स के साथ मिलकर यह कम्पनियां अपने सर्वे को ऐसे पेश करती हैं, जैसे वोह कुल जनसँख्या के कुछ प्रतिशत लोगो पर किया गया सर्वे नहीं बल्कि चुनाव का नतीजा हो।  सर्वे वाले प्रोग्राम की टेग लाइन कुछ इस तरह की होती हैं -  "देश में अमुक पार्टी को इतनी सीटें मिलने जा रही हैं" या फिर "देश में फिलहाल अमुक पार्टी की ज़बरदस्त हवा चल रही है"

हालाँकि पिछले कई चुनाव से यह सर्वे का काम चल रहा है, मगर अक्सर चुनाव के नतीजे इन सर्वों के उलटे ही होते हैं, चैक करने के लिए देश में हुए पुराने चुनावों के नतीजों और सर्वे पर नज़र डाली जा सकती है। पिछले दिनों सर्वे एजेंसियों पर हुए स्टिंग ऑपरेशन से भी इस फिक्सिंग का खुलासा हो चूका है।

 मेरे हिसाब से तो हमारे देश के चुनावी सर्वे हर इलेक्शन में किसी ना किसी पार्टी के द्वारा जनता का ब्रेनवाश करने की कोशिश से अधिक कुछ भी नहीं है।


क्या यह सर्वे भी Paid Media की तरह फिक्स होते हैं?

इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जब मैंने कुछ प्रमुख सर्वे कम्पनियों की पड़ताल की तो पाया:

देश की चुनावी सर्वे करने वाली प्रमुख कंपनी सी-वोटर के संस्थापक और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं यशवंत देशमुख, जो कि जनसंघ के संस्थापक सदस्य नाना जी देशमुख के पुत्र हैं। गौरतलब रहे कि सी-वोटर इंडिया टुडे ग्रुप के साथ मिलकर सर्वे करता रहा है।

दूसरी बड़ी सर्वे कंपनी है हंसा ग्रुप, जिसने एनडीटीवी के साथ मिलकर एनडीए को फुल मेजोरिटी का सर्वे दिखाया था। इसके पूर्व सीईओ हैं तुषार पांचाल, और यह वही तुषार हैं जो अभी नरेन्द्र मोदी की पीआर मार्केटिंग संभाल रही अमेरिकन कम्पनी APCO Worldwide के सीनियर डायरेक्टर हैं।

क्या ऐसे में आपको लगता है कि इस तरह के सर्वे विश्वसनीय हो सकते है?

मिडिया पर जिस तरह भाजपा की लहर और कांग्रेस पर कहर को दिखाया जा रहा है, क्या किसी को याद है कि अभी दिसंबर में दिल्ली विधानसभा इलेक्शन में किसकी लहर और किसपर कहर दिखाया जा रहा था और जनता ने फैसला क्या दिया? 

याद नहीं 'आप' को केवल 8 सीट और भाजपा को पूर्ण बहुमत वाली लहर मिडिया चैनल्स पर थी। जबकि दिल्ली से ज़्यादा कोई और शहर न्यूज़ चैनल क्या देखता होगा?

दरअसल यह और कुछ नहीं बल्कि पैसे के बल पर लोगो के दिलों में अपनी बात बैठा देने की धूर्तता से अधिक कुछ भी नहीं, और वोह भी केवल इसलिए कि वोटिंग के लिए आपकी सोच और असल मुद्दे इनकी मार्किटिंग के बल पर गौण बनाए जा सकें।


ऐसे में एक सर्वे कुछ ऐसा भी हुआ है, जो ज़्यादातर सोशल मिडिया पर घूम रहा है, जबकि मेनस्ट्रीम मिडिया ने इसे भाव ही नहीं दिया है।

"TRUE VOTERS" सर्वे के हिसाब से राज्य और बीजेपी की संभावित सीट्स इस प्रकार हैं:

उत्तर प्रदेश 80 -- बीजेपी - 16
महाराष्ट्र 48 -- बीजेपी - 09
आन्ध्र प्रदेश 42 -- बीजेपी - 03
पश्चिम बंगाल 42 -- बीजेपी - 01
बिहार 40 -- बीजेपी - 11
तमिल नाडु 39 -- बीजेपी - 00
मध्य प्रदेश 29 -- बीजेपी - 16
कर्नाटक 28 -- बीजेपी - 08
गुजरात 26 -- बीजेपी - 17
राजस्थान 25 -- बीजेपी - 16
उड़ीसा 21 -- बीजेपी - 02
केरल 20 -- बीजेपी - 00
असम 14 -- बीजेपी - 01
झारखंड 14 -- बीजेपी - 03
पंजाब 13 -- बीजेपी - 01
छत्तीसगढ़ 11 -- बीजेपी - 07
हरियाणा 10 -- बीजेपी - 03
दिल्ली 7 -- बीजेपी - 04
जम्मू और कश्मीर 6 -- बीजेपी - 01
उत्तराखंड 5 - बीजेपी - 02
हिमाचल प्रदेश 4 -- बीजेपी - 02
अरुणाचल प्रदेश 2 -- बीजेपी - 00
गोवा 2 -- बीजेपी - 02
त्रिपुरा 2 -- बीजेपी - 00
मणिपुर 2 -- बीजेपी - 00
मेघालय 2 -- बीजेपी - 00
अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह 1 - बीजेपी - 00
चंडीगढ़ 1 -- बीजेपी - 00
दमन और दीव 1 -- बीजेपी - 00
दादरा और नगर हवेली 1 -- बीजेपी - 00
नागालैंड 1 -- बीजेपी - 00
पुदुच्चेरी 1 -- बीजेपी - 00
मिज़ोरम 1 -- बीजेपी - 00
लक्षद्वीप 1 -- बीजेपी - 00
सिक्किम 1 -- बीजेपी - 00
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कुल - 123 सीट्स. इसमें 10% कम या ज्यादा होने पर भी बीजेपी 140 का आँकड़ा पार नहीं कर पा रही है.


आप क्या कहते हैं?

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