वो जिसकी याद में कटती है ज़िन्दगी अपनी
उसी के साथ में शामिल है हर खुशी अपनी
वो लिखना चाहें तो लिक्खे तेरी अदाओं पे
जहाँ के दर्द में डूबी है शायरी अपनी
नया है दौर ये ज़ालिम बड़ा ज़माना है
ज़रा जतन से छुपाना तू मुफलिसी अपनी
मिरे कदम से मिलाया है हर कदम उसने
हर इक सफर में हुई है यूँ रहबरी अपनी
- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (30-07-2022) को "काव्य का आधारभूत नियम छन्द" (चर्चा अंक--4506) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आदरणीय शहनावाज जी, नमस्ते 🙏❗️
ReplyDeleteबहुत अच्छी गज़ल! एक एक शेर उम्दा!
साधुवाद!
कृपया इस लिन्क पर मेरी रचना मेरी आवाज में सुनें, चैनल को सब्सक्राइब करें, कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य दें! सादर!
https://youtu.be/PkgIw7YRzyw
ब्रजेन्द्र नाथ