बरेली में हुए मौलाना तौसीफ रज़ा मजहरी की दर्दनाक मौत के मामले में आखिरकार पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। करीब 40 दिनों तक चली जांच के बाद मुरादाबाद के रहने वाले 25 वर्षीय पंकज राजपूत को पकड़ा गया, जिस पर 10 हजार रुपये का इनाम भी घोषित था।
पुलिस के मुताबिक मौलाना तौसीफ रज़ा मजहरी की मौत किसी हादसे की तरह नहीं, बल्कि ट्रेन में हुए एक झगड़े और मारपीट के दौरान हुई। आरोपी का कहना है कि उसका मोबाइल फोन गुम हो गया था और उसे मौलाना साहब पर शक हो गया। इसी शक ने एक बेगुनाह इंसान की जान ले ली।
आरोपी के अनुसार जब मौलाना साहब ट्रेन में दूसरे डिब्बे की तरफ जा रहे थे, तभी आरोपी ने उन्हें रोक लिया। दोनों के बीच कहासुनी हुई, फिर मामला हाथापाई तक पहुंच गया। इसी दौरान धक्का-मुक्की में मौलाना साहब चलती ट्रेन से नीचे गिर पड़े। गिरने के बाद उनकी जान नहीं बच सकी।
यह सोचकर ही दिल भर आता है कि एक शख्स, जो दीन और इल्म की महफिल में शरीक होकर अपने घर लौट रहा था, उसे शायद अंदाजा भी नहीं था कि एक शैतान की वजह से यह उसका आखिरी सफर साबित होगा।
मामले की जांच आसान नहीं थी। जीआरपी ने ट्रेन में सफर कर रहे करीब 200 यात्रियों से पूछताछ की। कई यात्रियों ने बताया कि उन्होंने एक युवक को मौलाना साहब के साथ मारपीट करते देखा था। कुछ लोगों ने तो आरोपी को रोकने और उसकी पिटाई करने की भी कोशिश की थी।
जांच के दौरान पुलिस ने यात्रियों के पीएनआर रिकॉर्ड खंगाले, वीडियो क्लिप जुटाईं और 300 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी। सैकड़ों मोबाइल नंबरों का विश्लेषण किया गया। इन्हीं सबूतों के आधार पर आखिरकार आरोपी की पहचान पंकज राजपूत के रूप में हुई।
पुलिस के अनुसार घटना के वक्त आरोपी शराब के नशे में भी था। वह अपनी बहन की शादी के सिलसिले में बरेली आ रहा था, लेकिन बरेली स्टेशन पर उतर ही नहीं सका और शाहजहांपुर पहुंच गया। घटना के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए उसने अपना मोबाइल फोन भी रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया था।
मौलाना तौसीफ रज़ा मजहरी बिहार के किशनगंज जिले के रहने वाले थे। वह 24 और 25 अप्रैल को बरेली में आयोजित ताजुश्शरिया उर्स में शामिल होने आए थे। 26 अप्रैल को घर लौटते समय उनके साथ यह दर्दनाक हादसा हुआ। उनकी पत्नी तबस्सुम ने इस मामले में हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था और इंसाफ की मांग की थी।
आज आरोपी की गिरफ्तारी तो हो गई है, लेकिन एक परिवार का सहारा हमेशा के लिए छिन चुका है। एक बीवी अपने शौहर को खो चुकी है, बच्चे अपने सर से साया खो चुके हैं और चाहने वाले एक ऐसे इंसान की जुदाई का गम झेल रहे हैं जो अपने घर लौटने के लिए निकला था, लेकिन वापस कभी नहीं पहुंच सका।
यहाँ पर नफ़रत में उबलने वालों के लिए भी एक संदेश है कि अलग अलग समुदाय से होने के बावजूद ना तो मुस्लिम समुदाय ने आरोपी के एनकाउंटर की माँग की और ना ही उसके घर बुलडोजर चलाने की। क्योंकि क्राइम चाहे जितना मर्जी संगीन हो, सज़ा सिर्फ़ और सिर्फ़ अदालत में साबित होने के बाद ही मिलनी चाहिए, वरना हमारे सभ्य देश के जंगल राज में तब्दील होने में ज़रा भी वक्त नहीं लगेगा और इसका नुक़सान राजनेताओं को नहीं होगा, बल्कि देश के आम नागरिकों को ही होगा… आपका इसके ऊपर क्या कहना है?

