फिलिस्तीन को फिर से यासर अराफात या फिर गांधी जी जैसे एक मज़बूत और संयम रखने वाले लीडर की ज़रूरत है जो क़ौम को एकजुट करने, आर्थिक और ताकत के तौर पर मज़बूत बनाने और संयम बरतते हुए सही वक़्त का इंतज़ार करने की पॉलिसी के साथ आगे बढ़ सके।
गाँधी जी ने 1857 की क्रांति के नतीजों और मौजूदा हालात को देखते हुए भाँप लिया था कि अंग्रेजों के साथ फिलहाल सीधी लड़ाई लड़कर नहीं जीता जा सकता है। क्योंकि अगर उन्हें हरा भी दिया तो आधी से ज़्यादा दुनिया पर राज करने वाले अंग्रेज़ दूसरे देशों से अपनी फौज बुलाकर वापिस कब्ज़ा कर लेंगे और पहले से ज़्यादा खून-खराबा करेंगे। इसलिए बेहतर नीति थी कि क़ौम को इकट्ठा और मज़बूत किया जाए और साथ ही सही वक्त का इंतज़ार किया जाए।
अगर फिलिस्तीन इश्यू पर देखें तो जब इंग्लैंड जैसे देशों ने 1948 में यूएन का मुखौटा लगाकर यहूदियों को दूसरे देशों से लाकर वहाँ बसना शुरू किया और इज़राईल नामक देश को बसाया वो तब से एक ही पॉलिसी पर चल रहा है। वो फिलिस्तीनियों को भड़काता है और जब यह भड़ककर उसपर हमला करते हैं तो वो उसको आधार बनाकर फिलिस्तीन में तबाही मचाता है और उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लेता है 1948 में जहाँ फिलिस्तीन 55% से भी ज़्यादा जगह पर था आज मात्र 12% पर रह गया है।
इन देशों ने इज़राईल को पूरी और लंबी प्लानिंग से बसाया था और दुनिया के इन सभी शक्तिशाली देशों का उसे सपोर्ट हासिल है। मतलब यह कि अगर इज़राईल के हारने का कोई इमकान बनता भी हो तो भी हराना आसान नहीं होगा, क्योंकि यह सारे देश उसके साथ खड़े हैं, जबकि फिलिस्तीन के समर्थन में कोई खड़ा नहीं होगा।
फिलहाल मेरी नज़र में तो फिलिस्तीन को इस वक़्त ऐसी लीडरशिप की ज़रूरत है जो इज़राईल की इस चाल की काट ढूंढकर फिलिस्तीनियों और उनकी जमीन को ना सिर्फ बचा सके बल्कि उन्हें तरक्की की ओर आगे बढ़ा सकें।
फिलिस्तीनियों को जो करना है खुद ही करना पड़ेगा, कड़वी है पर यही सच्चाई है। सबसे पहली ज़रूरत फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के तौर पर मज़बूत बनाना पड़ेगा।
जापान का उदाहरण सबके सामने है कि अमेरिका द्वारा एटम बम के हमले में 2 शहर तबाह होने और अमेरिकी कब्जे के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। बल्कि उन्होंने 30 साल की एजुकेशन पॉलिसी बनाकर ख़ुद को टेक्नोलॉजी में इतना मज़बूत बनाया कि 1970 आते-आते अमेरिका को खुद बा खुद कब्ज़ा छोड़ना पड़ा...


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