समर्थक' और 'अंध-भक्त' में फर्क

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  • Shah Nawaz
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  • मैं केजरीवाल, शीला दीक्षित, राहुल गांधी, मुलायम, लालू और भाजपा में शिवराज और सुषमा स्वराज जैसे कई नेताओं की अनेकों बातों को पसंद करता हूँ, मगर इसका मतलब यह कैसे हो सकता है कि इनकी गलत बातों को गलत ना लिखू? बस यही फर्क 'समर्थक' और 'अंध-भक्त' में भी है!


    अगर अपने पसंदीदा राजनेता के खिलाफ भी कोई तथ्य पता चलता है तो उसपर विचार करना आवश्यक है...  और सही निकलने पर भी तथ्य के समर्थन की जगह 'अपनी पसंद' की बिना पर विरोध करना ही तो अंध-भक्ति कहलाता है.

    सबको हक़ है जिसकी बातें अच्छी लगती हो उसे खुलकर पसंद करें… उसकी अच्छाइयों का खूब समर्थन करें। लेकिन यह भी याद रखना आवश्यक है कि हम किसी की अच्छाइयों पर लिखे या ना लिखें मगर किसी की भी गलत बातों का समर्थन हरगिज़-हरगिज़ ना करें और ना ही उन्हें नज़रअंदाज़ करें। 

    हम एक सामाजिक प्राणी हैं, यह समाज हमें बहुत कुछ देता है, इसलिए समाज के प्रति हमारा भी उत्तरदायित्व बनता है। यह हमारा फ़र्ज़ है कि अच्छी-बुरी बातों से समाज को अवगत कराया जाए, मगर इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि हम जो भी कहें या लिखें वोह हवा-हवाई ना हो, बल्कि तथ्यों पर आधारित हो।





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    1 comment:

    1. पारदर्शिता ही सत्य की प्रतिष्ठा है।

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