दिल्ली हाई कोर्ट का वो पल अब सुर्खियों में है, जब अदालत की गंभीर दीवारों के बीच शब्दों की तल्खी भी दिखी और तंज भी। अरविंद केजरीवाल खुद कोर्ट में खड़े थे, अपने ही केस में दलीलें दे रहे थे… लेकिन माहौल तब अचानक बदल गया, जब जज जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने उन्हें कहा— आरोप लगाकर इस तरह मुझे घूरिए मत। केजरीवाल बोले मैं पहली बार आया हूं इस कोर्ट में, इसलिए थोड़ा नर्वस हूं।
यह सिर्फ एक सुनवाई नहीं थी, बल्कि भरोसे और शक के बीच की टकराहट थी। केजरीवाल ने अदालत में एक तेजतर्रार वकील की तरह नज़र आए। उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के 4 बार RSS के कार्यक्रमों में शामिल होने का हवाला देते हुए पक्षपात की आशंका जताई। उन्होंने कहा कि “हम उनकी विचारधारा के कट्टर विरोधी हैं, ऐसे में मेरे मन में डर पैदा होता है कि मुझे इस पीठ से इंसाफ़ मिलेगा या नहीं।”
केजरीवाल ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट का फैसला आया था, और हैरानी की बात ये है कि सिर्फ 4 घंटे के अंदर ही CBI ने इस हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। उन्होंने बताया कि वो फैसला 500 पन्नों से भी ज़्यादा का था, जिसमें कोर्ट ने हर एक आरोप को बारीकी से जांचा और फिर विस्तार से अपनी राय दी। जबकि सीबीआई की अपील में किसी भी फाइंडिंग को लेने के कोई फाइंडिंग नहीं है। ऐसे में इस अपील को तो पहले ही दिन खारिज कर देना चाहिए था, क्योंकि वह डिफेक्टिव है। पर उस डिफेक्टिव पिटीशन पर ही स्वीपिंग ऑर्डर पास किया गया।
कोर्टरूम में हर शब्द भारी था… एक तरफ एक पूर्व मुख्यमंत्री, जो खुद अपनी लड़ाई लड़ रहा था, और दूसरी तरफ न्याय की कुर्सी। इस दौरान माहौल कई बार भावुक भी हुआ, तो कई बार तीखा भी।
आख़िर में पीठ ने कहा आपने बहुत अच्छी बहस की। आप वकील भी बन सकते हैं। इस पर केजरीवाल ने कहा धन्यवाद मैडम, मैं जो अभी कर रहा हूँ उसमे खुश हूँ। इसके ऊपर अधिवक्ता हेगड़े ने मज़ाक करते हुए कहा कि मै भी यही कह रहा हूं आप वकील बनकर हमारे साथ प्रतिस्पर्धा मत बढ़ाइए। 😊
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया— क्या इंसाफ सिर्फ होना ही काफी है, या इंसाफ होता हुआ “दिखना” भी उतना ही ज़रूरी है? अदालत ने फिलहाल इस मांग पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन इस टकराव ने कानून, राजनीति और भरोसे के रिश्ते को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
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