
है आज समय जागने का
है आज समय जागने का,
सो रहे हो आज क्यूँ?
गर हौसलों में दम नहीं तो
जी रहे हो आज क्यूँ?
हो रही मुल्क की दुर्गति,
सब कह रहे हैं प्रगति।
है यही अगर प्रर्गति तो
रो रहे हो आज क्यूँ?
धोखाधड़ी में लीन सब,
है लूटना ही दीन अब।
सब उंगलियां है सामने,
खुद किया क्या है आपने?
है लूटना ही दीन तो
बैचेन फिर हो आज क्यूँ?
हर ओर भ्रष्टाचार है,
सबका यही विचार है।
गर हुए गम से त्रस्त हम,
फिर खुद हुए क्यों भ्रष्ट हम।
है गम का यही सबब तो
गम पी रहे हो आज क्यूँ?
जहां दुकानें है धर्म की,
क्या कीमत होगी कर्म की?
यह मर्म ही पता नहीं,
खुश हो रहे हो आज क्यूँ?
है आज समय जागने का...
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