आलोचनाओं में व्यतीत होता समय

आजकल ब्लाग जगत से जुड़े हिन्दी लेखकों का अधिकतर समय एक-दूसरे के धर्म, आस्था अथवा लेखों की आलोचना करने में ही व्यतीत होता है। हालांकि लेखन जगत में आलोचना हमेशा से ही शक्ति का स्रोत होती रही है। लेकिन आजकल ना तो आलोचना का वह स्तर दिखाई देता है और ना ही लेखकों में आलोचना सहने और सुझावों को आत्मसात करने की ललक। यह जानते हुए भी कि मैं गलत हूँ, फिर भी अपनी बात पर अड़े रहने की ज़िद हर जगह मौजूद है। सबसे अधिक चिंतनीय और सरदर्द करने वाली बात तो एक-दूसरे के विरोध में लिखे जाने वाले लेखों की कड़ी का अंत ना होना है। अगर कोई एक लेख लिखता है तो उसके विरोध में दुसरा लेख, फिर उसके विरोध में तीसरा, चौथा तथा पांचवा लेख लिखा जाता है और यह प्रक्रिया निरंतर चलती जा रही है। आज अगर साहित्य जगत की यह तस्वीर है तो आमजनों की हालत का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।


दरअसल यह कशमकश कुछ ऐसे आरम्भ होती हैः
जब भी कोई लेखक कुछ लिखता है तो उस पर प्रश्न होने स्वाभाविक है और सभ्य लोग इससे विचलित भी नहीं होते हैं। सामान्य प्रक्रिया तो यही है कि अगर आलोचक उस पर प्रश्न करें तो लेखक उक्त लेख के साथ न्याय करते हुए, लेख से सम्बंधित प्रश्नों का उत्तर दे। अगर लेखक के पास लेख से सबंधित प्रश्नों के उत्तर ही नहीं है, तब इसका अर्थ है कि लेखक का स्वयं लेख पर नियंत्रण नहीं है अर्थात वह लेख के साथ पूर्णतः न्याय नहीं कर सकता है। और जो लेखक अपने लेख के साथ न्याय नहीं कर सकता उसे उक्त विषय पर लिखने का हक़ भी नहीं होना चाहिए।

जब लेखक के पास उत्तर नहीं होते हैं तो वह इधर-उधर की बातें करता है अथवा कुंठाग्रस्त होकर उलटा-सीधा या ध्यान भटकाने वाला लेख लिखता है।

हमें किसी भी लेख को अतिउत्साहित होकर अथवा पूर्ण जानकारी के बिना नहीं लिखना चाहिए। और किसी भी विषय पर प्रश्न उठाने की जगह उसका हल प्रस्तुत करना अधिक अच्छा है। याद रखें कि अगर हम किसी की ओर एक उंगली उठाते हैं तो चार उंगली हमारी ओर उठना स्वाभाविक है।


Keywords:
Battle of thought, Religion, आलोचना

29 comments:

  1. बहुत खूब सर जी

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  2. बहुत खूब कहा हम किसी की ओर एक उंगली उठाते हैं तो चार उंगली हमारी ओर उठना स्वाभाविक है

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  3. Shah bhai, aap kafi achha aur thoda hat kar likhte hain. Bat ka sar samajh me aajat hai.

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  4. लेखन जगत में आलोचना हमेशा से ही शक्ति का स्रोत होती रही है। लेकिन आजकल ना तो आलोचना का वह स्तर दिखाई देता है और ना ही लेखकों में आलोचना सहने और सुझावों को आत्मसात करने की ललक।

    Aap hamesha badhiya likhte hain! Ek aur achha lekh likhne ke liye sadhuwad!

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  5. सही कहा भाई, वे उकसाते हैं और जवाब देने पर किसी न किसी के कंधें पर बन्दुक रख गरियाने लगते हैं. हम हक पर है और वो बातिल पर लेकिन फिर भी सो मैंने आज से यह तय कर लिया है कि दीगर मज़हब की किसी भी बात को प्रकशित नहीं करूँगा... हाँ अपने मज़हब इस्लाम और मुस्लिम समाज के लेख लिखने के अलावा विज्ञान लेखन ही करूँगा क्यूंकि यही मेरा फन है और मैं अपनी ऊर्जा और समय इनके विरोध में नहीं गवाऊंगा....

    जाकिर भाई (साइंस वाले) और उमर भाई (हमारी अंजुमन वाले) दोनों से मैं मुतासिर हूँ मगर मेरा अपना फन है सुधारवादी लेख जिसमें भावनाओं और संवेदनाओं का अपार संग्रह होता है. सो यह काम बिना किसी दुसरे मज़हब का हवाला दिए भी हो सकता है इसलिए मैं अब अपनी उर्जा व समय का इस्तेमाल सिर्फ मज़हब इस्लाम और मुस्लिम समाज के लेख लिखने के अलावा विज्ञान लेखन में ही करूँगा. इसका एक बहुत बड़ा फायेदा यह होगा कि जो वास्तविक रूप से असामाजिक हैं उनका चारा अपने आप सामने आ जायेगा...


    मैंने अपने निजी ब्लॉग का टेम्पलेट भी बदल दिया है...

    शाह नवाज़ भाई आपका शुक्रिया

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  6. समझने की बात है...मैंने पहले भी कहा है... लेखकीय ऊर्जा कीमती है, सही दिशा में इस्तेमाल हो तो सबके लिए सुखकारी है.

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  7. Aaj ke lekhan par uchit pritikriya hai aapki. Accha lekh hai Shah Nawaz Bhai!

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  8. Saksham ChakravartiApril 21, 2010 at 3:11 PM

    Bat bilkul sahi hai, logo chahe vishay ko jane ya na jane, parantu us par likhte avashy hain.

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  9. बच्‍चों अब तुम्‍हारी नौटंकियां नहीं चलेंगी खान और सिद्दीकी सबको अग्रीगेटर से बाहर निकलना होगा यह हमारा अनुरोध नहीं आदेश है
    1419914199

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  10. आदेश देने वाले सावरकर साहब, चलिए निकल जाते हैं बाहर. मगर क्या सजा सुनाने से पहले हमारा कुसूर भी नहीं बताएँगे?

    वैसे आप स्वयं इतने बैचेन हैं तो आप स्वयं ही क्यों नहीं निकल जाते हैं बाहर?

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  11. ठीक कहते है शाहनवाज़ भाई आलोचना सहना भी एक फ़न है नही तो यहाँ ब्लागजगत मे तो लोग जवाब देने बजाए नाम बदलकर गालियां देने लगते है

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  12. AAp bahut achha likhte hain bhai jaan hume aapke upar garv hain!!!!!!!!!!

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  13. आईये... दो कदम हमारे साथ भी चलिए. आपको भी अच्छा लगेगा. तो चलिए न....

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  14. आप सही फरमाते हैं शाहनवाज़ जी ,मैं आपकी हर बात से सहमत हूँ.पर यह तो बता दीजिए आखिर ये चल क्या रहा है और ये तमाशा कब खत्म होगा.

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  15. Dipak Ji aapke aur hamare prayaas se yeh sab avashy hi samapt hoga aur Jald hi samapt hoga.

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  16. एक महान और संतुलित विचार .

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  17. क्यों पागल बना रहा है बच्चे तू भी उसी gang मैं सम्मिलित है ! अब अपना ब्लॉग निरस्त होते देख कर निष्पक्ष बनने की नौटंकी कर रहा है ! ब्लॉगवाणी इस ब्लॉग का नाम भी लिख लो ! ये भी पक्का मुल्ला है !!!

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  19. "जब भी कोई लेखक कुछ लिखता है तो उस पर प्रश्न होने स्वाभाविक है और सभ्य लोग इससे विचलित भी नहीं होते हैं। सामान्य प्रक्रिया तो यही है कि अगर आलोचक उस पर प्रश्न करें तो लेखक उक्त लेख के साथ न्याय करते हुए, लेख से सम्बंधित प्रश्नों का उत्तर दे। अगर लेखक के पास लेख से सबंधित प्रश्नों के उत्तर ही नहीं है, तब इसका अर्थ है कि लेखक का स्वयं लेख पर नियंत्रण नहीं है अर्थात वह लेख के साथ पूर्णतः न्याय नहीं कर सकता है। और जो लेखक अपने लेख के साथ न्याय नहीं कर सकता उसे उक्त विषय पर लिखने का हक़ भी नहीं होना चाहिए।"

    bilkul sahi rag pakdi aapne shaahnavaaj bhai!
    sabhi ko samjhni chaahiye ye baat....

    kunwar ji,

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  20. @ PARAM ARYA

    आपने मेरा गैंग तो बता दिया, चलते-चलते अपना गैंग भी बता देते? वैसे यह गैंग-वैंग की सोच आप जैसों की हो सकती है.

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  21. रही बात ब्लॉग निरस्त होने की, तो यह धमकी किसी ओर को दीजियेगा, यहाँ ना तो धमकियों से डरने वाले लोग हैं और ना धमकियों के बदले में दूषित भाषा का प्रयोग करने वाले. वैसे आप हैं कौन धमकी देने वाले?

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  22. चलिए मैं आपको ही चैलेंज दिए देता हूँ, मेरा एक भी लेख अथवा टिप्पणी को ढूंड कर दिखा दीजिये, जिससे किसी की भी भावना आहात हुई है? है दम?

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  23. किसी की भावनाओं को नुक्सान पहुँचाना ना तो मेरे परिवार के संस्कारों में है और ना ही मेरे धर्म के शिक्षाओं में. उलटे दूसरों की भावनाओ का ख्याल रखने की शिक्षा दी है मेरे गुरु मुहम्मद (स.) ने. विश्वास नहीं होता है तो मेरा लिखा हुआ लेख "गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशानिर्देश" पढ़कर देखिये, जहाँ सिर्फ लाफ्ज़ी नहीं बल्कि सबूतों के साथ बातें हैं.

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  24. निंदक नियरे राखिए,
    ऑंगन कुटी छवाय।
    बिन पानी, साबुन बिना,
    निर्मल करे सुभाय।।
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    जाति न पूछो साधु की,
    पूछ लीजिए ग्‍यान।
    मोल करो तलवार के,
    पड़ा रहन दो म्‍यान।।
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    कबीर सुता क्या करे,
    करे काज निवार|
    जिस पंथ तू चलना,
    तो पंथ संवार||

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  25. शाह नवाज़ जी आप बिलकुल सही हैं क्योकि अगर हम ध्यान पुर्वक सभी धार्मिक पुस्तकों को पढेंगे तो हमे यह पता चलेगा की हर धर्म सही होता हैं और हर एक धर्म हमे संदेश और परिस्थिति में संभालना सिखलाते हैं आपस में लड़ना और दुसरे व्यक्ति को बुरा कहना किसी भी धर्म में नहीं हैं
    संस्कार : संस्कार भी हमे प्रेम से रहन ही सिखाते हैं. जो नेतिकता के आधार पर निर्धारित किये जाते हैं.
    हमारे धर्म और संस्कार का लक्ष्य एक ही हैं

    धर्म एक रस्ते की तरह होता हैं और जो रास्ता हमे पसंद होता हैं हम उसी पर चलते हैं और आज के समाज में कुछ लोग अपने विचारो के अनुसार धर्म की परिभाषा तक बदल देते हैं .
    धर्म हमें एकजुट होना सिखाता हैं

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  26. वाह हरीश! "धर्म एक रस्ते की तरह होता हैं और जो रास्ता हमे पसंद होता हैं हम उसी पर चलते हैं" ये लाइन तो काफी हद तक दिल को छु गयी है ये आज कल के लोगो का तरीका है जीने का....और लोग कहते है की ये तो ---- Modern Fashion है.......

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  27. सही कहा आपने !
    बहुत ही सुन्दर, रोचक, मजेदार, अतुलनीय, शानदार जानकारी दी हे आपने ! आपका दिल से धन्यवाद और आभार !!!!!!
    इन्टरनेट और कंप्यूटर दुनिया की रोचक जानकारियाँ, टिप्स और ट्रिक्स, वेबसाइट, ब्लॉग, मोबाइल ट्रिक्स, सॉफ्टवेयर, सफलता के मंत्र, काम के नुस्खे, अजीबो-गरीब जानकारियाँ और अच्छी बाते पडने के लिए मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत हे ! अगर मेरा ब्लॉग अच्छा लगे तो अपने विचार दे और इस ब्लॉग से जुड़े ! अगर मेरे ब्लॉग में किसी भी प्रकार की कमी हो तो मुझे जरुर बताये !
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