स्वतंत्र दिवस पर सभी देशवासियों को ढेरों शुभकामनाएँ तथा वीर शहीदों को सलाम!
देश गौरवतापूर्ण अपना 64वां स्वतंत्रदिवस मना रहा है, परन्तु जिस तरह तू-तू मैं-मैं पुरे देश में चल रही है वह बहुत ही निराशापूर्ण है। जहाँ एक तरफ सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले विपक्षी दलों तथा तथाकथित सिविल सोसायटी के द्वारा अमर्यादित भाषा का प्रयोग लगातार जारी है, वहीँ सरकार के द्वारा अपने विरुद्ध उठने वाली आवाजों का जवाब बहुत ही अभद्रता से दिया रहा है। सरकार के द्वारा द्वारा लगातार दमन का तरीका अपनाया जाना अत्यंत खेदजनक है। जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप दोनों ओर से लग रहे हैं, वह अत्यंत शर्मनाक तथा देश के प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ हैं।
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| चित्र गूगल से साभार |
आज के दौर में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है, जिसके लिए अन्ना हजारे ओर बाबा रामदेव प्रशंसा के पात्र हैं। मानता हूँ कि आज 70-80 प्रतिशत या उससे भी अधिक तादाद में राजनेता भ्रष्ट है, लेकिन क्या आमजन इतनी ही तादाद में भ्रष्ठ नहीं है? ऐसे में भ्रष्टाचार के विरद्ध लड़ाई इतनी आसान नहीं है, जबकि पूरा का पूरा तंत्र ही सड़-गल गया हो। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उम्मीद की कोई किरण ही दिखाई नहीं देती हो। लेकिन परेशानी का सबब यह है कि जो उम्मीद जगा रहे हैं, वही अपनी हठधर्मिता तथा अलोकतांत्रिक आचरण से निराश भी कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकार ने टीम अन्ना तथा जनता के दबाव के कारण पहल करते हुए, लोकपाल बिल लाने का प्रयास किया है। हालाँकि प्रस्तावित मौजूदा बिल में कुछ कमियां-खामिया भी दिखाई दे रही हैं, लेकिन संसदीय प्रणाली में खामियों को दूर करने का प्रावधान मजूद है। वहीँ टीम अन्ना ने अपने द्वारा प्रस्तुत जन लोकपाल बिल के सभी पहलुओं को सरकार के द्वारा स्वीकार ना किये जाने से नाराज़गी दिखाई है। हालाँकि इतना भर होता ऑर टीम अन्ना के द्वारा अपनी मांगों की व्यवहारिकता को सामने लाया जाता तथा प्रदर्शनों इत्यादि से सरकार पर दबाव बनाया जाता तो कुछ-कुछ उम्मीद दिखाई देती। परन्तु यहाँ पर अपनी सारी मांगे ना माने जाने पर अन्ना हज़ारे तथा उनकी पूरी टीम अड़ गयी तथा सरकारी पक्ष के उकसावे में आकार स्वयं भी अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने लगी, जिससे उनके ऊपर भी उँगलियाँ उठाना स्वाभाविक है।
क्या किसी संस्था का अपने द्वारा बनाए कानून को अमल में लाने के लिए अड़ जाना ऑर मनमाफिक कानून ना बन पाने पर आमरण अनशन की धमकी देना उचित ठहराया जा सकता है? मेरी नज़र में
यह एक अच्छे कार्य के लिए शुरू हुए आन्दोलन का भटकाव की और जाना है।
किसी चुनी हुई सरकार का हर एक कार्य उसकी जवाबदेही तय करता है, ठीक इसी तरह ना केवल सरकारी लोकपाल बिल अथवा किसी भी कानून के लिए केवल और केवल चुनी हुई सरकार की ही जवाबदेह बनती है। क्योंकि अपने कार्यकाल के बाद सरकार को फिर से जनता के समक्ष उपस्थित होना होता है ऑर इसी में हमारे लोकतंत्र की मजबूती निहितार्थ है।
सोचिये अगर टीम अन्ना के द्वारा बनाया
गया लोकपाल बिल सरकार को इस तरह मजबूर करके लागु हो भी जाता है तो आखिर इस बिल के लिए जवाबदेह कौन होगा? उसके दुष्परिणामों के लिए कौन ज़िम्मेदार होगा? अगर अत्यधिक अधिकार प्राप्त लोकपाल निरंकुश हो जाता है ऑर इस कारण देश में अस्थिरता का माहौल उत्पन्न होता है तो क्या टीम अन्ना उस स्थिति के लिए जवाबदेह हो सकती है? और अगर वह जवाबदेह नहीं हो सकते तो फिर लोकतंत्र के कान पर तमंचा रखकर अपने बिल को पास करवाने की धमकी कैसे दे सकती यह टीम?
आज के समय केवल तानाशाही अथवा लोकतंत्र के द्वारा ही भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है, तानाशाही के अच्छे-बुरे दोनों परिणाम हो सकते हैं। आमतौर पर बुरे परिणामों की ही संभावना अधिक रहती है। वहीँ लोकतंत्र जनता का आइना होता है, जैसी जनता वैसा शासन! इसलिए आज के युग में एकमात्र लोकतंत्र ही एक सही विकल्प नज़र आता है। ज़रूरत है चुनावों के द्वारा हर बार सुधार किया जाए, जनता में चुनावों के प्रयोग में जागरूकता लायी जाए, जिससे कि भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। अगर ऐसा हो जाए तो कोई भी राजनैतिक दल भ्रष्ठाचार फैलाते समय सौ नहीं बल्कि हज़ार बार सोचेगा, क्योंकि उसे पता होगा कि उसे फिर से जनता के समक्ष प्रस्तुत होना है ऑर अपने कार्यों का हिसाब-किताब देना है। लेकिन भ्रष्ठाचार-भ्रष्ठाचार चिल्लाने वाले यही लोग चुनाव के समय अपनी-अपनी पसंद की पार्टी के उम्मीदवार को ही वोट डालते नज़र आते हैं, चाहे प्रत्याशी कितना ही भ्रष्ठ क्यों ना हो!
जितने भी लोग भ्रष्ठाचार के विरुद्ध अलख जगाते दिखाई दे रहे हैं, यह सब के सब भ्रष्ठाचार के विरुद्ध नहीं अपितु भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता को भावनात्मक तरीके से एकत्र करके सरकार के विरुद्ध विद्रोह का अलख जगाने का प्रयास कर रहे हैं। वर्ना कोई अलोकतांत्रिक तरीके का समर्थन कैसे कर सकता है?