व्यंग्य: निगम की तर्ज़ पर सफाई

अपने एक मित्र के घर जाना हुआ, घर की साफ-सफाई देखकर दिल खुश हो गया। फोन पर बात करते हुए एक कोने में गया तो देखा परदे के पीछे कूड़ा भरा हुआ था। मतलब मेहमान की आमद पर कूड़े-करकट को छुपाया गया था। देखकर अहसास हुआ कि यह तो हमारे नगर निगम की नकल है! हमारी कॉलोनी में भी तो ठीक इसी तरह सफाई रहती है, लेकिन सड़क पर एक बड़ा सा बदबूदार कूड़ादान बनाया हुआ है। मज़े की बात तो यह है कि कूड़ा कू़ड़ेदान की जगह सड़क पर भरा रहता है। ज़रा सोचिए सड़क को खाली रखने के लिए क्या बेहतरीन योजना बनाई गई है। सड़क गंदी होगी तो लोग सड़क पर से गुज़रेंगे ही नहीं।

वैसे हमारा नगर निगम जीव-जन्तुओं का भी भरपूर ख्याल रखता है। अब अगर कूड़ेदान नहीं होंगे तो मच्छर-मक्खियों का क्या होगा? पता नहीं जानवरों के हक़ में लड़ाई लड़ने वाले संगठन इनके योगदान को कैसे भूल जाते हैं। मेरे विचार से तो नगर निगम को इसके योगदान के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए। अब बरसात के दिनों में अगर यह लोग कूड़ेदान के पास पानी की निकासी का बंदोबस्त कर देते तो बेचारे मच्छर-मक्खियों जैसे जीवों का क्या होता? कितने जीव पैदा होने से रह जाते। कुदरत की जीवन प्रक्रिया में कितना योगदान देते हैं यह लोग। लेकिन अहसान फरामोश जनता इनके अहसान को ज़रा से 'लालच' में अनदेखा कर देती है, अपने जीवन से प्रेम 'लालच' ही तो है! अगर नगर निगम के अधिकारी शहर पर यह अहसान ना करें तो बेचारे मच्छर पैदा ही नहीं हो पाएंगे और अगर मच्छर ही पैदा नहीं होंगे तो डेंगू-मलेरिया जैसी बिमारियां कैसे फैलाएंगे? किसी ने सोचा है कि अगर यह बिमारियां नहीं फैलेंगी तो सरकारी अस्पतालों को काम कैसे मिलेगा? बेचारे डॉक्टर बिना प्रेक्टिस के इलाज करना ही भूल जाएंगे, और उनके साथ-साथ गरीब कर्मचारियों की भी उपर की कमाई जाएगी सो अलग! सबसे बड़ी बात तो यह कि इन बीमारियों से कितने ही गरीब लोग स्वर्ग सिधार जाते हैं। एक तो उन्हें इस नर्क रूपी जीवन से छुटकारा मिल जाता है, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या वृद्धि पर भी रोक लग जाती है। सरकार कितना पैसा खर्च करती है जनसंख्या वृद्धि को रोकने में, परिवार नियोजन और ना जाने क्या-क्या? लेकिन नगर निगम को भूल जाते है! अब उन्हें कौन समझाए कि हमारा नगर निगम कितनी आसानी से हर साल पुरी दक्षता के साथ अपना यह कर्तव्य निभाता है।

उपर से कॉमनवेल्थ खेल होने वाले हैं, अब देखिए बेचारे लगे हुए हैं सफाई करने। आपको मालूम है विदेशी मीडिया कितनी खुश है? कहा जा रहा है कि देखो भारतीय कितने मेहनती है, आखिर समय तक मेहनत कर रहे हैं। अब अगर कर्मचारी पहले से ही सारा कूड़ा साफ कर देते तो यह नाम कैसे होता? पहले मच्छर-मक्खी पैदा किए हैं तभी तो उनको समाप्त करने का कार्य मिला है ना? अब डिर्पाटमेंट का नाम रौशन करना इतना आसान होता है क्या? अब तो आप को विश्वास हुआ कि मेरी नगर निगम को अवार्ड वाली मांग कितनी जायज़ है?

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

(दैनिक हरिभूमि के आज [20 सितम्बर] के संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर मेरा व्यंग्य)

Keyword: Vyangy, Hindi Critics, Nagar Nigam, Muncipal Corporation

19 comments:

  1. bahut badhiya Shehnaj bhai,

    khoob udheda he in logo,

    basie mene picchle dino [adha tha ki australia ke jo chief the CWG ke, wo india ke CWG ke advisor hain, unhone kaha ki "Hindustanion ki adat he har kam late-latifi se karne ki", so ghabrane ki koi bat nhi he, lam to hoga,

    achha vyang
    badhai kabule

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  2. ha ha ha नगर निगम की तुमने बजा डाली

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  3. ... ye hui na kuchh baat ... lage raho ... sundar vyangy !!!

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  4. बहुत ही अच्छा और सच्चा व्यंग्य :-)

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  5. बहुत ही बहतरीन व्यग्य हैँ। नगर निगम की बहुत तारीफेँ की गई हैँ। आभार ! -: VISIT MY BLOG :- ऐ-चाँद बता तू , तेरा हाल क्या हैँ।...........कविता को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिय आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकते हैँ।

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  6. नगर निगम की इतनी सेवाएँ हमने तो कभी सोची ही नहीं थीं!

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  7. ha ha... bht aacha likha hai,sach mai padkar maza aaya....

    en nigam ne hi hum logo ko aisa banaya hai for example:-bacche ya hum log bhi aise hi hai,chatt,balcony,khidki se toffiyo ke rapper,fiake dete hai,sadak par jo khaate hai yuhi daal dete hai...kyu?kyuki wo pehle se hi gande pade hai...agar nigam khud yogdaan de ya sadke ,gali saaf ho toh humhe bhi kooda dalne mai sahram aayegi...ya shayad koi bhi ganda na kare...aur hum sab bhi safai mai apna yogdaan deinge....

    ek viyakti ke aage aane se kuch nahi hoota,pehle nigam ko aage bardna hoga...

    great ,shah nawaaz ji

    bht sahi vyangy kiya hai...

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  8. gr8!

    मिश्रा जी ने तलाक दिया, पांच फेरे काफी न थे !!!-- एक शर्मनाक फैसला ! REMIX story of MISHRA JI.

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  9. सटीक लिखा है एकदम.

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  10. सटीक और जाग्रत नागरिक का कटाक्ष!!
    दीप जलाए रखें

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  11. सरकारी दफ्तर में भी इन्स्पेक्शन के समय इसी प्रकार कचरा छिपा कर सफाई का ढोंग किया जाता है.. व्यंग्य तगड़ा है...लेकिन कुछ लोग गेंडे की खाल ओढकर बैठे होते हैं. असर नहीं होने का!!!

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  12. शाहनवाज़ भाई

    आज तो आपने सचमुच सोचने पर मजबूर कर दिया ,हमें तो मालूम ही ना था की ये मच्छर-माखी इतने काम की चीज़ है :) :)


    बहुत ही उम्दा व्यंग्य और कटाक्ष नगर निगम की पोल खोलते हुए

    महक

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  13. बढ़िया एवं सटीक व्यंग्य ...

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  14. नगर निगम की धो डाली... बहुत ही ग़ज़ब का व्यंग्य

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  15. सच को छुपा दिया परदे के पीछे, लेकिन सच कहीं छुपता है भला ?

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