गायब होती टिप्पणियों का राज़ - शाहनवाज

हमने ब्लॉग बुलेटिन पर गायब होती टिप्पणियों का राज़ क्या बताया, गूगल बाबा हमसे नाराज़ हो गए और हमारी पोस्ट की फीड को गूगल रीडर पर अपडेट करने से इंकार कर दिया. दोपहर ब्लॉग बुलेटिन पर पोस्ट डाली थी और फीड है कि अब तक अपडेट नहीं हुई है. अब जब फीड अपडेट नहीं हुई है तो पाठकों तक नई पोस्ट की खबर कैसे पहुंचेगी भला? बताता चलूँ कि हर एक ब्लॉग की पोस्ट गूगल रीडर के द्वारा ही फोलोवर्स तक पहुँचती है, चाहे वोह सीधे रीडर पर जाकर, ब्लोगर डेश बोर्ड पर अथवा अपने ब्लॉग पर लगे विजेट पर ताज़ा पोस्ट पढ़ पाते हैं. यहाँ तक कि हमारीवाणी जैसे ब्लॉग संकलक भी तभी पोस्ट अपडेट कर पाते हैं.

इस अकस्मक समस्या के हल के लिए हमने यह रास्ता निकला है. अब देखते हैं गूगल बाबा नज़रे करम करते हैं कि नहीं. आप तब तक नीचे दिए लिंक पर जाकर देखिये गायब होती टिप्पणियों का राज़ तथा ब्लॉग जगत की ताज़ा हलचल.

ब्लॉग बुलेटिन: गायब होती टिप्पणियों का राज़ - शाहनवाज़






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मुस्लिम समाज में तलाक़ का प्रावधान

सबसे पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि इस्लाम में विवाह एक कोंट्रेक्ट मैरिज होती है जिसमें क़ाज़ी, वकील तथा 2 गवाहों के सामने कुबूल कर लेने से निकाह हो जाता है तथा विशेष परिस्थितिओं में विवाह को 'तलाक' अथवा 'खुला' के द्वारा विच्छेद किया जा सकता है। मुस्लिम विवाह में गवाह, वकील तथा क़ाज़ी केवल इसलिए होते हैं जिससे कि कोई भी पक्ष विवाह से मुकर ना जाए।

ठीक इसी तरह जब यह एहसास हो जाए कि अब साथ रहना नामुमकिन है और ज़िन्दगी की गाडी को आगे बढाने के लिए अलग होना ही एकमात्र तरीका बचा है, तब ऐसे हालात के लिए तलाक़ का प्रावधान है।

तलाक़ का इस्लामिक तरीका यह है कि जब यह अहसास हो कि जीवन की गाडी को साथ-साथ चलाया नहीं जा सकता है, तब क़ाज़ी मामले की जाँच करके दोनों पक्षों को कुछ दिन और साथ गुज़ारने की सलाह दे सकता है अथवा गवाहों के सामने पहली तलाक़ दे दी जाती है, उसके बाद दोनों को 30 दिन (माहवारी की समयसीमा) तक अच्छी तरह से साथ रहने के लिए कहा जाता है। अब अगर उसके बाद भी उन्हें लगता है कि साथ रहना मुश्किल है तो फिर दूसरी बार गवाहों के सामने "तलाक़" कहा जाता है, इस तरह दो "तलाक" हो जाती हैं और फिर से 30 दिन तक साथ रहा जाता है। अगर फिर भी लगता है कि साथ नहीं रहा जा सकता है तब जाकर तीसरी बार तलाक़ दी जाती है और इस तरह तलाक़ मुक़म्मल होती है।

इसमें सुन्नी मुस्लिम समाज का 'हनफी', 'शाफ़ई' तथा 'मालिकी' मसलक में एक ही समय में "तीन तलाक़" को भी सही माना जाता हैं, हालाँकि वह भी इस तरीके को अच्छा तरीका नहीं मानते। अन्य मुस्लिम उलेमा एक समय में तीन तलाक़ दिए जाने को "तलाक़" नहीं मानते हैं और कई मुस्लिम देशों में इस तरह से तलाक देने पर व्यक्ति के विरुद्ध सज़ा का प्रावधान है।



महिलाओं को तलाक़ का हक

यह कहना गलत है कि महिलाओं को तलाक़ का हक नहीं है, बल्कि उनको तुरंत तलाक़ का हक है। अगर किसी महिला का पति शराबी, जुआरी, नामर्द, मार-पीट करने वाला, बुरी आदतों या स्वाभाव वाला या किसी ऐसी सामाजिक बुराई में लिप्त है जो कि समाज में लज्जा का कारण हो तो उसे सम्बन्ध विच्छेद का हक है। इसके लिए उसे भी क़ाज़ी के पास जाना होता है। इसके साथ-साथ ऐसी स्थिति में उसको 30-30 दिन तक इंतज़ार करने की भी आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि महिला के आरोप सही पाए जाने की स्थिति में फ़ौरन विवाह विच्छेद का अधिकार मिल जाता है, जिसको 'खुला' कहा जाता है।

इस विषय में कुछ लोगो का यह कहना है कि जब विवाह पति-पत्नी की मर्ज़ी से होता है तो तलाक़ किसी एक की मर्ज़ी से कैसे हो सकता है। मेरे विचार से ऐसा कहना व्यवहारिक नहीं है, सम्बन्ध हमेशा दो लोगो की मर्ज़ी से ही बनते हैं परन्तु किसी एक की भी मर्ज़ी ना होने से सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। ज़रा सोचिये अगर किसी महिला का पति उस पर ज्यादतियां करता है, यातनाएं देता है और तलाक़ देने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है तो क्या ऐसे में बिना उसकी मर्जी के तलाक़ के प्रावधान का ना होना जायज़ कहलाया जा सकता है?

एक पुरुष और महिला के दिलों का मिलना और साथ-साथ सामाजिक बंधन में बंध कर रहना विवाह है तो रिश्तों में तनाव या अन्य किसी कारण से साथ-साथ ना रह पाने की स्थिति का नाम 'तलाक़' है।



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क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?






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एक शाम ढली, फिर सुबह नई


15 मार्च, अर्थात अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार आज मेरा जन्मदिवस है, हालाँकि भारतीय कैलेंडर के अनुसार तो मेरा जन्मदिवस 'चैत्र मास' की पहली तिथि अर्थात रंगों की होली के दिन पड़ता है... आज सुबह से मूड बहुत अच्छा है, सब कुछ नया-नया सा है... मैंने अपनी भावनाओं को यूँ ही कुछ शब्दों की माला में पिरो दिया है.


एक शाम ढली, फिर सुबह नई,
उम्मीद नई, शुरुआत नई

वोह चमकीला सा ख्वाब नया
जज़्बात नए, हर आस नई

हर आंसू गिर कर सूख गया,
अब खुशियों की हो बात नई

यूँ मद्धम-मद्धम चलती सी
यह खुशियों की बारात नई

फिर जीवन खुलकर झूम उठा,
लम्हा-लम्हा सौगात नई

अब रब की पनाह में है 'साहिल'
हर मौज नई, सादात* नई


- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'



*सादात = बुज़ुर्गी


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