ग़ज़ल: जो राहे ख़ुदा का निगहबान होगा

जो राहे ख़ुदा का निगहबान होगा
जहाँ में वही तो मुसलमान होगा

समंदर की लहरे थमी थी जहाँ पर
वहीँ से शुरू फिर से तूफ़ान होगा

हर इक का जो दर्द समेटे हुए हो
नहीं वोह कभी भी परेशान होगा

किया ज़िन्दगी को जो रब के हवाले
हर इक सांस फिर उसका मेहमान होगा

जो दीदार को उसके तड़पेगा 'साहिल'
वही उसके आँगन का मेहमान होगा

- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'



शमीम अंसारी भाई ने मेरी इस ग़ज़ल को बहुत ही बेहतरीन अंदाज़ में अपनी आवाज़ दी है, आप भी सुनिए!


जो राहे ख़ुदा का निगहबान होगाजहाँ में वही तो मुसलमान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘समंदर की लहरे थमी थी जहाँ परवहीँ से शुरू फिर से तूफ़ान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘हर इक का जो दर्द समेटे हुए होनहीं वो कभी भी परेशान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘किया ज़िन्दगी को जो रब के हवालेहर इक सांस फिर उसका मेहमान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘जो दीदार को उसके तड़पेगा 'साहिल'वही उसके आँगन का मेहमान होगा󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘लेखक ----- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘󾬘आवाज़ ----- शमीम अंसारी
Posted by Mohammad Shamim Ansari on Thursday, January 21, 2016


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