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सीने की बुझी राख में अंगारों की दमक बाकी है

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  • by
  • Shah Nawaz
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  • सीने की बुझी राख में अंगारों की दमक बाकी है
    हौसले पस्त क्यों हों, जोशीली खनक बाकी है


    नादां ना कर गुमां, कि बूढ़ा हो चला है शेर
    वोह बाजुओं का ज़ोर और दांतों की चमक बाकी है


    मुझको इस सफ़र का थका हुआ रहबर न समझना
    बस हम-कदम रहो, अगर चलने की सनक बाकी है



    16 comments:

    1. मुझको इस सफ़र का थका हुआ रहबर न समझना
      बस हम-कदम रहो, अगर चलने की सनक बाकी है
      कुछ अलग हटके पढने को मिला आपके ब्लॉग पर .अभिनव विषय और प्रस्तुति के लिए , आभार आपका .वो कहते हैं न की सब्र का फल मीठा होता है तो भाई साहब सुबह से कोशिश में थे ये 'प्रेम रस .कोम' साहब खुल जाएँ आखिर हीरा हाथ लग ही गया .बढ़िया ग़ज़ल पढनेको मिली क्या मतला क्या मक्ता और क्या विषय वस्तु .तारीफ़ करूं क्या इसकी जिसने इसे सजाया -

      कृपया यहाँ भी पधारें
      सोमवार, 30 अप्रैल 2012

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      1. हौसला अफजाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया वीरू भाई जी.....

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    2. Replies
      1. बस आपकी पोस्ट देखकर यूँ ही खामखा लिख डाली :-)

        कभी फुर्सत मिली तो ठीक करके पूरी लिखूंगा....

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    3. Replies
      1. शुक्रिया मनोहर जी.

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    4. बस हम-कदम रहो, अगर चलने की सनक बाकी है
      बहुत खूब

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      1. जी... बहुत-बहुत शुक्रिया वर्मा जी...

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    5. सनक हर जगह हावी है.

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      1. मेरे ब्लॉग पर आपका खैर-मकदम है बादल मेरठी जी....

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    6. यह तो सनक बनी रहेगी,
      सिक्कों में खनक बनी रहेगी,
      चलीं कुछ राहें भटकन में सही,
      समय से तो रार ठनी रहेगी।

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      1. अरे वाह प्रवीण भाई!!!!!

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    7. और कुछ न कहते हुए बस एक ही शब्द दिमाग में आरहा है वाह!!! बहुत खूब लिखा है आपने उम्दा पोस्ट

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      1. हौसला अफज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया पल्लवी जी...

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    8. बहुत बढ़िया.... अच्छे लगे शेर ....

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    9. Very beautiful...First two lines are too good...

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