यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला



यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला
कभी वो खफा रहे, तो कभी हम खफा रहे

रहते थे साथ-साथ मगर आज क्या हुआ
कभी वो जुदा रहे, तो कभी हम जुदा रहे

वादा जो कर लिया था हमने साथ देने का
वो बेवफा रहे, तो हम भी बेवफा रहे

लिखती गई जो नगमा-ओ-अश`आर ज़िन्दगी
वहां वो कलम रहे और हम  फलसफा रहे

हर सिम्त ढूँढती रही ज़िन्दगी वही पल
साकी-ऐ-जाम 
थे वो और हम राजदां रहे

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

23 comments:

  1. अच्छा कहा है...लिखते रहें...
    नीरज

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  2. यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला
    कभी वो खफा रहे, तो कभी हम खफा रहे

    रहते थे साथ-साथ मगर आज क्या हुआ
    कभी वो जुदा रहे, तो कभी हम जुदा रहे

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  3. आप अच्छा लिखते हैं, यु ही अच्छा लिखते रहिए

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  4. आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

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  5. बहुत बढ़िया शब्दों में पिरोई रचना....बधाई...

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  6. वादा जो कर लिया था हमने साथ देने का
    वो बेवफा रहे, तो हम भी बेवफा रहे


    बहुत ही उम्दा गज़ल

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  7. आपकी पोस्ट रविवार २९ -०८ -२०१० को चर्चा मंच पर है ....वहाँ आपका स्वागत है ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  8. वादा जो कर लिया था हमने साथ देने का
    वो बेवफा रहे, तो हम भी बेवफा रहे..

    क्या बात है !

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  9. बहुत उम्दा ग़ज़ल|पहला शे'र खासा पसंद आया|

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  10. बेहद खूबसूरत ,शानदार रचना ।

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  11. लिखती गई जो नगमा-ओ-अश`आर ज़िन्दगी
    वहां वो कलम रहे और हम फलसफा रहे

    हर सिम्त ढूँढती रही ज़िन्दगी वही पल
    साकी-ऐ-जाम थे वो और हम राजदां रहे
    ....बहुत खूबसूरत गज़ल ..

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  12. प्रिय भाई शाहनवाज़ सिद्दीकी जी
    नमस्कार !
    अच्छी ग़ज़ल लिखी है ।
    यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला
    कभी वो ख़फ़ा रहे, तो कभी हम ख़फ़ा रहे

    बढ़िया मत्ला है ।
    लिखती गई जो नग़मा-ओ-अश`आर ज़िन्दगी
    वहां वो कलम रहे और हम फ़ल्सफ़ा रहे

    मुबारकबाद है इस शे'र के लिए ,
    बहुत शानदार !

    आपके ब्लॉग पर और भी विविध आलेख कविताएं पढ़ कर ख़ुशी हुई ।
    शुभकामनाओं सहित …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  13. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..सुंदर भाव.बधाई.
    ____________________
    'पाखी की दुनिया' में अब सी-प्लेन में घूमने की तैयारी...

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  14. Waah bahut khoob!
    arz kiya hae..( I dabble in sher-o-shayari from time to time..a part from a ghazal I have written)
    Sanihaan hee fizaa bana lee humne,
    bebasee apni yoon chupa lee humney..

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  15. kya bat hai.....mujhe to kalam bhi aapki aur falsafa bhi aap hi lage.....khoobsurat panktiya...

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