लगता है विपक्षी दलों की तरह अब अन्ना और उनकी टीम को भी राहुल गाँधी सपनों में सताने लगे हैं. तभी तो अन्ना लोकपाल बिल पर बनी स्टैंडिंग कमिटी के ऊपर राहुल गाँधी का दबाव बता रहे हैं. एक तरफ तो वह कहते हैं उन्हें राहुल गाँधी के युवा होने के कारण बहुत उम्मीदें हैं, लेकिन साथ ही कहते हैं वह राजनीती कर रहे हैं. शायद वह भूल रहे हैं कि राहुल राजनेता ही हैं, बल्कि देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियों में से एक कांग्रेस के राष्ट्रिय महासचिव भी हैं, यह और बात है कि वह इस पद पर अपनी काबिलियत साबित करके नहीं बल्कि इंदिरा-नेहरु परिवार से जुड़ाव के कारण पहुंचे हैं.
हालाँकि यह भी सच है कि उन्होंने राजनीती में लीक से हटकर कुछ अलग चाल अपनाई है. जनता की नब्ज़ को समझने के लिए उनके बीच जाना, आगे बढ़कर उनसे बातचीत करना, उनके साथ भोजन करना, उनकी चारपाई पर सोना इत्यादि ऐसे कार्य हैं जिसमें सभी पार्टियों के नेताओं सहित स्वयं कांग्रेस के नेता भी बहुत पीछें हैं.
जिस तरह अन्ना हज़ारे का कद पिछले दिनों बढ़ा है उसको देखते हुए उनका पहले शरद पवार और अब राहुल गाँधी पर व्यक्तिगत हमला बेहद निम्न स्तर का है. एक ओर तो वह कहते हैं कि संसद पर उन्हें पूरा भरोसा है और वहीँ दूसरों ओर कहते हैं कि वह राजनीती से दूर रहना चाहते हैं क्योंकि उनके मुताबिक राजनीती अच्छी जगह नहीं है. हालाँकि अन्ना का यह बयान कि राहुल गाँधी प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं है, स्वयं किसी राजनैतिक बयान से कम नहीं है. अगर ऐसा बयान किसी पार्टी अथवा संसद के द्वारा आता तो इसमें कुछ अचरज की बात भी नहीं होती. क्योंकि हमारे देश में प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव जनता के द्वारा नहीं बल्कि सांसदों के द्वारा किया जाता है, इसलिए कौन प्रधानमंत्री पद के लायक है और कौन नहीं इसका फैसला करना सांसदों का काम है.
अब आते हैं उस बयान पर जिस पर अन्ना ने राहुल गाँधी के निर्देश की बात कही थी, स्टैंडिंग कमिटी ने सिफारिश की है कि केन्द्र सरकार के ग्रुप सी तथा डी के कर्मचारियों को लोकपाल के अंतर्गत नहीं रख कर सी.वी.सी. के अंतर्गत रखा जाए और इसके लिए सी.वी.सी. को लोकपाल जैसे ही अधिकार दिए जाए. इस पर टीम अन्ना का कहना है कि अगर स्थाई समिति के द्वारा सुझाया गया लोकपाल आया तो इससे भ्रष्टाचार कम होने की जगह और भी अधिक बढ़ जाएगा. हालाँकि उन्होंने यह नहीं बताया कि आखिर कैसे?