क्या मंदिर-मस्जिद इंसान की जान से बढ़कर है?

Posted on
  • by
  • Shah Nawaz
  • in
  • Labels: ,
  • हमेशा ही लोगो को मंदिर-मस्जिद, ज़ात-पात, हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लडवाया जाता है. 90 के दशक अथवा उससे पहले लोग बहुत जल्दी बहकावे में आते थे, धीरे-धीरे जनता राजनैतिक दलों की चालों को समझने लगी, और फिर ऐसे राजनेताओं और राजनैतिक दलों को बाहर का रास्ता भी दिखाया गया. क्योंकि लोग जान गए थे कि मंदिर-मस्जिद की आड़ में हमारे साथ खेल खेला जा रहा है, ऊपर से आपस में लड़ने वाले अन्दर से मिले हुए हैं ताकि हमें बेवक़ूफ़ बनाया जा सके. लोग जान गए थे कि प्रेम से बढ़कर आनंद किसी बात में नहीं है, और हर धर्म प्रेम की ही शिक्षा देता है.

    आजकल महसूस हो रहा है कि यह बीमारी ब्लॉग जगत को भी घेर रही है. चंद लेखक अपने-अपने धर्म की दुकानों को चलाए हुए हैं. हालाँकि इन दुकानों से किसी को भी परेशानी नहीं होनी चाहिए, परेशानी शुरू होती है इनके द्वारा अपने धर्म अथवा समाज की अच्छी बातों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की जगह दूसरों की आस्थाओं के अन्दर बुराइयाँ निकालने की प्रवत्ति से. अगर कोई ऐसी दुकान चलता भी है तो होना तो यह चाहिए कि पूरी मानवता के हित के लिए कार्य किये जाएं, लेकिन अगर यह नहीं हो पाता है तो कम से कम अपने समाज के हित के कार्य किये जाएं. अगर अपने समाज में कोई बुराई उत्पन्न हो गई है तो उसे दूर करने की कोशिश की जाए. अगर कोई उसकी अच्छाइयों को बुराई कहकर दुष्प्रचार कर रहा है तो समाज के बीच सही बात को बताया जाए, जिससे की सभी धर्मों की बीच सौहार्द उत्पन्न हो और एक दुसरे को अच्छे तरीके से जाना जा सके. लेकिन कुछ लोगो को तो दूसरों के धर्म में सारी बुराइयाँ नज़र आती हैं तथा कुछ लोगो को केवल दुसरे धर्म को मानने वाले लोगो में ही दुनिया की सारी कमियां नज़र आती हैं. हालाँकि समाज में नज़र दौडाओ तो पता चलता है कि बुराइयाँ हर समाज में हैं, लेकिन मुसलमान हमेशा हिन्दुओं को तथा हिन्दू हमेशा मुसलमानों को संदेह की निगाह से देखते हैं! कभी किसी ने सोचा है ऐसा क्यों? क्योंकि रह-रह कर कुछ लोग एक-दुसरे धर्म के अनुयायिओं के बारे में दुष्प्रचार करते रहते हैं, बल्कि यह कहें कि अपनी दुकानदारी चलाते रहते हैं.


    मेरी नज़र में बुराई इन लोगो में नहीं बल्कि कहीं न कहीं हमारे अन्दर है, हम ऐसे लेखों को जहाँ दूसरों को गलियां दी जा रही हो, मज़े ले-लेकर पढ़ते हैं. क्या कभी हमने विरोध की कोशिश की? आज समय दूसरों को बुरा कहने की जगह अपने अन्दर झाँक कर देखने का है, मेरे विचार से शुरुआत मेरे अन्दर से होनी चाहिए.

    दुनिया में कोई भी मस्जिद या मंदिर किसी एक इंसान की इज्ज़त से बढ़कर नहीं हो सकता फिर जान से बढ़कर कैसे हो सकता है?

    मैं एक मुसलमान हूँ इसलिए उपरोक्त वाक्य कुरआन और हदीस की रौशनी में बता रहा हूँ, आपका सम्बन्ध जिस धर्म से हैं, अगर आप उसमे किसी भी ऐसी बात की जानकारी रखते हैं तो उसे यहाँ अवश्य लिखें, ताकि पुरे समाज में जागरूकता लाई जा सके.


    सुज्ञ के अनुसार:

    पूरे जगत में धरती का कोई कण ऐसा नहिं है,जहां से महापुरूषों ने जन्म धारण न किया हो,या ऐसा कोई अणु नहिं जिसका उपयोग महापुरूषों नें ग्रहण व विसर्जन करने में न किया हो।
    अर्थार्त जगह विषेश किसी भी कारण से पूज्य या अपूज्य नहिं हो जाती।
    धर्म स्थलों का उद्देश्य मानव के हितार्थ,शान्त चित से चिन्तन मनन के हेतू है। मानवता को उंचाईयां प्रदान करने हेतू साधना आराधना करें।
    यही लक्षय है,और इसी कारण से महत्व होना चाहिए।



    मैंने यह लेख "ब्लॉग संसद" पर लिखा है, पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.



    Keywords:
    bharat, Hindu-Muslim, India, Mandir, Masjid, Mosque, Temple, ब्लॉग संसद

    18 comments:

    1. सराहनीय है सौहार्द के लिये आपका यह प्रयास।
      प्रयास से बुंद भी सागर का रूप लेगी।

      ReplyDelete
    2. बीमारी ब्लॉग जगत को भी घेर रही है. चंद लेखक अपने-अपने धर्म की दुकानों को चलाए हुए हैं. हालाँकि इन दुकानों से किसी को भी परेशानी नहीं होनी चाहिए, परेशानी शुरू होती है इनके द्वारा अपने धर्म अथवा समाज की अच्छी बातों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की जगह दूसरों की आस्थाओं के अन्दर बुराइयाँ निकालने की प्रवत्ति से. अगर कोई ऐसी दुकान चलता भी है तो होना तो यह चाहिए कि पूरी मानवता के हित के लिए कार्य किये जाएं, लेकिन अगर यह नहीं हो पाता है तो कम से कम अपने समाज के हित के कार्य किये जाएं. अगर अपने समाज में कोई बुराई उत्पन्न हो गई है तो उसे दूर करने की कोशिश की जाए. अगर कोई उसकी अच्छाइयों को बुराई कहकर दुष्प्रचार कर रहा है तो समाज के बीच सही बात को बताया जाए, जिससे की सभी धर्मों की बीच सौहार्द उत्पन्न हो और एक दुसरे को अच्छे तरीके से जाना जा सके.
      ......Bahut hi sarahaniya aur anukarniya prastuti... Kash yah baat har insaan samjh paata to kitna achha hota!
      Saarthak prastuti ke liye aabhar

      ReplyDelete
    3. सार्थक सोच को बयान करता आपका यह आलेख
      इंसान के लिये धर्म है धर्म के लिये इंसान नहीं

      ReplyDelete
    4. बहुत सार्थक सोच...पढ़े लिखे लोग भी इसमें शामिल हो जाते हैं

      ReplyDelete
    5. विचारणीय लेख। दूसरों की दस देखने से अपनी एक सुधारना अच्छा।

      ReplyDelete
    6. सार्थक पोस्ट। धर्म के नाम पर लड़ाई झगड़े खत्म होने ही चाहिए

      ReplyDelete
    7. धर्म एक बेहद संवेदनशील विषय है, अधर्मियों और काफिरों को अन्य धर्मों पर व्याख्यान नहीं देना चाहिए और यह किसी हालत में नहीं होना चाहिए ! अगर मैं कुरआन पाक का हिन्दी अनुवाद पढके पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ भी उसको परिभाषित करूँ तो मेरी भरपूर श्रद्धा के बावजूद भी मुस्लिम भाई बहन शक की निगाह से ही पढेंगे ! ब्लागजगत में मेरे एक सम्मानित मित्र कुछ ऐसा ही कर रहे हैं जिससे लोगों को कष्ट हो रहा है ! हालांकि मुझे उनकी भलमनसाहत पर पूरा भरोसा है
      किसी का हक़ नहीं बनता कि संवेदनशील विषयों पर दूसरों का दिल दुखाएं ! देर सबेर इससे नफरत ही पैदा होगी और जाहिल लोग खुश होंगे ! आनंद तब आएगा जब हिन्दू ब्लागर, इस्लाम का और मुस्लिम भाई , हिन्दू धर्म का दिल से उसका सम्मान करे !
      जो ऐसा नहीं करेगा कम से कम वह इस देश में सम्मान नहीं पा सकता और अगर मेरा कोई मित्र ऐसा करेगा तो चाहे वे कितने ही सम्मानित हों हमारा दिल ही दुखायेंगे ... हम तो मस्तक तब झुकायेंगे जब मेरे दिल की छवि जैसे बनो ...

      का छवि बरनो आप की, भले बने हो नाथ !
      "तुलसी मस्तक तब नबे धनुषबान लेओ हाथ"

      ReplyDelete
    8. शाहजी बात तो सही है, लेकिन लोग मानते ही नहीं है.

      ReplyDelete
    9. jnaab aadaab hindu muslim dosti ak hi shrt pr ho skti he ke hindu muslmon ke dhrm ki izzt kren to muslim hindu bhaaiyon ke dhrm kaa smmaan kren aap jaante hen ke agr men kisi ke mndir ko nuqsaan phunchata hun to mere hindu dost ko mujh pr hmlaa krne kaa hq he or meraa hindu dost agr meri msjid pr hmlaa krta he to mujhe us pr hmla krne kaa hq he lekin aaj khushi kaa din h khudaa se duaa he ke khudaa aaj freind ship day pr hindu muslim bhaaiyon ko achchaa frend bnaaye . akhtar khan akela kota rajsthan

      ReplyDelete
    10. सब राजनीति का खेल है...बढ़िया आलेख..आभार

      ReplyDelete
    11. @संजय बेंगाणी जी की बात सोलह आने सही है। जो सुबूतों से साबित हो उसे मानना ही देशप्रेमी नागरिकों का कर्तव्य है। जो लोग कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी उसका इन्कार करें वे न धार्मिक हैं और न ही सही नागरिक। ईमान शब्द ही अम्न के माद्दे से बना है , अम्न को क़ायम रखने की ज़िम्मेदारी दूसरों से ज़्यादा मुस्लिमों की है,बेगुनाह इन्सान की जान हरेक इमारत से ज़्यादा क़ीमती है चाहे वह इमारत किसी मस्जिद की ही क्यों न हो ?
      धर्म का काम है कल्याण करना और धार्मिक संतों का काम है धर्म के अनुसार मार्गदर्शन करना। देश के हिन्दू मुस्लिम संतों आलिमों को चाहिये कि वे नेताओं को धर्म के नाम पर आग भड़काकर अपनी अपनी पार्टी के तवे पर राजनीति की रोटी सेकने से रोकें। अगर धर्मपुरूषों के रहते हुए भी धर्म के नाम पर ‘चर्मण्वती‘ जैसी खून की नदियां देश में बहती रहीं तो फिर देश को धर्म और संतों से क्या फ़ायदा मिलेगा ? इसे देखकर तो नास्तिकों की शंकाओं को और ज़्यादा बल मिलेगा।

      @ भाई वत्स जी की बात भी ठीक है । बामियान के विशाल बुत को गिराना भी ग़लत और निंदनीय है। इसे तो महमूद ग़ज़नवी ने भी न ढहाया था क्योंकि वह तो सोना चांदी पर हाथ साफ़ करने का आदी था और यहां तो सिर्फ पत्थर था। इसमें भी सोमनाथ के बुत की तरह हीरे मोती , सोना चांदी भरा होता तो इसे भी तोड़कर वह अपने ख़ज़ाने में भर लेता।

      ***,अब आप लोग पोस्ट के मूल विषय पर भी अपने विचार रखें कि श्री रामचन्द्र जी अयोध्या में अब से कितने समय पहले पैदा हुए थे ?
      यह काल निर्धारण बहुत ज़रूरी है, इससे मीर बाक़ी के काम के सही या ग़लत होने का बड़ा संबंध है। उम्मीद है कि इस सवाल को अब और घुमाने-टलाने का प्रयास नहीं किया जाएगा।
      http://drayazahmad.blogspot.com/2010/08/drayaz-ahmad.html?showComment=1280754860134#c1697085336790605246

      ReplyDelete
    12. @संजय बेंगाणी जी की बात सोलह आने सही है। जो सुबूतों से साबित हो उसे मानना ही देशप्रेमी नागरिकों का कर्तव्य है। जो लोग कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी उसका इन्कार करें वे न धार्मिक हैं और न ही सही नागरिक।

      ReplyDelete
    13. बहुत सुन्दर लिखा अपने. सौहार्द की दिशा में अच्छी सोच ...बधाई.

      ReplyDelete
    14. मेरे विचार से धर्म महज़ एक रास्ता है , अपनी मंजिल तक पहुँचने का । और जब मंजिल एक है , फिर भले ही रास्ते अलग हों तो क्या फर्क पड़ता है । धर्म के नाम पर लड़ने वाले इन्सान तो नहीं हो सकते ।

      सार्थक लेख ।

      ReplyDelete
    15. बड़ा गंभीर आलेख...गहन पड़ताल..साधुवाद.
      कभी 'डाकिया डाक लाया' पर भी आयें...

      ReplyDelete
    16. bht hi aacha likha hai aapne,mere pass shabad hi nahi hai ki kya kahu ...eshwar ne toh keval insaan banaye hai,ye dharm toh humhre netao ne bana diye,aur inki aard mai,jaat-paat ,dharm hinsa ,karwaate hai..

      har dharm ek hi shiksha deta hai,prem ka,bhi-chaare ka,insaaniyat ka...

      well bht sundar likha hai great message :)

      hats-off !! you shah nawaaz ji

      ReplyDelete
    17. इन्सान की जन सबसे पहले.....

      _____________
      'पाखी की दुनिया; में आपका स्वागत है.

      ReplyDelete
    18. सार्थक पोस्ट। धर्म के नाम पर लड़ाई झगड़े खत्म होने ही चाहिए

      ReplyDelete

     
    Copyright (c) 2010. प्रेमरस All Rights Reserved.