मुस्लिम समाज में तलाक़ का प्रावधान

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  • Shah Nawaz
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  • सबसे पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि इस्लाम में विवाह एक कोंट्रेक्ट मैरिज होती है जिसमें क़ाज़ी, वकील तथा 2 गवाहों के सामने कुबूल कर लेने से निकाह हो जाता है तथा विशेष परिस्थितिओं में विवाह को 'तलाक' अथवा 'खुला' के द्वारा विच्छेद किया जा सकता है। मुस्लिम विवाह में गवाह, वकील तथा क़ाज़ी केवल इसलिए होते हैं जिससे कि कोई भी पक्ष विवाह से मुकर ना जाए।

    ठीक इसी तरह जब यह एहसास हो जाए कि अब साथ रहना नामुमकिन है और ज़िन्दगी की गाडी को आगे बढाने के लिए अलग होना ही एकमात्र तरीका बचा है, तब ऐसे हालात के लिए तलाक़ का प्रावधान है।

    तलाक़ का इस्लामिक तरीका यह है कि जब यह अहसास हो कि जीवन की गाडी को साथ-साथ चलाया नहीं जा सकता है, तब क़ाज़ी मामले की जाँच करके दोनों पक्षों को कुछ दिन और साथ गुज़ारने की सलाह दे सकता है अथवा गवाहों के सामने पहली तलाक़ दे दी जाती है, उसके बाद दोनों को 30 दिन (माहवारी की समयसीमा) तक अच्छी तरह से साथ रहने के लिए कहा जाता है। अब अगर उसके बाद भी उन्हें लगता है कि साथ रहना मुश्किल है तो फिर दूसरी बार गवाहों के सामने "तलाक़" कहा जाता है, इस तरह दो "तलाक" हो जाती हैं और फिर से 30 दिन तक साथ रहा जाता है। अगर फिर भी लगता है कि साथ नहीं रहा जा सकता है तब जाकर तीसरी बार तलाक़ दी जाती है और इस तरह तलाक़ मुक़म्मल होती है।

    इसमें सुन्नी मुस्लिम समाज का 'हनफी', 'शाफ़ई' तथा 'मालिकी' मसलक में एक ही समय में "तीन तलाक़" को भी सही माना जाता हैं, हालाँकि वह भी इस तरीके को अच्छा तरीका नहीं मानते। अन्य मुस्लिम उलेमा एक समय में तीन तलाक़ दिए जाने को "तलाक़" नहीं मानते हैं और कई मुस्लिम देशों में इस तरह से तलाक देने पर व्यक्ति के विरुद्ध सज़ा का प्रावधान है।



    महिलाओं को तलाक़ का हक

    यह कहना गलत है कि महिलाओं को तलाक़ का हक नहीं है, बल्कि उनको तुरंत तलाक़ का हक है। अगर किसी महिला का पति शराबी, जुआरी, नामर्द, मार-पीट करने वाला, बुरी आदतों या स्वाभाव वाला या किसी ऐसी सामाजिक बुराई में लिप्त है जो कि समाज में लज्जा का कारण हो तो उसे सम्बन्ध विच्छेद का हक है। इसके लिए उसे भी क़ाज़ी के पास जाना होता है। इसके साथ-साथ ऐसी स्थिति में उसको 30-30 दिन तक इंतज़ार करने की भी आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि महिला के आरोप सही पाए जाने की स्थिति में फ़ौरन विवाह विच्छेद का अधिकार मिल जाता है, जिसको 'खुला' कहा जाता है।

    इस विषय में कुछ लोगो का यह कहना है कि जब विवाह पति-पत्नी की मर्ज़ी से होता है तो तलाक़ किसी एक की मर्ज़ी से कैसे हो सकता है। मेरे विचार से ऐसा कहना व्यवहारिक नहीं है, सम्बन्ध हमेशा दो लोगो की मर्ज़ी से ही बनते हैं परन्तु किसी एक की भी मर्ज़ी ना होने से सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। ज़रा सोचिये अगर किसी महिला का पति उस पर ज्यादतियां करता है, यातनाएं देता है और तलाक़ देने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है तो क्या ऐसे में बिना उसकी मर्जी के तलाक़ के प्रावधान का ना होना जायज़ कहलाया जा सकता है?

    एक पुरुष और महिला के दिलों का मिलना और साथ-साथ सामाजिक बंधन में बंध कर रहना विवाह है तो रिश्तों में तनाव या अन्य किसी कारण से साथ-साथ ना रह पाने की स्थिति का नाम 'तलाक़' है।



    [इस लेख की अगली कड़ी "हलाला" के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें]

    क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?






    keyword: talaq, talak, talaaq, talaak, divorce in muslims

    35 comments:

    1. आपने मुस्लिम समाज में तलाक से सम्बंधित कई गलतफहमियों को दूर किया है . महिलाओं को भी तलाक का हक़ है , यह पहली बार जाना .
      सुन्दर , सार्थक , उपयोगी लेख . बधाई .

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      1. डॉ. दराल साहब यह तो अभी तक मुस्लिम महिलाएं भी पूरी तरह नहीं जान पाई हैं...

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    2. आपने तो काफ़ी गलतफ़हमियाँ दूर की हैं और इस तरह की चेतना जागृत करते रहना चाहिये …………एक बेहतरीन पोस्ट्।

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      1. वंदना जी, मैं हमेशा अपनी अक्ल के एतबार से इसके लिए कोशिश करता हूँ... आगे भी करता रहूँगा...

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    3. great post and truly informative without being comparitive between two religions
      divorce is a process to end a marriage and it can be mutual if 2 agree to separate but mostly its difficult
      also divorce is always a better option then to stagnate in a wrong marriage and its very common abroad and slowly its coming to india

      indians whether muslim or hindu always believe in affairs that also in hiddence they take marriage as social protection
      not just man but many married woman also have affairs and flings some even hook young boys if they are in a marriage that is not working some do it for fun

      infedility is very common in indian society but its always hidden behind a so called successful marriage !!!

      no religion supports divorce but no religion also permits infedility and voilence

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    4. बढ़िया जानकारी दी है आपने बहुत से संशय दूर हुए....आभार

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      1. यह मेरे लिए खुशी की बात है पल्लवी जी की आपके संशय दूर हुए हैं...

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    5. jankari bhari post.ise muslim samaj ke logon ko zaroor padhvayen taki unhe samajh aa sake.

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    6. I was not aware that divorce is so systematic in Islam. I think all the provisions are very mature and balanced. Thanks for sharing.

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    7. मुस्लिम विवाह और तलाक पर सही जानकारियाँ स्त्रियों तक पहुँचाना बहुत आवश्यक है। वे इसे ले कर बहुत संशय में रहती हैं और जिन मौलवियों व वकीलों तक उन की पहुँच होती है उन पर पुरुषवाद बहुत हावी है वे उन्हें सदैव गलत जानाकारियाँ देते हैं।

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      1. स्त्रियों में शिक्षा के स्तर को बढ़ाकर ही इस समस्या को हल किया जा सकता है... वैसे आज के इन्टरनेट युग में बेवक़ूफ़ बनाना किसी के लिए भी आसान नहीं है...

        वैसे बात गलत जानकारी की भी नहीं है, बात विचारधारा की है. शरियत कानूनों में अमूमन ४ विचारधाराएं हैं, बस फर्क यही होता है कि कौन किस विचारधारा को फोलो कर रहा है...

        चारों विचारधाराएं सही मानी जाती हैं और कोई भी किसी भी विचारधारा को फोलो कर सकता है... इसमें भी किसी को कोई बंदिश नहीं है... हनफ़ी विचारधारा के नज़दीक एक समय में तीन तलाक़ हो जाती हैं बाकी तीनो विचारधाराओं के नज़दीक नहीं होती...

        हालांकि हनफी मज़हब में एक समय में तीन तलाकों को अच्छा तरीका नहीं माना जाता.

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      2. मैं ने अदा जी का आलेख अब पढ़ा है। उन्हों ने जो सवाल उस पोस्ट में खड़े किए हैं वे अब भी लाजवाब हैं। हालांकि उनका उत्तर दिया जा सकता है।

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      3. जो सवाल मुझे समझ में आये, मैंने उनके उत्तर देने की पूरी कोशिश की है... अगर कुछ रह गया है तो कृपया संज्ञान में लाएं.

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    8. तलाक़ के लिए पहल करने वाला पक्ष भी तलाक़ लेने के तत्काल बाद भले सुक़ून महसूस करे,मगर ज़िंदगी के किसी मोड़ पर उसे भी अपने फ़ैसले पर पछतावा होता है। ज़रूरत इस बात की है कि जीवन को क़ानून के नज़रिए से नहीं,जीने के नज़रिए से जिया जाय ताक़ि क़ानूनी स्थितियां अपने-आप बेमानी हो जाएं!

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      1. आपकी बात सही है, लेकिन तलाक़ के कानून सख्त ही होने चाहिए, वर्ना मर्द तलाक़ को खिलौना और औरतों की जिंदगी को हराम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.... और जो मर्द तलाक़ जैसी घिनौनी हरकत के बारे में सोचता भी है, ऐसे मर्द की पत्नी को तो खुद जल्द से जल्द उससे छुटकारा ले लेना चाहिए.

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    9. शाहनवाज़ जी,जहाँ तक मेरी जानकारी हैं 'खुला' के तहत कोई महिला तलाक लेने के लिए कह तो सकती हैं लेकिन इसमें भी पुरुष की सहमति जरूरी होती हैं अन्यथा तलाक नहीं हो पाता.अतः महिलाओं को इस अधिकार का कोई मतलब ही नहीं हैं जबकि पति को पत्नी की अनुमति की जरूरत नहीं होती.क्या ये सही हैं?
      और आपने अदा जी के हलाला पर सवाल का जवाब तो दिया नहीं.यदि महिला एक बार तलाक लेने के बाद फिर कभी उस ही व्यक्ति से शादी करना चाहें तो क्या उसे पहले किसी और पुरुष के साथ शादी कर हमबिस्तर होना पडता है?और क्या यदि वो महिला ऐसा नहीं करेगी तो उसका पुनर्विवाह पहले वाले पुरुष से नहीं हो सकता?

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      1. राजन भाई, खुला के लिए पति की सहमति की कोई आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि जैसा मैंने ऊपर बताया, पत्नी अपनी बात लेकर क़ाज़ी के पास जाती है और क़ाज़ी सच्चाई की जाँच करके पत्नी को खुला के तहत तलाक़ दिलवाता देता है.

        अगर इसमें भी पति की मर्ज़ी की ज़रूरत हुई तो चाहे कोई पति कितना भी शराबी, या और कोई ऐबदार कभी भी पत्नी को तलाक़ नहीं देगा....

        और उपरोक्त बात मेरी नहीं है, बल्कि दिल्ली के 'मुफ्ती अहमद' साहब से राय मशविरा करके लिखी गयी है.

        हलाला के बारे में मैंने ऊपर बताया है, अगर एक बार तलाक़ हो जाए तो दुबारा शादी करना तक़रीबन नामुमकिन बात है... जो मर्द तलाक़ देना तो दूर इस जैसी घिनौनी हरकत के बारे में सोचता भी है, ऐसे खुदगर्ज़ व्यक्ति के साथ रहने के बारे में किसी पत्नी को सोचना भी अपने ऊपर ज़ुल्म जैसा है...

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      2. राजन
        इस्लाम धर्म कहता हैं तलाक एक गुनाह हैं इस लिये अगर क़ोई तलाक ले लेता हैं तो दुबारा शादी नहीं कर सकता हैं बिना पहले किसी और से शादी किये और हम बिस्तर हुए . अगर इसको सही तरह समझा जाये तो ये एक प्रकार की सजा हैं की आप ने तलाक दे कर जो गुनाह किया हैं उसकी सजा हैं की पहले आप दूसरे से शादी करे और फिर शादी मै शारीरिक सम्बन्ध बनाए और कुछ समय उसको पूरी तरह निबाहे फिर पुनः तलाक ले और शादी करे .
        शायाद ये एक ऐसी मानसिक यातना हैं किसी पति के लिये की उसकी पत्नी किसी और के साथ हम बिस्तर हो कर वापस आई हैं और वही पत्नी के पास एक सोचने का मौका हैं की क्या उसका दूसरा पति पहले से बेहतर हैं या नहीं

        मुद्दा ये उतना अहम् नहीं हैं असली मुद्दा हैं की इस्लाम धर्म में औरत को कानून से अपने अधिकार नहीं मिले हैं यानी अगर वो देश के कानून के हिसाब से चलना चाहे तो वो संभव नहीं हैं उसे इस्लाम धर्म के हिसाब से चलना होगा .
        इस लिये वो बराबर के हक़ की बात नहीं कर सकती हैं वो ये नहीं कह सकती हैं की मुझे हलाला मंजूर नहीं हैं . पर ध्यान देने की बात हैं की इस्लाम धर्म में पुरुष भी किसी भी इस्लामिक बात से इनकार कर नहीं सकता हैं
        समस्या ये नहीं हैं की स्त्री की मर्ज़ी क्या हैं समस्या ये हैं धर्म चाहे वो क़ोई भी हो स्त्री को दोयम मानता हैं और देश का कानून उसको बराबर मानता हैं

        बहुत मुस्लिम महिला आज कल इसी संघर्ष में हैं की वो देश और संविधान के नीचे आये और उनको बराबरी का अधिकार हो

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    10. मेरे सवाल को अभी तक जवाब नहीं मिला है...
      'हलाला' शरीयत में एक विकृत 'क़ानून' है...
      ये कह देने भर से कि एक बार तलाक़ हो जाए तो पुर्विवाह नामुमकिन है...सवाल का जवाब नहीं है...
      अगर ये नामुमकिन होता तो फिर, ये हलाला क्यूँ..?
      उसी नामुमकिन को मुमकिन बनाने के लिए यह घटिया तरीका इख्तियार किया गया है...जिसमें एक निर्दोष को इस गन्दगी से गुज़रना पड़ता है...
      और अगर ये सज़ा है, तो फिर ये सज़ा औरत को क्यूँ ?
      दुनिया का कोई पुरुष, औरत के उस दोज़ख से गुजरने के अहसास को, चाह कर भी नहीं समझ सकता...जिसकी शुरुआत rejection से होती है और समाप्ति बलात्कार से...

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    11. @ रचना

      इस्लाम धर्म में औरत को कानून से अपने अधिकार नहीं मिले हैं यानी अगर वो देश के कानून के हिसाब से चलना चाहे तो वो संभव नहीं हैं उसे इस्लाम धर्म के हिसाब से चलना होगा.

      रचना जी,

      भारत में सभी महिलाएं हो अथवा पुरुष, सभी भारतीय कानून के हिसाब से ही चलते है.

      शादी अगर किसी धार्मिक तरीके से हुई है तो उस शादी / तलाक़ का सम्बन्ध कानून से नहीं अपितु धर्म से होता है. इस पर भी कोई भी व्यक्ति धर्म को ना मानने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन अगर उसकी आस्था किसी धर्म में है तो यह एक आसानी से समझ में आने वाली बात है कि वह धार्मिक कार्यों को उस धर्म के तरीकों से ही अंजाम देगा.

      अगर कोई अपने आप को मुस्लिम मानता है तो वह मुस्लिम तरीके से ही शादी / तलाक़ / ईश वंदना इत्यादि करेगा. दो में से एक ही बात हो सकती है कि या तो वह धर्म सम्मत कार्य करेगा अथवा धर्म विरुद्ध.



      इस लिये वो बराबर के हक़ की बात नहीं कर सकती हैं वो ये नहीं कह सकती हैं की मुझे हलाला मंजूर नहीं हैं.

      पहली बात तो मैंने आपको यह पहले ही बताई है कि हल्ला कोई इस्लामिक रीती नहीं है, बल्कि कुछ खुदगर्ज़ लोग इसे अपने फायदे के लिए प्रयोग करते हैं. दूसरी और सबसे अहम् बात यह कि कोई भी किसी भी महिला अथवा पुरुष को पहली अथवा दूसरी शादी के लिए ज़बरदस्ती कर ही नहीं सकता है. और हमेशा यही होता है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक़ दे देता है तो वह अपनी पूर्व पत्नी को दूसरी शादी करने अथवा अगर पूर्व पत्नी अपनी मर्ज़ी से दूसरी शादी करती है तो तलाक के लिए ज़बरदस्ती कर ही नहीं सकता है. वैसे भी दूसरी शादी होने के बाद तलाक़ फिर से पति की मर्ज़ी से ही ली जा सकती है अथवा पत्नी के किसी सही कारण के होने पर क़ाज़ी के सम्मुख उपस्थित होने की बाद ही ली जा सकती है.




      समस्या ये नहीं हैं की स्त्री की मर्ज़ी क्या हैं समस्या ये हैं धर्म चाहे वो क़ोई भी हो स्त्री को दोयम मानता हैं और देश का कानून उसको बराबर मानता हैं

      इस्लाम धर्म महिलाओं को दोयम दर्जे का बिलकुल भी नहीं मानता है, हाँ कुछ तथाकथित धार्मिक ठेकेदारों ने अवश्य ही उन्हें दोयम दर्जे पर पहुचाया हुआ है और यह महिलाओं में शिक्षा और अपने अधिकारों के प्रति सजगता से समाप्त हो सकता है.

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    12. मेरे सवाल को अभी तक जवाब नहीं मिला है...
      'हलाला' शरीयत में एक विकृत 'क़ानून' है...
      ये कह देने भर से कि एक बार तलाक़ हो जाए तो पुर्विवाह नामुमकिन है...सवाल का जवाब नहीं है...
      अगर ये नामुमकिन होता तो फिर, ये हलाला क्यूँ..?
      उसी नामुमकिन को मुमकिन बनाने के लिए यह घटिया तरीका इख्तियार किया गया है...जिसमें एक निर्दोष को इस गन्दगी से गुज़रना पड़ता है...
      और अगर ये सज़ा है, तो फिर ये सज़ा औरत को क्यूँ ?
      दुनिया का कोई पुरुष, औरत के उस दोज़ख से गुजरने के अहसास को, चाह कर भी नहीं समझ सकता...जिसकी शुरुआत rejection से होती है और समाप्ति बलात्कार से...



      अदा जी, मैंने आपको पहले भी बताया है की हलाला कोई शरियत का कानून नहीं है और कृपया शरियत कानून को विकृत की संधि देने की कोशिश बिलकुल भी ना करें, इसे आप अगर धमकी भी समझना चाहें तो समझ सकती हैं.

      मैंने ऊपर बहुत ही आसान शब्दों में समझाया की इस्लाम के अनुसार तलाक़ क्या होती है और एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है. हाँ अगर (खुदा ना करे) किसी महिला की या उसके पति की उससे नहीं बनती और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है. तो ऐसी अवस्था में वह महिला चाहे तो फिर से पहले पति से शादी कर सकती है. और अगर कोई जानबूझकर इस प्रक्रिया को दूबारा शादी के लिए इस्तेमाल करता है तो यह शादी वैध नहीं होती है और इस्लामिक कानून के मुताबिक उन्हें बहुत ही सख्त सज़ा का प्रावधान है. आप रेफरेंस के लिए यह लिंक देख सकती हैं.

      http://www.islamawareness.net/Talaq/talaq_fatwa0008.html

      इस्लामिक विवाह की रीती में किसी भी स्थिति में बिना किसी महिला / पुरुष की मर्ज़ी के शादी नहीं हो सकती है. अगर किसी महिला / पुरुष से ज़बरदस्ती हाँ कहलवाई जाती है और हस्ताक्षर करवाए जाते हैं, इस सूरत में भी विवाह नहीं होता है. हर सूरत में मर्ज़ी ज़रूरी है.

      मैंने ऊपर जो लिखा पूरी ज़िम्मेदारी के साथ लिखा है और मुझे लगता है इसे पढ़कर आपको समझ में आ जाना चाहिए की हलाला की इस्लाम में रत्ती भर भी जगह नहीं है.

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    13. मैंने नामुमकिन इसलिए कहा था क्योंकि किसी भी महिला की मर्ज़ी के बिना पहली या दूसरी शादी हो ही नहीं सकती है और कोई भी महिला ऐसी घिनौनी हरकत को जानबूझकर क़ुबूल नहीं करेगी. और अगर उस महिला या पुरुष का इस्लाम धर्म में विशवास है तो वह बिलकुल भी ऐसा नहीं करेंगे.

      और अगर विशवास ही नहीं है तो उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत ही नहीं है वह भारतीय कानून के मुताबिक कोर्ट में शादी कर सकते हैं.

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    14. शाहनवाज जी, आप इस लिंक पर जाकर देख सकते हैँ जो बात मैंने कल कही थी वही यहाँ भी कही गई हैं.और खबर पढें तो केवल देवबंद का ये निर्णय नहीं हैं बल्कि कई इस्लामिक विद्वानों ने भी इस पर सहमति जताई हैं कि इस्लाम में तलाक का अधिकार सिर्फ मर्दों को है और खुला के तहत महिला केवल अलग होने की इच्छा जाहिर कर सकती हैं,इसमें बहुत कुछ काजी की मर्जी पर निर्भर करता हैं.कमाल हैं,इस्लाम का नाम पर जो कुछ किया जा रहा हैं उस पर कोई कुछ नहीं कहता जबकि असल में इस्लाम में यदि महिलाओं पूरे अधिकार है तो ऐसे एकतरफा महिला विरोधी फैसले लेकर इस्लाम का नाम तो ये ही लोग खराब कर रहे हैं न कि सवाल पूछने वाले.

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    15. रचना जी,यहाँ थोडा विषयांतर जरूर हैं पर आपसे सहमत हूँ.देखा जाए तो शुरुआत में कोई भी धर्म महिला विरोधी नहीं रहा होगा.इस्लाम में भी महिलाओं को समान अधिकार दिए गये है.लेकिन धर्म के व्याख्याकारों ने इसमें कही बातों को अपने हिसाब से तोडना मरोडना शुरु कर दिया.शाहनवाज़ जी कहना चाहते हैं कि इसे इस्लाम में विकृति न माना जाए.चलिये ठीक है लेकिन जब इस्लाम के नाम पर महिलाओं के साथ ये अन्याय होता हैं तो मुस्लिम समाज चुप क्यों रहता है.जावेद अख्तर,शबाना आज़मी या शीबा असलम फहमी जैसे चेहरे अपवाद हैं लेकिन बाकि मुस्लिम क्यों नहीं विरोध करते जबकि दूसरे कई मामलों में उन्हें बडी जल्दी इस्लाम को बदनाम किया जाना नज़र आ जाता है.

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    16. @ राजन
      शाहनवाज जी, आप इस लिंक पर जाकर देख सकते हैँ जो बात मैंने कल कही थी वही यहाँ भी कही गई हैं.और खबर पढें तो केवल देवबंद का ये निर्णय नहीं हैं बल्कि कई इस्लामिक विद्वानों ने भी इस पर सहमति जताई हैं कि इस्लाम में तलाक का अधिकार सिर्फ मर्दों को है और खुला के तहत महिला केवल अलग होने की इच्छा जाहिर कर सकती हैं,इसमें बहुत कुछ काजी की मर्जी पर निर्भर करता हैं.


      राजन जी,

      आपकी बात बिलकुल ठीक है, कि महिला को खुला के लिए अपना केस क़ाज़ी के पास ले जाना होता है और तलाक़ लेने के लिए वैलिड रीज़न बताना होता है और बिना उचित कारण (जिसमें से कुछ का ज़िक्र मैंने ऊपर अपनी पोस्ट में किया है) के तलाक़ नहीं मिलती है. लेकिन कारण उचित होने पर कोई क़ाज़ी अपनी मर्ज़ी नहीं चला सकता है.

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    17. @ राजन
      जब इस्लाम के नाम पर महिलाओं के साथ ये अन्याय होता हैं तो मुस्लिम समाज चुप क्यों रहता है.

      अन्याय के साथ मुस्लिम समाज कभी खड़ा नहीं रहता है, बहुत सारे लोग / संस्थाएं लोगो को शिक्षित करने में लगे हुए हैं... बिना सही जानकारी के पूरी तरह सुधार का आना नामुमकिन है. वैसे भी महिलाओं के साथ अन्याय धर्म के नाम पर होते बल्कि सामाजिक कुरीतियों के नाम पर होते हैं. धार्मिक उसूलों की रक्षा करने के लिए बहुत से संस्थान देश में मौजूद हैं और बेहतरीन कार्य कर रहे हैं.

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    18. यहाँ मैं महिलाओं द्वारा लिए जाने वाले खुला को तलाक़ इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आम तौर पर तलाक़ को पति-पत्नी के अलग होने का जरिया माना जाता है. जबकि इस्लाम धर्म में महिलाओं द्वारा अपने पति से अलग होने के अधिकार के लिए 'खुला' शब्द है.

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    19. बढ़िया जानकारी दी शाहनवाज भाई , आभार आपका !

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    20. "हनफी" मसलक में एक ही समय में "तीन तलाक़" ???
      ये किया है जनाब?
      हनफी, मालिकी, शाफ़ी और हम्बली सभी के यहाँ इस मस'ले पर कोई इख्तेलाफ नहीं है.....मतलब इस मुद्दे पर सभी एक हैं....सिवाये "अहलूज़ ज़ाहिर" के और मौजूदा ज़माने का फिरक़ा अहले हदीस के जो मुख़्तः इमाम दाऊद-ज़ाहिरी के मसले के अनूसार ही अपनी फिक़ह को तरतीब देते हैं//

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      1. आप सही कह रहे हैं, पर इमाम तैय्यिमाह के अनुसार इमाम अहमद बिन हंबल का इस विषय पर इख़्तेलाफ़ है, उन्होंने अपनी बाद की रिसर्च में इसे क़ुरआन और सुन्नत के खिलाफ बताया था!

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    21. Talaq k baad aurat ko gujara bhatta kitne Dino tak milta h

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    22. Muslim samaj me mahilayo k sath bahut nainshafi ho raha hai Muslim samaj me sabse jyada talaq ke mamle dikhte h mulla sirf apne liye kannon banaye h aurto k liye nii Muslim samaj me parivartan lana chahiye jisse mahilayo ko bhi nyay aur unka
      huq mil sake

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