मेरा वजूद बदलता दिखाई देता है

उधर से चिलमन सरकता दिखाई देता है
इधर नशेमन फिसलता दिखाई देता है

तुझे पता क्या तेरे फैसले की कीमत है
मेरा वजूद बदलता दिखाई देता है

उमड़-उमड़ के जो आते हैं मेघ आँगन में
फटा सा आँचल तरसता दिखाई देता है

कई रातों से भूखा सो रहा था जो बच्चा
आज फिर माँ से उलझता दिखाई देता है

झूठे वादों की लोरियों से परेशां है जो
वही हाकिम से झगड़ता दिखाई देता है

अरे पैसों के गुलामों कभी तो यह देखो
क़ैद में पंछी तड़पता दिखाई देता है

- शाहनवाज़ 'साहिल'

21 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9-6-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2368 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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    1. शुक्रिया दिलबाग भाई!

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  2. अरे पैसों के गुलामों कभी तो यह देखो
    क़ैद में पंछी तड़पता दिखाई देता है...वेहतरीन शेर। बहुत खूब।

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    1. शुक्रिया मनीष जी...

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  3. अरे पैसों के गुलामों कभी तो यह देखो
    क़ैद में पंछी तड़पता दिखाई देता है...वेहतरीन शेर। बहुत खूब।

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  4. अरे पैसों के गुलामों कभी तो यह देखो
    क़ैद में पंछी तड़पता दिखाई देता है...वेहतरीन शेर। बहुत खूब।

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    1. शुक्रिया कविता जी

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  6. बहुत खूब , मंगलकामनाएं आपको.....

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    1. शुक्रिया सतीश भाई :)

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  7. बहुत ही बेहतरीन किस्‍म की गज़ल की प्रस्‍तुति। मुझे बहुत पसंद आई।

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    1. हौसला अफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया जमशेद आज़मी जी...

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  8. बहुत दिनों बाद आना हुआ ब्लॉग पर प्रणाम स्वीकार करें

    वक़्त मिले तो हमारे ब्लॉग पर भी आयें|
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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  9. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 16 जून 2016 को में शामिल किया गया है।

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  10. बेहद रोचक एवं दिलचस्प लेख......आपने इस लेख के माध्यम से मेरे मन में एक विचार उत्पन्न कर दिया.....अप्रतिम व आपको बधाई....ऐसी ही एक रचना बदलाव जिंदगी का आप शब्दनगरी के माध्यम से पढ़ व लिख सकतें हैं.....

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  11. अरे यार....मैं रास्ता कैसे भूल गया था। कितना एक बार ही में पढ़ूं। अभी नहीं पढ़ूंगा...बेहतर है सुनना...मैं..तुम...और हमारे बैचेन शब्द...
    अरे वाह ये तो शीर्षक बन गया..इसी पर क्यों न हो जाए ब्लॉग मीट.....कोई जगह सुझाओ कनॉट के आसपास...चाहें 2 हों या 4
    आगामी शनिवार

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    1. कर लीजिये अरेंज रोहित भाई,हम तैयार हैं!

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  12. माँ और बेटे की ऐसी तस्वीर जो विचलित कर देती है - सजीव चित्रण

    -Neeraj

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