हिंदी से बेरूखी क्यों?

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  • Shah Nawaz
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  • (दैनिक जागरण के आज (दिनांक 14 जुलाई) के राष्ट्रिय संस्करण के कॉलम "फिर से" में प्रकाशित)

    हमारी महान मातृभाषा हिंदी हमारे अपने ही देश हिंदुस्तान में रोजगार के अवसरों में बाधक है। हमारे देश की सरकार का यह रुख अभी कुछ दिन पहले ही सामने आया था। बोलने वालों की संख्या के हिसाब से दुनिया की दूसरे नंबर की भाषा हिंदी अगर अपने ही देश में रोजगार के अवसरों में बाधक बनी हुई है तो इसका कारण हमारी सोच है। हम अपनी भाषा को उचित स्थान नहीं देते हैं, बल्कि अंग्रेजी जैसी भाषा का प्रयोग करने में गर्व महसूस करते हैं।

    मेरे विचार से हमें अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। हमें कार्यालयों में ज्यादा से ज्यादा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। कोरिया, जापान, चीन, तुर्की एवं अन्य यूरोपीय देशों की तरह हमें भी अपने देश की सर्वाधिक बोले जाने वाली जनभाषा हिंदी को कार्यालयी भाषा के रूप में स्थापित करना चाहिए और उसी स्थिति में अंग्रेजी प्रयोग करने की अनुमति होनी चाहिए, जबकि बैठक में कोई एक व्यक्ति ऐसा हो, जिसे हिंदी नहीं आती हो।

    कोरिया का उदहारण लें तो वह बिना इंग्लिश को अपनाए हुए ही विकसित हुआ है और हम समझते हैं की इंग्लिश के बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपनी भाषा को छोड़कर दूसरी भाषाओं को अधिक महत्व देते हैं। अंग्रेजी जैसी भाषा को सीखना या प्रयोग करना गलत नहीं है, लेकिन अपनी भाषा की अनदेखी करना गलत ही नहीं, बल्कि देश से गद्दारी करने जैसा है। अपनी भाषा को छोड़कर प्रगति करने के सपने देखना बिलकुल ऐसा है, जैसे अपनी मां का हाथ छोड़ किसी दूसरी औरत का हाथ पकड़ कर चलना सीखने की कोशिश करना। हो तो सकता है कि हम चलना सीख जाएं, लेकिन जब गिरेंगे तो क्या मां के अलावा कोई और उसी तरह दिल में दर्द लेकर उठाने के लिए दौड़ेगी? हम दूसरा सहारा तो ढूंढ़ सकते हैं, लेकिन मां के जैसा प्रेम कहां से लाएंगे?

    पृथ्वी का कोई भी देश अपनी भाषा छोड़कर आगे बढ़ने के सपने नहीं देखता है। एक बात और, हिंदी किसी एक प्रांत, देश या समुदाय की जागीर नहीं है, यह तो उसकी है, जो इससे प्रेम करता है। भारत में तो अपने देश की संप्रभुता और एकता को सर्वाधिक महत्व देते हुए वार्तालाप करने में हिंदी को प्राथमिकता देनी चाहिए। कम से कम जहां तक हो सके, वहां तक प्रयास तो निश्चित रूप से करना चाहिए। उसके बाद क्षेत्रीय भाषा को भी अवश्य महत्व देना चाहिए, क्योंकि भारत की अनेक संस्कृतियां क्षेत्रीय आधार पर ही विकसित हुई हैं।

    आज महान भाषा हिंदी रोजगार के अवसरों में बाधक केवल इसलिए है, क्योंकि हमें अपनी भाषा का महत्व ही नहीं मालूम है। जब हमें अपनी भाषा, अपने देश, आम हिंदुस्तानियों पर गर्व होना शुरू हो जाएगा। हमारा भारत फिर से सोने की चिडि़या बन जाएगा।



    - शाहनवाज़ सिद्दीकी


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    Keywords:
    Hindi, दैनिक जागरण, मातृभाषा, हिंदी

    20 comments:

    1. भाई अब हिंदी हिंदी करने से ....हिंदी वाले ही बिदक जाते हैं..आपने सही सवाल उठाया है...
      हिंदी हमारे देश में इसी तरह चलती है जैसा कि एक दिवंगत देश के मुखिया ने कहा था:
      हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है इसे हमें 'डेवलप' करना है!

      शहरोज़

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    2. apne bilkul sahi kaha hai. maine isme se kuch bate orkut par aapki "Hindi" community mein bhi padhi hai......
      bahut-bahut mubarak ho.

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    3. वाह भाई जान मुझे ख़ुशी है की आप हिंदी भाषा की कदर करते है और इसे डवलप करने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे है
      धन्यवाद

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    4. आप के बहुत अच्छे विचार है
      हिंदी का प्रयोग ज़रूरी है

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    5. आपने सही लिखा

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    6. सही कहा शाहनवाज जी, हिंदी के इस दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम स्वयं दोषी हैं. हमारे बच्चे जब अंग्रेजी में बात करते हैं तो हम खुद बहुत खुश होते है. आज-कल के माहोल को देख कर लगता है जल्दी ही हमारे बच्चे हिंदी बोलना छोड़ देंगे. कुछ ना कुछ करने की आवश्यकता है. अच्छे लेख के लिए धन्यवाद!

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    7. सही कहा शाहनवाज जी, हिंदी के इस दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम स्वयं दोषी हैं. हमारे बच्चे जब अंग्रेजी में बात करते हैं तो हम खुद बहुत खुश होते है. आज-कल के माहोल को देख कर लगता है जल्दी ही हमारे बच्चे हिंदी बोलना छोड़ देंगे. कुछ ना कुछ करने की आवश्यकता है. अच्छे लेख के लिए धन्यवाद!

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    8. वाह भाई जान मुझे ख़ुशी है की आप हिंदी भाषा की कदर करते है और इसे डवलप करने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे है

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    9. सही प्रश्न उठाया है।

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    10. हिंदी का प्रयोग ज़रूरी है

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    11. Maaf kijiyga kai dino bahar hone ke kaaran blog par nahi aa skaa

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    12. हिंदी की दुर्गति के लिए काफी हद तक हम स्वयं ही जिम्मेदार है. चीन में चीनी, जापान में जापानी, दक्षिण कोरिया में हांगुल भाषा ही चलती है. यूरोप में भी अगर इंग्लैंड को छोड़ दे तो हर राष्ट्र की अपनी एक भाषा है फिर चाहे वो जर्मनी हो, इटली हो या स्पेन. ठीक इसी तरह लाटिन अमिरीकी देशो में भी अंग्रेजी का प्रचलन नहीं है.
      यद्यपि देश में जारी किये हुए पासपोर्ट पर अंग्रेजी और हिंदी भाषा में सुचना छपी होती है, लेकिन प्रांतवाद राजनीति के चलते हमारे देश में हिंदी को अभी कर राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है. दक्षिण भारतीय हिंदी से पूर्णत विमुख है और कई बार वे इसे थर्ड लेंग्वेज (तीसरी भाषा) तक भी मानने से इंकार करते है. सबसे दुःख की बात ये है कि जो हिंदी भाषी लोग थोडा बहुत पढ़ लिख लेते है वो अंग्रेजी बोलने में फक्र और हिंदी बोलने में शर्म महसूस करते है. इसलिए हिंदी कि आज ये दुर्दशा है.

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    13. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
      आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

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    14. बहुत ही बेहतरीन पोस्ट है ... आपसे सहमत हूँ ...

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    15. कोरिया, जापान, चीन, तुर्की एवं अन्य यूरोपीय देश भारत की तरह न तो अपनी सीमाओं में बहुभाषी हैं और न ही वहां भाषा के नाम पर लोगों को बाँट कर वोट मांगने का रिवाज़ है.

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    16. @सभी सम्मानित एवं आदरणीय सदस्यों

      आप सबके अपने blog " blog parliament " ( जिसका की नाम अब " ब्लॉग संसद - आओ ढूंढे देश की सभी समस्याओं का निदान और करें एक सही व्यवस्था का निर्माण " कर दिया गया है ) पर पहला प्रस्ताव ब्लॉगर सुज्ञ जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया है , अब इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर बहस शुरू हो चुकी है

      कृपया कर आप भी बहस में हिस्सा लें और इसके समर्थन या विरोध में अपनी महत्वपूर्ण राय प्रस्तुत करें ताकि एक सही अथवा गलत बिल को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सके

      धन्यवाद

      महक

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    17. @सभी सम्मानित एवं आदरणीय सदस्यों

      आप सबके अपने blog " blog parliament " ( जिसका की नाम अब " ब्लॉग संसद - आओ ढूंढे देश की सभी समस्याओं का निदान और करें एक सही व्यवस्था का निर्माण " कर दिया गया है ) पर पहला प्रस्ताव ब्लॉगर सुज्ञ जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया है , अब इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर बहस शुरू हो चुकी है

      कृपया कर आप भी बहस में हिस्सा लें और इसके समर्थन या विरोध में अपनी महत्वपूर्ण राय प्रस्तुत करें ताकि एक सही अथवा गलत बिल को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सके

      धन्यवाद

      महक

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    18. @सभी सम्मानित एवं आदरणीय सदस्यों

      आप सबके अपने blog " blog parliament " ( जिसका की नाम अब " ब्लॉग संसद - आओ ढूंढे देश की सभी समस्याओं का निदान और करें एक सही व्यवस्था का निर्माण " कर दिया गया है ) पर पहला प्रस्ताव ब्लॉगर सुज्ञ जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया है , अब इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर बहस शुरू हो चुकी है

      कृपया कर आप भी बहस में हिस्सा लें और इसके समर्थन या विरोध में अपनी महत्वपूर्ण राय प्रस्तुत करें ताकि एक सही अथवा गलत बिल को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सके

      धन्यवाद

      महक

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    19. bht badiya likha hai shah nawaaz ji,accha sandesh diya hai...hindi bhasha ko lekar...aaj jo log hindi bolne par hichkichate hai,or aangrezi (english)bolne par shaan samjhte hai,unke liye isse badiya sandesh nahi ho sakta...

      :)

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