है आज समय जागने का

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  • Shah Nawaz
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  • है आज समय जागने का

    है आज समय जागने का,
    सो रहे हो आज क्यूँ?
    गर हौसलों में दम नहीं तो
    जी रहे हो आज क्यूँ?

    हो रही मुल्क की दुर्गति,
    सब कह रहे हैं प्रगति।
    है यही अगर प्रर्गति तो
    रो रहे हो आज क्यूँ?

    धोखाधड़ी में लीन सब,
    है लूटना ही दीन अब।
    सब उंगलियां है सामने,
    खुद किया क्या है आपने?
    है लूटना ही दीन तो
    बैचेन फिर हो आज क्यूँ?

    हर ओर भ्रष्टाचार है,
    सबका यही विचार है।
    गर हुए गम से त्रस्त हम,
    फिर खुद हुए क्यों भ्रष्ट हम।
    है गम का यही सबब तो
    गम पी रहे हो आज क्यूँ?

    जहां दुकानें है धर्म की,
    क्या कीमत होगी कर्म की?
    यह मर्म ही पता नहीं,
    खुश हो रहे हो आज क्यूँ?

    है आज समय जागने का...


    - शाहनवाज़ 'साहिल'






    Keywords:
    Hindi poem, kavita, hai aaj samay jagne ka, rashtra, desh bhakti, jago re, हिंदी

    53 comments:

    1. हर ओर भ्रष्टाचार है,
      सबका यही विचार है।
      गर हुए गम से त्रस्त हम,
      फिर खुद हुए क्यों भ्रष्ट हम।
      है गम का यही सबब तो
      गम पी रहे हो आज क्यूँ?


      शाह नवाज़ जी भावनाओं को झंजोड़ कर रख दिया है आपकी इस कविता ने

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    2. Kya baat hai bhai aap to
      Badhiya KAVI bhi ho...
      Subhanallah!!!...

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    3. है आज समय जागने का,
      सो रहे हो आज क्यूँ?
      गर हौसलों में दम नहीं तो
      जी रहे हो आज क्यूँ?
      क्या बात है !

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    4. mera beta bhi shayri men takkaren maar raha hai aajkal .

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    5. लेकिन उसकी शायरी लौंडे लौंडियों के मतलब कि होती है . कुछ सीखो उससे अगर कहीं मिल जाये मेरा शेखचिल्ली .

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    6. अच्छा अंदाज़ !! अच्छी रचना प्रेरणा देने वाली ..समय हो तो पढ़ें जीने का तमाशा http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/2010/06/blog-post_18.html

      शहरोज़

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    7. हो रही मुल्क की दुर्गति,
      सब कह रहे हैं प्रगति।
      है यही अगर प्रर्गति तो
      रो रहे हो आज क्यूँ?

      हर ओर भ्रष्टाचार है,
      सबका यही विचार है।
      गर हुए गम से त्रस्त हम,
      फिर खुद हुए क्यों भ्रष्ट हम।
      है गम का यही सबब तो
      गम पी रहे हो आज क्यूँ?

      है आज समय जागने का,
      सो रहे हो आज क्यूँ?
      गर हौसलों में दम नहीं तो
      जी रहे हो आज क्यूँ?



      सच में एक सच्ची और बेमिसाल रचना , शाहनवाज़ भाई बहुत बढ़िया

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    8. हम दूसरों को भ्रष्ट कहते हैं और मौका मिलने पर खुद वही काम करने को तय्यार रहते हैं.

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    9. Dil mei deshbhakti ka josh bhar dene wali kavita hai Shahnawaz bhai.

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    10. mind blowing....

      sachayi bayan ki hai....very nice

      hats off ! you

      :)

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    11. सुंदर प्रेरणादायक रचना के लिए आभार

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    12. बहुत बढ़िया समसामयिक रचना हेतू आभार |

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    13. है आज समय जागने का,
      सो रहे हो आज क्यूँ?
      गर हौसलों में दम नहीं तो
      जी रहे हो आज क्यूँ?
      सही बात है आज जागने की जरूरत है। शायद पहले ही बहुत देर हो चुकी है। आज के हालात पर बेहतरीन रचना। आशीर्वाद।

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    14. हो रही मुल्क की दुर्गति,
      सब कह रहे हैं प्रगति।
      है यही अगर प्रर्गति तो
      रो रहे हो आज क्यूँ?

      शुक्रिया आप का

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    15. शाहनवाज जी..सच कहा है मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वाले भी मौका परस्त होते हैं...तो भ्रष्टाचार तो बढ़ेगा ही...

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    16. शाहनवाज जी..सच कहा है मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वाले भी मौका परस्त होते हैं...तो भ्रष्टाचार तो बढ़ेगा ही...

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    17. बहुत सुन्दर शब्द चुने आपने कविताओं के लिए..
      बेमिसाल रचना शाहनवाज़ भाई

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    18. जहां दुकानें है धर्म की,
      क्या कीमत होगी कर्म की?
      यह मर्म ही पता नहीं,
      खुश हो रहे हो आज क्यूँ?

      है आज समय जागने का...
      nice lines... "
      bhavsamy ke liye wanna say-
      कुछ जिंदगी भर
      जिंदगी के
      सलीके लिए फिरते हैं ,
      कुछ
      नहीं जानते -क्या है जिंदगी
      और बस जी लिया करते हैं ;
      कुछ के पास शब्द हैं
      वो बातें बनाते हैं
      और कहते रहते हैं ,
      वहीँ कुछ के पास
      आवाज़ भी नहीं
      और वो सहते रहते हैं".

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    19. बहुत बढ़िया दिल दिमाग को झिंझोडती हुई कविता.

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    20. ... jvalant samasyaa par ek shaandaar rachanaa ... behatreen !!!

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    21. आज के हालात के अनुसार आप की रचना बहुत अच्छी सटीक लगी, धन्यवाद

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    22. आज के हालात को बयां करती इस रचना को पढकर एक शे’र याद आ गया,

      सारा जीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त है
      जिसको देखो वही त्रस्‍त है ।
      जलती लू सी फिर उम्‍मीदें
      मगर सियासी हवा मस्‍त है ।

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    23. सामयिक और आवश्यक रचना के लिए शुभकामनायें शाहनवाज भाई ! काश यह चिंता जल्द दूर हों !

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    24. धोखाधड़ी में लीन सब,
      है लूटना ही दीन अब।
      सच तो यही है ..
      सुन्दर रचना

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    25. आज के राजनीतिज्ञों को न देश दिखाई देता है न देश दिखाई देता है न लोग इन्हें नोट व बस वोट दिखाई देते हैं अगर इन्हें पाकिस्तान से चुनाव जीत कर संसद आने की अनुमति मिल जाए तो ये उसके लिए भी राज़ी हैं...

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    26. बिलकुल सही कहा काजल भाई...

      माना राजनेता भ्रष्ट है
      लेकिन जनता भी तो मस्त है
      और केवल राजनेता ही क्यों
      हर क्षेत्र में हालात पस्त हैं
      सब गर्म नोटों का मज़ा ले रहे हैं
      और हराम की कमाई से आश्वस्त हैं

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    27. waah janaab, kya khoob kaha hae apne. These are the sentiments cruising through every sane Indian or rather every sane citizen of this world.

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    28. Bhaijan AAti Uttam,People must learnt something from this poem.

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    29. बेमिसाल!! शाहनवाज़ भाई,

      हो रही मुल्क की दुर्गति,
      सब कह रहे हैं प्रगति।
      है यही अगर प्रर्गति तो
      रो रहे हो आज क्यूँ?

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    30. अति सुन्दर व अन्तः मन तक पहुचने वाले विचारों से ओत प्रोत रचना के लिए धन्यवाद।
      हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

      मालीगांव
      साया
      लक्ष्य

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    31. sunder rachna. aaj is bahti ganga me sabhi haath dho rahe hai. koi jyada to koi kum.

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    32. हो रही मुल्क की दुर्गति,
      सब कह रहे हैं प्रगति।
      है यही अगर प्रर्गति तो
      रो रहे हो आज क्यूँ ...

      सच कहा अगर ये प्रगति है तो कौम की बर्बादी किसे कहते हैं ...

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    33. लग रहा है कि‍ यह कवि‍ता, आज के दौर के एक भारतीय मन से लि‍खी गई है।

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    34. जगने के पहले बेचैनी न हो, जीवन की नीरवता हो।

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    35. बहुत खूब लिखा है भईया जी ।

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    36. कुछ जिंदगी भर
      जिंदगी के
      सलीके लिए फिरते हैं ,
      कुछ
      नहीं जानते -क्या है जिंदगी
      और बस जी लिया करते हैं ;
      कुछ के पास शब्द हैं
      वो बातें बनाते हैं
      और कहते रहते हैं ,
      वहीँ कुछ के पास
      आवाज़ भी नहीं
      और वो सहते रहते हैं".


      रश्मि सविता जी आपने बिलकुल सही कहा और बहुत खूब कहा... बहुत-बहुत शुक्रिया...

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    37. सभी साथियों का हौसला अफजाई के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

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    38. गज़ब का लिखा है शाह भाई......... वाह! वाह!

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    39. वतनपरस्ती के जज़्बे का बेहतरीन नमूना है यह नज़्म, थोडा और मेहनत करें तो लाजवाब बंजाएगी भाईजान

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    40. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

      आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

      आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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    41. सत्य कहा....



      प्रभावशाली ढंग से आपने त्रासद सत्य को रेखांकित kiya है...

      aabhaar इस सुन्दर रचना ke liye !!!

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    42. हो रही मुल्क की दुर्गति,
      सब कह रहे हैं प्रगति।
      है यही अगर प्रर्गति तो
      रो रहे हो आज क्यूँ?
      आज विचारनीय प्रश्न तो यही है। बहुत सटीक ,उमदा अभिव्यक्ति है। शुभकामनायें।

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    43. शाहनवाज भाई, दुबारा कमेंट को अन्‍यथा मत लीजिएगा, सचमुच सुंदर हैं आपके विचार।

      बधाई स्‍वीकारें।

      ---------
      प्रेत साधने वाले।
      रेसट्रेक मेमोरी रखना चाहेंगे क्‍या?

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    44. हम बदलेंगे युग बदलेगा!

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    45. ज्यादा प्रगति का ही तो परिणाम हम लोग भुगत रहे हैं!

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    46. too good..came across your blog by chance and enjoyed reading it....liked this poem...

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    47. आज के परिवेश का सशक्त रचाव है रचना में सवाल भी हैं सबके मन के जो अन -उत्तरित हैं आदिनांक .

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      Replies
      1. शुक्रिया वीरेंदर शर्मा जी...

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    48. उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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