जाँच एजेंसियों के इस्तेमाल पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, राजनैतिक ही नहीं कारोबारी डील्स के भी पैटर्न सामने आ रहे हैं, अरविंद केजरीवाल के साथ क्या हुआ, सबने देख ही लिया है। बहुत से बड़े कारोबारियों को भी उसी PMLA के तहत सालों तक गिरफ्तार करके रखा गया, ब्लैकमेल करने के आरोप लगे। आइए एक और मामले को देखते हैं!
2022 में चेन्नई के कारोबारी अहमद ए.आर. बुहारी को ईडी ने लगभग 542 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया। आरोप यह था कि उनकी कंपनी ने कम गुणवत्ता वाले कोयले को ऊँचे दाम पर सरकारी कंपनियों को सप्लाई किया और उससे जुड़ी रकम को विदेशों के रास्ते घुमाया गया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें लंबा समय जेल में बिताना पड़ा। कई बार ज़मानत की कोशिश हुई, लेकिन अदालतों से राहत नहीं मिली। इस दौरान मीडिया में भी मामला लगातार चलता रहा और उन्हें एक बड़े “कोल स्कैम” के चेहरे की तरह पेश किया गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब कानूनी लड़ाई चल रही थी, उसी बीच उनकी कंपनी Coastal Energen आर्थिक संकट में फँसती चली गई। कर्ज़ बढ़ा, कारोबार कमजोर पड़ा और आखिरकार मामला insolvency process तक पहुँच गया। बाद में Adani Power और एक निवेश समूह के consortium ने कंपनी के अधिग्रहण की प्रक्रिया में प्रवेश किया और कंपनी पर उनका नियंत्रण स्थापित हो गया। यानी जिस कारोबारी समूह ने कभी यह प्रोजेक्ट खड़ा किया था, वह धीरे-धीरे उससे बाहर हो गया।
फिर कई साल बाद अदालतों में तस्वीर बदलने लगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने मूल CBI केस को ही खारिज कर दिया। उसके बाद Madras High Court और विशेष CBI अदालत में भी कार्रवाई टिक नहीं पाई। अदालतों ने कहा कि जब मूल अपराध का आधार ही नहीं बचता, तो PMLA का मामला भी अपने आप कमजोर हो जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुहारी ने करीब 31–32 महीने जेल में बिताए, जबकि अंतिम रूप से एजेंसियाँ आरोप साबित नहीं कर सकीं।
यहीं से यह मामला सिर्फ एक कारोबारी विवाद नहीं रह जाता, बल्कि एक बड़े सवाल को जन्म देता है। सवाल यह कि अगर किसी उद्योगपति पर गंभीर आरोप लगते हैं, एजेंसियाँ सक्रिय होती हैं, कंपनी आर्थिक रूप से टूट जाती है, और सालों बाद अदालत कहे कि मामला साबित ही नहीं हुआ — तो उस नुकसान की भरपाई कौन करेगा? क्योंकि अदालत से बरी हो जाना और जिंदगी पहले जैसी हो जाना, दोनों अलग बातें हैं। तब तक प्रतिष्ठा जा चुकी होती है, कारोबार हाथ से निकल चुका होता है और बाज़ार में भरोसा टूट चुका होता है।
भारत में अब इस तरह के मामलों को लोग सिर्फ कानूनी केस की तरह नहीं देखते। इसमें एक पैटर्न दिखाई देने लगा है — पहले जांच, फिर लंबी कानूनी लड़ाई, फिर कारोबारी कमजोरी, फिर insolvency, और अंत में किसी बड़े कॉरपोरेट समूह द्वारा अधिग्रहण। यही मामला राजनैतिक विरोधियों को निपटाने का भी नज़र आ रहा है। आम आदमी पार्टी को ख़त्म करने को कोशिशें सबके सामने हैं। उसके सारे बड़े लीडर्स गिरफ़्तार हुए थे, महीनों, सालों जेल में रहे, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी को थी कि यह केस दो मिनट भी अदालत में नहीं टिकेगा और फिर सेशन कोर्ट ने केस को सुनवाई लायक़ भी नहीं समझा, यहाँ तक कहा कि जाँच एजेंसी कोई एक भी सबूत पेश नहीं कर पायी हैं।
यह धारणा सही है या गलत, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए सबसे संवेदनशील स्थिति वही होती है जब जनता को कानून और संस्थाओं की निष्पक्षता पर शक होने लगे।
अगर बात व्यापार की करें तो किसी भी लोकतंत्र में बाजार सिर्फ पैसों से नहीं चलता, भरोसे से भी चलता है। और जब लोगों को यह महसूस होने लगे कि सफलता मेहनत, जोखिम और प्रतिस्पर्धा से कम, जबकि सत्ता के करीब होने से ज़्यादा तय होती है, तब नुकसान सिर्फ एक कारोबारी का नहीं होता — पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगते हैं।


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