ग़ज़ल: "अँधेरी रात है खुद का भी साया साथ नहीं"


अँधेरी रात है खुद का भी साया साथ नहीं
कोई अपना ना हो, ऐसी भी कोई बात नहीं

साथ है जो, वोह ज़रूरी तो नहीं साथ ही हो
बात ऐसी भी नहीं, मिलते हो जज़्बात नहीं

कैफियत रात की कुछ ऐसी हुई जाती है
पास लेटा है जो, उससे ही मुलाक़ात नहीं

रिश्ता नयनों का हुआ बारिशों के साथ ऐसा
बादलों को ही यह पहचानती बरसात नहीं

टूटकर चाहा मगर चाहने का हासिल क्या
उसकी नज़रों में जो यह चाहतें सौगात नहीं

अपनी हस्ती को फ़ना कर दिया जिसकी धुन में
उसकी नज़रों में लड़कपन है यह सादात* नहीं

- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'

*सदात = बुज़ुर्गी, गंभीरता



यह ग़ज़ल मैंने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखी थी...




11 comments:

  1. एक रचना को बताने में बहुत समय चला जाता होगा ट्विटर में..

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    1. ट्विटर पर तो लिखना बहुत ही आसान है... हाँ यह अलग बात है कि मेरे मोबाइल से हिंदी में टाइपिंग नहीं हो पाती है...

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  2. गहन अभिव्यक्ति ....!
    शुभकामनायें ...!

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    1. धन्यवाद अनुपमा जी.

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  3. Bahut sundar. Your expression is flawless here:)

    www.sarusinghal.com

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  4. वाह शाहनवाज़ भाई गज़ल खूब कही है...

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  5. क्या कहने.... ये 'सादत का मतलब बता दीजिए.. वो शेर समझ नहीं आया.
    ट्विटर का एप्लीकेशन फेसबुक से बहत बेहतर है पर दोस्त लोग कम हैं उस पर इसलिए... और फोन में हिन्दी न होने से तो इतना परेशां हूँ कि पूछिए मात...

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  6. भाई गज़ल खूब कही है..

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  7. Ek Achhi Padya Rachna Ka Jikra Aapke Dwara. Is Tarah Ki Rachnayen Badi Hi Rochak Hoti Hai.

    Thank You For Sharing. Padhe प्यार की बात, Hindi Love Story aur Bahut Kuch Online.

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