ईद की ढेरों मुबारकबाद!

खुशियाँ और भाईचारे के त्यौहार 'ईद' पर सभी को बहुत-बहुत मुबारकबाद। यह ईद-उल-फ़ित्र है, इसे रमजान (रमादान) के पवित्र महीने की समाप्ति पर मनाया जाता है। रमजान के महीने में धैर्य, विन्रमता और अनुशासन के साथ ज़िन्दगी जीने का अभ्यास किया जाता है, जिससे कि इन गुणों को आत्मसात किया जा सके...

ब्लॉग जगत के सभी लेखकों, टिप्पणीकारों तथा पाठकों को ईद-उल-फित्र के मौके पर ढेरों मुबारकबाद!





इस मौजूं पर मेरा लेख: 



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लोकपाल बिल के लिए जवाबदेह कौन होगा?

स्वतंत्र दिवस पर सभी देशवासियों को ढेरों शुभकामनाएँ तथा वीर शहीदों को सलाम!

देश गौरवतापूर्ण अपना 64वां स्वतंत्रदिवस मना रहा है, परन्तु जिस तरह तू-तू मैं-मैं पुरे देश में चल रही है वह बहुत ही निराशापूर्ण है। जहाँ एक तरफ सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले विपक्षी दलों तथा तथाकथित सिविल सोसायटी के द्वारा अमर्यादित भाषा का प्रयोग लगातार जारी है, वहीँ सरकार के द्वारा अपने विरुद्ध उठने वाली आवाजों का जवाब बहुत ही अभद्रता से दिया रहा है। सरकार के द्वारा द्वारा लगातार दमन का तरीका अपनाया जाना अत्यंत खेदजनक है। जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप दोनों ओर से लग रहे हैं, वह अत्यंत शर्मनाक तथा देश के प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ हैं।

चित्र गूगल से साभार
आज के दौर में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है, जिसके लिए अन्ना हजारे ओर बाबा रामदेव प्रशंसा के पात्र हैं। मानता हूँ कि आज 70-80 प्रतिशत या उससे भी अधिक तादाद में राजनेता भ्रष्ट है, लेकिन क्या आमजन इतनी ही तादाद में भ्रष्ठ नहीं है? ऐसे में भ्रष्टाचार के विरद्ध लड़ाई इतनी आसान नहीं है, जबकि पूरा का पूरा तंत्र ही सड़-गल गया हो। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उम्मीद की कोई किरण ही दिखाई नहीं देती हो। लेकिन परेशानी का सबब यह है कि जो उम्मीद जगा रहे हैं, वही अपनी हठधर्मिता तथा अलोकतांत्रिक आचरण से निराश भी कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकार ने टीम अन्ना तथा जनता के दबाव के कारण पहल करते हुए, लोकपाल बिल लाने का प्रयास किया है। हालाँकि प्रस्तावित मौजूदा बिल में कुछ कमियां-खामिया भी दिखाई दे रही हैं, लेकिन संसदीय प्रणाली में खामियों को दूर करने का प्रावधान मजूद है। वहीँ टीम अन्ना ने अपने द्वारा प्रस्तुत जन लोकपाल बिल के सभी पहलुओं को सरकार के द्वारा स्वीकार ना किये जाने से नाराज़गी दिखाई है। हालाँकि इतना भर होता ऑर टीम अन्ना के द्वारा अपनी मांगों की व्यवहारिकता को सामने लाया जाता तथा प्रदर्शनों इत्यादि से सरकार पर दबाव बनाया जाता तो कुछ-कुछ उम्मीद दिखाई देती। परन्तु यहाँ पर अपनी सारी मांगे ना माने जाने पर अन्ना हज़ारे तथा उनकी पूरी टीम अड़ गयी तथा सरकारी पक्ष के उकसावे में आकार स्वयं भी अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने लगी, जिससे उनके ऊपर भी उँगलियाँ उठाना स्वाभाविक है।

क्या किसी संस्था का अपने द्वारा बनाए कानून को अमल में लाने के लिए अड़ जाना ऑर मनमाफिक कानून ना बन पाने पर आमरण अनशन की धमकी देना उचित ठहराया जा सकता है? मेरी नज़र में यह एक अच्छे कार्य के लिए शुरू हुए आन्दोलन का भटकाव की और जाना है किसी चुनी हुई सरकार का हर एक कार्य उसकी जवाबदेही तय करता है, ठीक इसी तरह ना केवल सरकारी लोकपाल बिल अथवा किसी भी कानून के लिए केवल और केवल चुनी हुई सरकार की ही जवाबदेह बनती है। क्योंकि अपने कार्यकाल के बाद सरकार को फिर से जनता के समक्ष उपस्थित होना होता है ऑर इसी  में हमारे लोकतंत्र की मजबूती निहितार्थ है।

सोचिये अगर टीम अन्ना के द्वारा बनाया गया लोकपाल बिल सरकार को इस तरह मजबूर करके लागु हो भी जाता है तो आखिर इस बिल के लिए जवाबदेह कौन होगा? उसके दुष्परिणामों के लिए कौन ज़िम्मेदार होगा? अगर अत्यधिक अधिकार प्राप्त लोकपाल निरंकुश हो जाता है ऑर इस कारण देश में अस्थिरता का माहौल उत्पन्न होता है तो क्या टीम अन्ना उस स्थिति के लिए जवाबदेह हो सकती है? और अगर वह जवाबदेह नहीं हो सकते तो फिर लोकतंत्र के कान पर तमंचा रखकर अपने बिल को पास करवाने की धमकी कैसे दे सकती यह टीम?

आज के समय केवल तानाशाही अथवा लोकतंत्र के द्वारा ही भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है, तानाशाही के अच्छे-बुरे दोनों परिणाम हो सकते हैं। आमतौर पर बुरे परिणामों की ही संभावना अधिक रहती है। वहीँ लोकतंत्र जनता का आइना होता है, जैसी जनता वैसा शासन! इसलिए आज के युग में एकमात्र लोकतंत्र ही एक सही विकल्प नज़र आता है। ज़रूरत है चुनावों के द्वारा हर बार सुधार किया जाए, जनता में चुनावों के प्रयोग में जागरूकता लायी जाए, जिससे कि भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। अगर ऐसा हो जाए तो कोई भी राजनैतिक दल भ्रष्ठाचार फैलाते समय सौ नहीं बल्कि हज़ार बार सोचेगा, क्योंकि उसे पता होगा कि उसे फिर से जनता के समक्ष प्रस्तुत होना है ऑर अपने कार्यों का हिसाब-किताब देना है। लेकिन भ्रष्ठाचार-भ्रष्ठाचार चिल्लाने वाले यही लोग चुनाव के समय अपनी-अपनी पसंद की पार्टी के उम्मीदवार को ही वोट डालते नज़र आते हैं, चाहे प्रत्याशी कितना ही भ्रष्ठ क्यों ना हो!

जितने भी लोग भ्रष्ठाचार के विरुद्ध अलख जगाते दिखाई दे रहे हैं, यह सब के सब भ्रष्ठाचार के विरुद्ध नहीं अपितु भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता को भावनात्मक तरीके से एकत्र करके सरकार के विरुद्ध विद्रोह का अलख जगाने का प्रयास कर रहे हैं। वर्ना कोई अलोकतांत्रिक तरीके का समर्थन कैसे कर सकता है?

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जनता फांसे नेताओं को, नेता जनता को फांसे

जनता चाहती हैं  कि भ्रष्टाचारी नेताओं को लोकपाल जैसे सख्त कानून में फांस ले और नेताओं ने व्यवस्था ऐसी बना दी है जिसमें जनता खुद ही भ्रष्टाचारी बन रही है, जिससे वह मौज लेते रहे. 

देखिये कार्टून: 


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धार्मिक ठेकेदारो की दादागीरी

आजकल समाज में धर्म के कुछ ऐसे ठेकेदार घूम रहें हैं जिनका धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह लोग समाज पर अपनी दादागिरी दिखाने के लिए ना केवल धर्म का सहारा लेते हैं, बल्कि अपने अनैतिक कार्यों से धर्म को भी बदनाम करते हैं। अभी कुछ दिन पहले शबे-बारात नामक त्यौहार पर कुछ ऐसे ही हुड़दंगियों ने दिल्ली जैसे कई शहरों में कानून को अपनी बपौती समझते हुए रात भर सड़कों पर हंगामा किया। हज़ारों की तादाद में निकले इन युवकों को दंभ था कि पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है, क्योंकि वह यह सब धर्म के नाम पर कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ हो, बल्कि यह सिलसिला साल दर साल चलता आ रहा है।

अक्सर धर्मस्थलों में पूजा-अर्चना के नाम पर सड़कों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है। बात चाहे मंदिर के बाहर लगने वाली श्रद्धालुओं की लम्बी-लम्बी कतारों की हो या फिर मस्जिदों के बाहर नमाज़ अता करने वालों की, इस कार्य में सभी धर्मों के मानने वाले बराबर के शरीक हैं। कहीं आम जनता को यात्राओं, रैलियों अथवा झांकियों के नाम पर परेशान किया जाता है तो कभी बंद अथवा अनशन के नाम पर पुरे शहर को बंधक बना लिया जाता है। उनको इस बात से कुछ भी परवाह नहीं होती की सड़क पर चलने वाले सामान्य नागरिकों का भी उस सड़क पर उतना ही हक़ है!


अभी कुछ दिन पहले कांवड़ यात्रा के नाम पर दिल्ली और आसपास के इलाके में जमकर हुड़दंग मचाया गया। जहां से यह लोग निकल रहे थे वहां पड़ने वाली सिग्नल लाईट को बंद कर दिया जाता था, अगर कोई राहगीर बीच में आ जाता है तो उसको डंडे से मारकर सड़क से ज़बरदस्ती हटाया जाता है। एक जगह तो एक पुलिस अफसर के उपर डाक कांवड़ के नाम से चल रहे ट्रक पर बैठे हुड़दंगी युवकों ने दिनदहाड़े केवल इसलिए पानी डाल दिया गया क्योंकि वह उनके ट्रक के आने पर चैक से भीड़ को नहीं हटा पाया! जगह-जगह लगने वाले पंडाल के कारण रास्तों के बंद होने से जिन लोगो को ज़बरदस्त परेशानी का सामना करना पड़ा होगा, क्या वह इस देश के नागरिक नहीं है? क्या उनका इन सड़कों पर चलने और चैराहों पर अपनी बत्ती होने पर पार करने को कोई हक़ नहीं हैं? यहां तक कि हरिद्वार-दिल्ली राजमार्ग को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। हज़ारों-लाखों की तादाद में लोग नौकरी के लिए सहारनपुर, मुज़फ्फर नगर, मेरठ और मोदी नगर जैसी जगहों से गाज़ियाबाद, फरीदाबाद, दिल्ली और गुडगांव जैसे शहरों में आते हैं। क्या इन तथाकथित श्रद्धालुओं और सरकार ने कभी सोचा होगा कि रात को थकहार कर नौकरी से लौट रहे लोगों को घर पहुंचने में किस तरह भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा होगा? आखिर यह कैसा धर्म और हम कैसे धार्मिक हैं जहां नैतिकता का कोई स्थान नहीं है?

किसी भी धर्म का कोई भी अनुष्ठान अनैतिकता को बढ़ावा दे ही नहीं सकता है। ऐसी इबादत / पूजा का कोई अर्थ ही नहीं है जिस के कारण आम जनों को असुविधा हो, उनका हक छीना जाए। धर्म तो हमें समाज में जीने का तरीका बताता है, फिर यह समाज से जीने के हक छीनने का कारण कैसे बन सकता है? आज के युग में लोगों ने धर्म को केवल अपनी महत्त्वकांशाओं को पूरा करने का साधन बना लिया है, आज ऐसे लोगों और उनके कार्यों को पहचानने की आवश्यकत है।


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यह मूल लेख त्रुटिवश डिलीट हो गया था,  जबकि इसके विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ था. गूगल से प्राप्त  टिप्पणियों को नीचे लिखा जा रहा है:

14 comments:

नीरज जाट said...
शाह नवाज भाई, आपकी बातें जायज हैं। मैं खुद पांच बार कांवड ला चुका हूं। अब या तो इस देश के पढे लिखे लोग या सरकार यह कहे कि कांवड लाना ही बन्द कर दो। कोई क्यों नहीं कहता कि कांवड लाना धर्म विरुद्ध है, इससे कांवड ना लाने वाले अन्य लोगों को परेशानी होती है, इसलिये सडक बन्द करने की बजाय इस यात्रा को ही बन्द कर देना चाहिये। ऐसा करने से एक बार दंगा फसाद तो जरूर होगा लेकिन उसके बाद सदा के लिये शान्ति कायम हो जायेगी और सडकें भी बन्द करने की नौबत नहीं आयेगी। अब जब कांवड यात्रा बन्द करने की कोई नहीं कहता तो भईया, सडकें बन्द होनी तय हैं। गिने चुने दोपहिया वाहन या तथाकथित डाक कांवड वाहन भी अत्यधिक भीड के कारण ढंग से नहीं चल पाते तो बसें और ट्रक क्या चलेंगे। कभी कांवडिये यह फरमाइश नहीं रखते कि इस तारीख से इस तारीख तक सडक बन्द होनी चाहिये। वो तो सरकार ही इसे बन्द करती है। हां, मैं बता रहा था कि मैं पांच बार कांवड ला चुका हूं। जहां दस आदमी इकट्ठे होंगे तो उनमें हर तरह के आदमी होंगे फिर यहां तो संख्या लाखों में होती है। इनमें भी हर तरह के आदमी होते हैं। जहां कानून हाथ में लेने वाले लोग होते हैं तो कानून व्यवस्था बनाने वाले लोग भी होते हैं। अब हमें आवाज उठानी चाहिये कि यह यात्रा ही बन्द होनी चाहिये। इस यात्रा का प्रबल हिमायती होने के बावजूद भी मैं यह बात सच्चे मन से कह रहा हूं। तभी यात्रा के कारण होने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है। है कोई इस यात्रा को बन्द करने के लिये मेरे साथ आवाज उठाने वाला????
AlbelaKhatri.com said...
सचमुच यह चिन्ता का विषय है और इसका हल निकलना ही चाहिए.......... एक उम्दा पोस्ट और उतनी ही उम्दा नीरज जाट की टिप्पणी........मैं सहमत हूँ आप दोनों से जय हिन्द !
एस.एम.मासूम said...
शाहनवाज़ भाई आपने इस लेख़ को अच्छे मकसद से लिखा है यह मैं जानता हूँ. लेकिन पूर्णतया सहमत नहीं. क्या नेताओं कि यात्राएं इस श्रेणी मैं नहीं आती? ऐसी यात्राओं और सभाओं के लिए नियम है कि पहले से पुलिस स्टेशन मैं खबर करनी होती है और इजाज़त मिलने पे ही निकाली जाती है. यदि कोई सभा या यात्रा सरकारी इजाज़त ले के निकाली जा रही है तो इसमें अनैतिक क्या है? नमाज़ तो वैसे भी बिना इजाज़त किसी कि भी ज़मीन पे पढना चाहे वो सरकारी ही क्यों ना हो मना है.हाँ बिना इजाज़त सड़कों पे कि गयी नमाज़ या किसी भी धर्म का जुलूस सही नहीं और ऐसे जुलूसों मैं ज़रुरत से ज्यादा शोर मचाना, शराब पी के नाचना सही नहीं और इसको सरकार संभाल सकती है .जब बेशर्मी मोर्चे को ४०० पुलिस का प्रोटेक्शन मिल सकता है तो इन यात्राओं और सभाओं को क्यों नहीं? शाहनवाज़ भाई श्रधा के साथ निकले गए किसी भी जुलूस को ,यात्रा को ,जो सरकारी इजाज़त के बाद निकला हो हुडदंगियों का जुलूस कहना सही नहीं.
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
कमजोरी हमारे समाज और राजनैतिक व्यवस्था में है। इस देश में धर्म के नाम पर कोई भी ब्लेकमेल कर सकता है। निश्चित रूप से धर्म का दायरा व्यक्तिगत होना चाहिए। उस के सभी सार्वजनिक प्रदर्शन प्रतिबंधित होना चाहिए।
डॉ टी एस दराल said...
हमारा समाज धर्मभीरु लोगों से भरा पड़ा है भाई । और सबसे आगे होते हैं नेता । अब कौन किसको रोकेगा ?
सतीश सक्सेना said...
अफ़सोसजनक है यह, धर्म के नाम पर नंगा नाच और हम सब बुजदिलों की तरह देखते रह जाते हैं ! प्रशासन और आम पब्लिक किसी को भी इस भीड़चाल में, बोलने की परमीशन नहीं है ! मीडिया चटपटी ख़बरों को और तेज बना कर केवल हाथ सेंकती है ! इस बुजदिल और मूर्खता पूर्ण माहौल में एक ही रास्ता नज़र आता है कि हम लोग भी इस हुडदंग में शामिल हो जाएँ और तालियाँ बजाएं ! बेहद खेदजनक माहौल है ....लोकतंत्र खलने लगा है ! शुभकामनायें आपको !
DR. ANWER JAMAL said...
सदाचार का विपरीत है भ्रष्टाचार। सदाचार होता है धार्मिक और भ्रष्टाचार होता है अधार्मिक। यह एक बारीक अंतर है जिसे धर्म को जानने वाला ही समझ सकता है। धर्म के नाम पर अधर्म करने से वह अधर्म धार्मिक कार्य नहीं हो जाता चाहे दुनिया उसे धार्मिक कार्य मानने लगे। कई बार लोग घबराते हैं अधर्म के कार्यों से और छोड़ बैठते हैं धर्म को। अधर्म प्रायः स्वभाव से ही अप्रिय लगता है जबकि धर्म प्रिय । इस लफ़्ज़ को तत्काल सुधार लिया जाय !
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...
best
Kajal Kumar said...
धर्म एक धंधा हो गया है...
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...
आज धार्मिक आयोजनों में भक्ति कम और दिखावा ज्‍यादा होता है। इनके सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगाई जानी चाहिए। ------ कम्‍प्‍यूटर से तेज़! इस दर्द की दवा क्‍या है....
Khushdeep Sehgal said...
देखो ओ दीवानों तुम ये काम न करो. धर्म का नाम बदनाम न करो... धर्म कोई भी हो ये इजाज़त कभी नहीं देता कि दूसरों को परेशान किया जाए...सियासत ने इसे ज़रूर अफ़ीम की गोली बनाकर बंटाधार कर दिया... जय हिंद...
Tarkeshwar Giri said...
बहुत ही सुन्दर लेख, और उससे भी सुन्दर टिप्पड़ियाँ. मेरे हिसाब से कुछ हद तक में भईया जाट महोदय से सहमत हूँ. पूरी तरह से ना सही लेकिन डाक कांवड़ और बाइक से कांवड़ लाने वालो को तो जरुर. रोक देना चाहिए. जंहा डाक कांवड़ लाने वाले अपनी दादागिरी दिखाने से पीछे नहीं हट ते वोंही बाइक सवार ईस तरह से बाइक चलाते हैं जैसे वो किसी रेस में भाग ले रहे हों. हरिद्वार प्रशासन पूरी तरह से डाक और बाइक कांवड़ को सम्भालने में लग जाता हैं और जब मौका मिलता हैं तो डाक कांवड़ लाने वालो को दौड़ा- दौड़ा के पीटता भी हैं डाक कांवड़ में इस्तेमाल किये जाने वाले टेम्पो चालक ईस कदर से गाड़ी भागते हैं मानो वो मायावती के काफिले के मंझे हुए चालक हो. .
anshumala said...
राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है वरना इन सब चीजो पर नियंत्रण करना इतने भी मुश्किल नहीं है और राजनीतिक इच्छा शक्ति इसलिए कम है क्योकि यहाँ हर चीज को वोट बैंक के तराजू में तौल कर देखा जाता है धर्म तो सबसे ऊपर है | हा जब सरकार पर आती है तब वो किसी चीज को नहीं देखती है |
चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...
यह दादागिरी त्योहारों के समय अधिक मुखर हो जाती है, शायद सड़क चलने में भी बाधा बने :(

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उसने बख्श दी आँखे - हैवानियत को तमाचा

ईरान में रहने वाली अमीना बहरामी नामक युवती ने कोर्ट के द्वारा अदालत में 7 साल लम्बी जद्दोजहद के बाद इन्साफ मिलने पर मुजरिम माजिद की आँखों में तेज़ाब डालने की सज़ा को बख्श कर उसकी हैवानियत के मुंह पर तमाचा मारा है. हालाँकि माजिद को सामान्य कानून के अनुसार 10 वर्ष की सज़ा भी हुई है. अपने इस फैसले से अमीना ने दिखा दिया कि कमज़ोर दिखने वाली औरत कमज़ोर होती नहीं, बल्कि अपने आप को मज़बूत समझने वाले मर्दों के मुकाबले ज़हनी तौर पर कई गुना मज़बूत होती है.

वर्ष 2004 में माजिद ने अमीना के मुंह पर केवल इसलिए तेज़ाब फेंक दिया था क्योंकि अमीना ने उसके शादी के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था. अमीना ने अपने चेहरे को ठीक करने के लिए दुनिया के कई मुल्कों के चिकित्सकों से संपर्क किया, लेकिन सभी जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी थी. उस एक लम्हे ने अमीना की ज़िन्दगी को नरक बना दिया था, जब वह घर से बाहर निकलती थी तो लोग उसे देखकर डर जाते थे. वह एक-एक लम्हा उसी दुःख के साथ जीने को मजबूर थी, अमीना ने फैसला किया अपने ऊपर हुए ज़ुल्म का बदला लेने का. उसने अदालत से गुहार लगाईं कि जिसने उसे पल-पल मरने पर मजबूर किया उसको वैसे ही सजा दी जाए. ईरान की अदालत ने उसकी बात को मानते हुए माजिद को दोनों आँखों में एक-एक बूँद तेज़ाब डालने का हुक्म दिया तथा इस सज़ा को वहां की सर्वोच्च अदालत ने भी बरकरार रखा. 
 
लेकिन इस फैसले के बाद अमीना ने विरोध करने वालों पर तथा माजिद जैसी हैवानियत वाली मानसिकता रखने वालों पर उसकी सज़ा को बख्श कर ऐसा खामोश तमाचा जड़ दिया, जिसकी गूँज काफी दिनों तक महसूस होती रहेगी. उसने कहा कि बदला लेना उसका मकसद नहीं था और ना ही कभी उसकी मंशा माजिद की आंखे छीनने की रही थी. बल्कि वह चाहती थी कि माजिद को यह सज़ा सुनाई जाए, ताकि उसको भी उस दुःख का एहसास हो जो कि उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुका है.  
कुछ लोगो ने इस सजा को क्रूरता का दर्जा दिया था, मैं उन लोगो से मालूम करना चाहता हूँ कि आखिर सजा को क्षमा अथवा कम करने का नैतिक हक भुक्त-भोगी के सिवा किसी और को कैसे हो सकता है? क्या भुक्त-भोगी के सिवा कोई और इंसान इस जैसी अनेकों महिलाओं के एक-एक पल को महसूस कर सकता है? इसलिए मेरे विचार से तो अदालत का कार्य ऐसे खौफनाक जुर्म की वैसी ही सज़ा देना होना चाहिए.

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