अक्लमंद और कमअक्ल के 'वोट' का वज़न बराबर क्यों?

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  • Shah Nawaz
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  • मैं भारतीय लोकतंत्र को शासन व्यवस्था में सबसे बेहतरीन समझता हूँ, मगर इसमें भी बहुत सी कमियाँ हैं। जैसे कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव में अक्लमंद और कमअक्ल के 'वोट' का वज़न (Value / weightage) बराबर होता है, जबकि यह सर्वविदित है कि निर्णय लेने में 'अक्ल का दखल' होता है और इसके कम या ज़्यादा होने का फ़र्क निर्णय के सही होने के स्तर पर पड़ता है।

    चुनाव में मताधिकार का मतलब ऐसे उम्मीदवार के चयन के लिए अपनी राय देना है, जो कि सबसे अच्छी तरह से सम्बंधित क्षेत्र में शासन व्यवस्था संभाल सकता है या / और उससे सम्बंधित दल निकाय / राज्य या देश की शासन व्यवस्था का संचालन कर सकता है। 

    सही उम्मीदवार का चुनाव क्षेत्र / देश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है, ऐसे में किसी उम्मीदवार के लिए दो असमान बुद्धि वाले लोगों की राय का वज़न सामान कैसे हो सकता है?

    हालाँकि किसी की अक्ल को नापने का पैमाना इतना आसान नहीं है, मगर फिर भी कम से कम शिक्षा के आधार पर 'वोट का वज़न' तय किया ही जा सकता है! 

    हालाँकि यह भी सही तर्क है कि अनुभव शिक्षा पर भारी पड़ सकता है और हमारे देश में शिक्षा प्रणाली भी अभी उतनी मज़बूत नहीं है। मगर कमियों के बावजूद शिक्षा को छोड़कर कोई और ऐसा पैमाना नज़र नहीं आता है, जहाँ परीक्षा के द्वारा अक़्ल का पैमाना तय होता हो। 


    आपका क्या ख़याल है?

    18 comments:

    1. आपका कहना कुछ हद तक सही है पर लोकतंत्र में क्या किसी भी आधार पर वोट देने के अधिकार से किसी को वंचित करना उचित होगा? क्या फिर वह लोकतंत्र की जगह कुलीनतंत्र नहीं हो जाएगा?

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      1. कैलाश शर्मा जी मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि किसी को वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए, बस मेरा कहना है कि ज्यादा अक्ल वाले के वोट की ज्यादा वैल्यू और कम-अक्ल की कम वैल्यू होना अधिक व्यवहारिक है।

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    2. अकलवाले प्रभावी भी होते तो देश सुधर जाता।

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      1. बिलकुल सही कहा प्रवीण भाई!

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    3. this is why it is democracy everyone have there opinion and right to raise it

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      1. No doubt on it, everyone may have opinion & definitely everyone has a right to express or raise... but as per my opinion there should be a weightage of voting power, according to there intellectual growth...

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    4. अकल वाले आई आई टी के पढ़े ये केजरीवाल और भारती, मोदी आई आई टी तो क्या इंन्जिनीयर भी नहीं -MA in political Science, युवराज की पढ़ाई को तो वो ही जाने, मनमोहन सिंह इतने बड़े Economics के ज्ञाता,,,क्या तय करता है यह सब?

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    5. आपकी इस प्रस्तुति को आज की राष्ट्रीय मतदाता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन (मेरी 50वीं बुलेटिन) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    6. दो असमान बुद्धि वाले लोगों की राय का वज़न सामान कैसे हो सकता है... सहमत

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    7. आपका कहना सही है

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    8. मित्र लोकतंत्र का अब तक अनुभव यही बताता है कि पढ़ा लिखा होना सिर्फ पैमाना नहीं हो सकता इंदिरा गांधी को पराजय उस समय मिली जब अधिकांश लोग अशिक्षित थे। खेत में हल चलाता किसान औऱ बोझ उठाते मजदूर की शिक्षा जिंदगी होती है..उनका अनुभव कई बार पढ़े लिखे को मात दे देता है। बिल गेट्स जैसे उदारहण हमारे देश में भी हैं..बस वो अमीरी की हद तक नहीं पहुंचे।

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    9. गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभ कामनाएं |
      बहुत सही लिखा है |
      आशा

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    10. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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    11. शहनवाज़ भाई! आपके सवाल पर तो हम बस एक पुराना नारा ही कोट करेंगे -
      जम्हूरियत वह तर्ज़ेहुक़ूमत है जहाम इंसान गिने जाते हैं, तोले नहीं जाते!
      फिर ऐसे में कहाँ का वज़न... न जिस्मानी - न दिमाग़ी!!

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    12. पहले पहल तो ये ख्याल कि वे लोग (१) जो खुद की अक्ल (समझ / बोध ) के इशारे / असेसमेंट / विश्लेषण / विवेचना से वोट देना तय करते होंगे किसी पार्टी को , और दूसरी तरफ वे (२) जो किसी दीगर इंसान के इशारे पर वोट डाल कर आ जाते होंगे , पार्टी चाहे जो भी हो , वजह पैसा / व्यक्तिगत पहचान / जाति / धर्म / कुनबा / समुदाय वगैरह वगैरह !

      कुल मिलाकर जो दो कैटेगरी साफ़ दिखती हैं , उनमें से अपनी अक्ल (समझ / बोध) का इस्तेमाल सिर्फ पहली (१) कैटेगरी करते दिखाई देते हैं जबकि दूसरी (२) कैटेगरी वाले लोग किसी और की अक्ल (समझ / बोध) को परिस्थितिजन्य कारणों से फालो (अनुसरित ) भर करते हैं ! ज़ाहिर है कि इन दोनों मामलों में अक्ल (समझ / बोध) की एक ही कैटेगरी इस्तेमालशुद् है सो दो तरह की अक्ल होती है,वाली बात खुद बखुद बेमानी हुई :)

      अब मुद्दा ये है कि क्या वे लोग 'समान' या 'असमान' अक्लमंद ( समझ / बोध वाले) माने जायेंगे जो कि पहली (१) कैटेगरी में थे ? अगर हां तो क्यों और कैसे ? अपना सवाल ये है कि अक्ल वाले (समझ / बोध वाले) बंदे जिन्हें माना जा रहा है , उनमें से बहुतेरे दक्षिणपंथी , साम्प्रदायिक राजनीति के समर्थक हैं और बहुतेरे वामपंथी , नास्तिक राजनीति के जबकि बाकी लोग मध्यम मार्गी समाजवादी , धर्मनिरपेक्षतावादी माने जा सकते हैं :) अब आप ये कहें कि इन तीनों तरह की राजनीतिक समझ और विचारधारा के हामियों (समर्थकों ) और विश्लेषकों में सबसे ज्यादा अक्लमंद कौन है ? :) अक्लमंद होने का कोई पैमाना / स्केल किस तरह से तय कीजियेगा आप ? इन तीनों तरह के लोगों के वोट का वज़न बराबर होने की भी निंदा (आलोचना) की जा सकती है क्या ? :)

      जबतक, अक्लमंद (समझदार) राजनीति की पहचान के कोई सालिड पैमाने / फूलप्रूफ मानदंड / सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य मापक , आप तय ना कर लें , तब तक आप , पहली (१) कैटेगरी में से , किसी एक को भी , कमअक्ल या अक्लमंद नहीं ठहरा सकते :) मेरे ख्याल से दूसरी (२) कैटेगरी वाले बन्दों की समस्या भी इसी रास्ते से अपने आप सुलझ जायेगी ! कहने का मतलब ये है कि पहले अक्लमंदी तय करिये तब वोट के वज़न की बात करें :)

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    13. आपका कहना सही है..पर बुद्धि के अनुसार वोटिंग कम अक्ल वालो के साथ नाइंसाफी होगी..इससे एक बार फिर से राजवंश के शुरुवात हो सकती है..

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    14. padha likha hona akalmand hone ki gaurantee nahi. main aise kai logo ko janta hu mamuli padhe lihe hai nahi hai par bahut akalmand hai. Aur bahut se padhe likhe bhi hai jinhe padh likh bhi akal nahi ayi. vayavharik (Practical) akalmandi jaroori na ki kitabi.

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    15. padha likha hona akalmand hone ki gaurantee nahi. main aise kai logo ko janta hu mamuli padhe lihe hai ya bilkul nahi hai par bahut akalmand hai. Aur bahut se padhe likhe bhi hai jinhe padh likh bhi akal nahi ayi. vayavharik (Practical) akalmandi jaroori na ki kitabi.

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