धर्मपत्नी की महिमा

भय्या पत्नी की भी अजीब ही महिमा है। पता है कि आप कार्यालय में हैं, अब रोज़ ही जाते हैं तो वहीं होंगे। लेकिन श्रीमती जी का फोन पर एक ही सवाल होता है ‘कहां हो?’। अब बन्दा परेशान! हम भी चुटकी लेने के लिए बोल देते हैं कि ‘झुमरी तलैय्या में’! तो भड़क जाती हैं, ‘सीधे-सीधे नहीं कह सकते कि ऑफिस में हो’। अब श्रीमती जी जब पता ही था तो मालूम क्यों कर रही थी? लेकिन इतनी हिम्मत किसकी है कि यह मालूम कर ले?

श्रीमती जी की सबसे पंसदीदा चीज़ होती है शापिंग। अब शापिंग तो शापिंग है, ज़रूरत हो या ना हो लेकिन करनी है तो करनी है। उस पर तुर्रा यह कि इतनी महंगी वस्तु इतनी सस्ती ले आई। दुकानदार से दाम तय करने की भी अलग ही अदा होती है। पता नहीं श्रीमती जी दुकानदार को बेवकूफ बनाती हैं या दुकानदार श्रीमती जी को? लेकिन कटता तो बेचारा पति ही है।

थके हारे घर वापिस आए और आते ही आपके हाथ में चाय की प्याली आ गई तो समझो मामला गड़बड़ है। रोज़ तो चाय के लिए कहते-कहते थक जाते हैं, उस पर ज्यादा आवाज़ लगा ली तो सवाल ‘खुद क्यों नहीं बना लेते, देखते नहीं कितनी व्यस्त हूँ आपके बच्चों में’। ‘मेंरे बच्चे!’ मतलब अब यह बच्चे केवल मेरे हो गए। वैसे पत्नी के साथ छोटा तो कुछ होता ही नहीं है, चप्पल की ऐड़ी भी टूट गई तो समझो बड़ा नुकसान है। रास्ते में श्रीमती जी अपनी चप्पल तुड़वा बैठी, तो हमारे मूंह से निकल गया कि देख कर चल लेती। बस फिर क्या था ‘सस्ती चप्पलें दिलवाओगे तो यही होगा ना? इन्हे तो बस यही पसंद है कि रात-दिन घर में खपते रहो और कुछ मांगो मत। कहा था किसी अच्छे ब्राण्ड की दिलवा दो, लेकिन फर्क किसे पड़ता है? रास्ते में परेशान तो मैं हो रही हूँ ना।’ हम भी तपाक से बोले ‘लेकिन यह तुमने अपनी मर्ज़ी से ही तो खरीदी थी।’ जैसी दुकान पर ले जाओगे तो वैसी ही चप्पले खरीदूंगी ना।’ हमने मालूम किया ’लेकिन तुमने हमसे कब कहा था नई चप्पलों के लिए’? झट से बोली ‘तुम सुनते ही कब हो मेरी बात?

रास्ते में एक लड़की हमें देख रही थी, अब किसी की आंखे तो बंद कर नहीं सकते। परेशानी की बात यह हो गई कि श्रीमती जी ने उसे हमें देखते हुए देख लिया। वैसे अन्दर की बात तो यह है कि आप यमराज को तो मना सकते हैं लेकिन रूठी हुई पत्नी को मनाना नामुमकिन है! बात पत्नी की हो और सास का ज़िक्र ना आए? ‘सास’ नाम सुनते ही पत्नी एकदम से बहु बन जाती है। सास के सामने तो माँ जी, माँ जी, लेकिन पति के सामने बात ‘तुम्हारी माँ जी’ पर आ जाती है। अजीब रिश्ता है भय्या, एक-दूसरे को देखकर तेवर बदलना कोई समझ ही नहीं पाया है।

अंत में बस आपसे यही प्रार्थना है कि यह सब बाते मेंरी पत्नी को मत बताना, वर्ना!

- शाहनवाज़ सिद्दीकी


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Critics, Vyang, Wife, धर्मपत्नी, पत्नी

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विरोध का तरीका कैसा होना चाहिए?

विरोध करने के लिए विरोध करना भी आना चाहिए। अगर किसी को लगता है कि कोई बात गलत है, तो हो-हल्ला मचाने से पूर्व सबसे पहले उसके बारें में पूरी जानकारी हासिल करना चाहिए। इससे कई बातें सामने आ सकती हैं। जैसे कि:

1. हो सकता है कि जो हम सोच रहे हैं, वह बात बिलकुल वैसी ही निकले।

2. इस बात की भी पूरी संभावना है कि जो हम सोच रहे हैं, बात वैसी नहीं हो।

3. हर बात के अच्छे और बुरे पहलु हो सकते हैं, क्योंकि समय और समझ के हिसाब से हर बात का अलग महत्त्व होता है।

4. विरोधियों की और समर्थन करने वालो की बातों पर एकदम से पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए. क्योंकि विरोधी अक्सर अच्छी बातों का भी विरोध करते हैं, वहीँ समर्थक बुरी बातों का भी समर्थन करते हैं।

5. बल्कि सही रास्ता तो यही है, कि विरोधियों और समर्थकों की बातों का तथा सम्बंधित विषय का पूरी तरह से अध्यन करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए।

6. सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है, कि सिक्के का एक ही पहलु देखने की जगह बात अगर किसी से सम्बंधित है तो उसके विचारों का भी अध्यन करना चाहिए।


- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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मौसमी इश्क




मौसमी इश्क़ है, मौसम के बाद क्या होगा,
हर चेहरे पर नया चेहरा चढ़ा होगा।


मौज साहिल से आकर मिलती है,
इसके बाद उसको बिछुड़ना होगा।

हर कहानी कहीं ख़तम होगी,
फिर नया एक फलसफ़ा होगा।

मेरा सातो जनम का साथी वोह,
ग़ैर की बाहों में खड़ा होगा।

हमको कहता है हमसफर जो अभी,
रहज़नी में वही लगा होगा।

जिससे उम्मीद-ए-हिफाज़त की है,
वहीं ताने हुए कमां होगा।

बड़ा माक़ूल समां है सनम के मिलने तक,
बदला-बदला यह फिर जहां होगा।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'



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Ghazal, Urdu, Gazal, hindi, poem

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कुछ खुशियाँ बेकरार सी हैं




मायूस शब
ढलने के बाद,
ढेरों आशाएं
समेटे हुए,
नई सहर
इंतज़ार में हैं।


अपने जोश को
समेट कर रखिए,
इस्तक़बाल के लिए
कुछ खुशियाँ
बेकरार सी हैं।

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चर्चा-ए-ब्लॉगवाणी

















चर्चा-ए-ब्लॉगवाणी
बड़ी दूर तक गया।
लगता है जैसे अपना
कोई छूट सा गया।

कल 'ख्वाहिशे ऐसी' ने
ख्वाहिश छीन ली सबकी।
लेख मेरा हॉट होगा
दे दूंगा सबको पटकी।

सपना हमारा आज
फिर यह टूट गया है।
उदास हैं हम
मौका हमसे छूट गया है।

आओ किसी ओझा-पंडित
को दिखाएँ हम,
यह हो न सके तो
वैद्य को ही बुलाएं हम।

इसके बिना दिन-रात
कैसे चैन आएगा?
ब्लॉग चर्चाओं का चर्चा
ग़ुम हो जाएगा?

हुआ पेट में है दर्द
कैसे हाज़मा करें?
कैसे हो अब तमाशा
किसे अब जमा करें?

लिख तो दिया है 'ब्लॉग'
पर किसको दिखाएँगे?
छुट्टी पर गई वाणी को
कैसे मनाएँगे?

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'


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Blogvani, ब्लागवाणी, शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'

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उनके कहने पे हम


उनके कहने पे हम, शोलों में भी रह लेते हैं।
बात फूलों की क्या, काँटों को भी सह लेते हैं।

उसने देखी कहाँ है अभी तिश्नगी मेरी,
उसकी खातिर तो हम, मर के भी जी लेते हैं।

काश देखें कभी वो फटा सा दामन मेरा,
क्योंकि हम जिगर तो उस वक़्त ही सी लेते हैं।

उनको आता नहीं है मखमली चादर पे भी चैन,
हम तो तपती हुई धरती पे भी सो लेते हैं।

गर एक बार वो घूँघट जो खोल दे अपना,
सरापा इश्क में मदहोश से हो लेते हैं।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'




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ख़त्म हो गई इन्साफ की आस

आज सुबह तकरीबन आठ बजे इकराम गनी ने अपने जीवन की आखिरी सांसे ली, अल्लाह उनको जन्नत नसीब करे। इकराम गनी के बारे में मैंने अपने लेख "आखिर संवेदनशीलता क्यों समाप्त हो रही है?" तथा "एक बेहोश व्यक्ति की जीवन के लिए जद्दोजहद" में बताया था।

वह पिछले दो महीने से बेहोश थे तथा पिछले एक महीने से दिल्ली के जी. बी. पन्त अस्पताल में ज़िन्दगी की जंग लड़ रहे थे। मुरादाबाद से दिल्ली लाने की बाद उन्हें बत्रा अस्पताल में भर्ती कराया गया था, क्योंकि किसी भी सरकारी अस्पताल ने उन्हें भर्ती नहीं किया था। जब रिश्तेदारों के पास पैसों की तंगी आ गई और उनकी पत्नी और 3 छोटे-छोटे बच्चो पर 10 लाख रूपये इलाज में क़र्ज़ हो गया तो उनको एक छोटे अस्पताल (खदीजा नेशनल अस्पताल) में भर्ती करना पड़ा था। फिर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से रात-दिन एक करके उनको जी. बी. पन्त अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इतने दिनों में एक बार भी पुलिस का कोई कारिन्दा इनकी खैर-खबर के लिए नहीं आया। दर असल इनकी दुर्घटना एक न्यायधीश साहिबा की कार से हुई थी, इसलिए उसके रुतबे के दबाव के कारण पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की। यहाँ तक कि मीडिया ने भी न्यायधीश साहिबा के रुतबे के कारण कुछ नहीं लिखा (दैनिक जागरण को छोड़कर, जिसने एक बार मुरादाबाद संस्करण में तथा दो बार राष्ट्रिय संस्करण में उनके बारे में लेख छपा था)।

दिल्ली से तबादला हो कर आई एक न्यायाधीश साहिबा की सेंट्रो कार से बैंक से पैसे निकाल कर आ रहे इकराम गनी बुरी तरह घायल हो गए थे। इसे माननीय न्यायधीश की लापरवाही कहें या फिर अपने रुतबे के दंभ में कानून को ठेंगा दिखाने की बड़े लोगो की फितरत, जिसके चलते न्यायधीश साहिबा ने बिना यह देखे की कोई मोटर साईकिल सवार भी बराबर से गुजर रहा है अपनी सेंट्रो कार को सड़क के बीच में रोका और कार का दरवाज़ा खोल दिया। जिससे टकराकर इकराम गनी बीच सड़क में गिरकर बुरी तरह घायल हो गए थे। उसके एक पैर की हड्डी बुरी तरह टूट गई थी और सर की हड्डी मस्तिष्क में जा घुसी थी। इतना होने पर जब लोगो की भीड़ इकट्ठी हो गई और कानून की तथाकथित रक्षक को लगा की बात बिगड़ सकती है, तो आनन-फानन में उसे पास के सरकारी अस्पताल के बहार छोड़ कर चलती बनी थी। इसके बाद उन्होंने कभी यह देखने की भी कोशिश नहीं की आखिर इतना महंगा इलाज इकराम गई की पत्नी और तीन छोटे-छोटे बच्चे कैसे करा रहे हैं।

इसे कुदरत की मार कहें या एक रुतबे के दंभ का परिणाम, इकराम गनी इन्साफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते ज़िन्दगी की जंग हार गए। आखिर उनकी पत्नी और बच्चे कैसे अपना भरण पोषण करेंगे और कैसे इतना बड़ा कर्जा उतरेंगे? क्या न्यायधीश साहिबा का कुछ फ़र्ज़ नहीं है? क्या यही इंसानियत है? क्या इकराम गनी को इन्साफ मिलेगा? या रुतबे और पैसे के आगे आज एक बार फिर इन्साफ हार जाएगा?



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Ikram Ghani, दुर्घटनाएँ, संवेदनहीनता

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फुटपाथ पर होती दुर्घटनाएँ

आज पूरी दुनिया उपभोक्तावाद की दौड़ में अंधी होती जा रही है। इस दौड़ में आज इन्सान को यह भी देखने की फुरसत नहीं है कि ज़िंदगी कितनी सस्ती हो गई है। महानगरों की चकाचैंध में गरीबी और गरीबों के लिए तो जगह पहले भी नहीं थी, अब हालात और भी बदतर होते जा रहे हैं। सरकार की गलत नीतियों के कारण रोज़गार का संतुलन बिगड़ा हुआ है। गावों तथा दूरदराज़ के शहरों में रोज़गार के अवसर सीमित होने के कारण अक्सर लोग बड़े शहरों की ओर रूख करते हैं। इससे एक ओर शहरी आबादी का संतुलन बिगड़ रहा है, वहीं हालात यह हैं कि कई लोगों को सोते समय छत भी नसीब नहीं होती है। ऐसे में लोगो को खुला आसमान ही छत नज़र आता है और वह फुटपाथ को ही अपना बिस्तर बना लेते हैं। रात्रि में अक्सर यह लोग तेज़ी से निकलने वाले वाहनों की चपेट में आ जाते हैं। शराब पी कर महंगी गाड़ियां में घूमने वाले लोगों का नशा रूतबा और पैसा और भी ज़यादा बढ़ा देता है और इस नशें में वह अपने वाहनों पर कंट्रोल नहीं कर पाते हैं। अक्सर ट्रक डाइवर भी लापरवाही तथा नशे की हालत में फुटपाथ के पत्थर और उस पर सोये इंसानों में फर्क नहीं कर पाते हैं। वहीं दुर्घटनावश भी गाड़ियां फुटपाथ पर चढ़ जाती हैं, जिससे वहां सोए लोग दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। आज कल ऐसी दुर्घटनाओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में रात को चलने वाले मेट्रो रेल के कार्य से भी रात्रि दुर्घटनाओं की संख्या बहुत अधिक बढ़ गई है। अभी कुछ दिन पहले मुंडका की मेट्रो साईट पर एक ढंपर चालक को फुटपाथ पर सोते हुए मज़दूर नज़र ही नहीं आए थे और वह उनपर मिट्टी डाल कर चलता बना था, जिससे दो मज़दूरों की मृत्यू हो गई थी।

सरकार के द्वारा ऐसे लोगो के लिए किए गए सोने के इंतज़ाम ना के बराबर हैं, वहीं समाज सेवा में लगे एनजीओ को रूख भी इस समस्या की ओर से रूखा है। फटपाथ पर अक्सर रिक्शा माफिया का भी कब्ज़ा रहता है, वह लोग फुटपाथ को रिक्शा खड़ा करने की जगह में तबदील कर देते हैं। ऐसे में किराए पर रिक्शा चलाने वाले मज़दूर भी वहीं बसेरा बना लेते हैं। अक्सर लोग शराब पीकर भी नशे की हालत में फुटपाथ पर पड़े रहते हैं। ऐसे लोगो के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होती भी है तो केवल खाना पूर्ती के लिए। सरकार का सबसे पहला कार्य तो यह होना चाहिए कि फुटपाथ पर सोने से लोगो को रोका जाए। इस तरह की दुर्घटना से बचने के लिए कानून का सख्ती से पालन होना आवश्यक है।

कुदरत ने जीवनरूपी जो वरदान दिया है, उसे ज़रा सी लापरवाही के कारण ज़ाया नहीं होना चाहिए। लोगों की जान बचाने के लिए इस विषय पर सुरक्षा ऐजेंसियों के साथ-साथ समाज को भी गम्भीरता से विचार करना होगा। एक तरफ सुरक्षा ऐजेंसियों को शिकायत आने का इंतज़ार किए बिना ही कदम उठाना चाहिए, वहीं समाज के द्वारा भी ऐसी दुर्घटनाओं से बचाव के लिए सुरक्षा ऐजेंसियों के साथ ताल-मेल बैठाना आवश्यक है।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी



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accident, Foothpath, sleeping, दुर्घटनाएँ, फुटपाथ

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सहनशीलता की ताकत: मौलाना वहीदुद्दीन - 2

सहनशीलता और असहनशीलता को हर जगह लागु किया जा सकता है, बात चाहे वृहत परिप्रेक्ष में हो अथवा घर की। अक्सर तलाक के कारण घर टूट जाते हैं, हालाँकि अल्लाह (ईश्वर) ने तलाक को एक बदतरीन कार्य बताया है और इसलिए इसका उपयोग आखिरी हल के तौर पर करना चाहिए। यह नहीं कि अगर पति-पत्नी में झगडा हो जाए तो फ़ौरन 3 बार तलाक दे दिया जाए। गुस्सा तो इस्लाम में हाराम करार दिया गया है, क्योंकि यह प्राकृतिक प्रक्रिया को पूरा नहीं होने देता। इसलिए एक-एक महिना करके 3 महीने मैं 3 बार तलाक दिया जाना उत्तम विधि है। जब हम गुस्से होने के बाद सो जाते हैं तो सुबह तक प्रकृति स्थिति को सामान्य बना देती है। अगर इस विधि को अपनाया जाए तो तलाक होगी ही नहीं।

सहनशीलता सारी कामयाबियों की कुंजी है, जब कोई व्यक्ति सहनशीलता धारण करता है तो सारी प्राकृतिक शक्तियां उसकी सहायता करना शुरू कर देती है। वहीँ असहनशीलता अर्थात बेसब्री स्थिति को सामान्य करने की प्राकृतिक प्रक्रिया को समाप्त कर देती है।

इसको समझने के लिए कुछ उदहारण लेते हैं। पहला उदहारण 610 AD का है जब मुहम्मद (स.) को खुदा (ईश्वर) की तरफ से ईशदूत बनाया गया, तो उन्होंने समझाया कि अगर कहीं आस्था में विरोधाभास के चलते उत्पन्न विरोधाभास में भी सहनशीलता का दामन थामे रखना चाहिए। एक ईश्वर की आराधना के लिए ईशदूत अब्राहम (अ.) द्वारा बनाया गए 'काबा शरीफ' में समय के साथ बदलाव आने से लोगो ने 360 मूर्तियाँ रख दी थी। लेकिन इस पर रसूल अल्लाह (मुहम्मद स.) भड़के नहीं बल्कि उन्होंने सब्र से काम लिया, दूसरी तरफ 1949 में बाबरी मस्जिद में 3 मूर्तियाँ रखे जाने से मुसलमान भड़क गए, पूरी दुनिया में हंगामा किया। कुरआन में आयत (श्लोक) उतरी कि (अर्थ की व्याख्या) "अपने आप को पाक करो", कुरआन ने यह नहीं कहा कि काबा को पाक करो, बल्कि कहा गया कि अपने आप को पाक करो। अब दोनों स्थितियों को तुलना करके देखिये, हमारे देश के मुसलमानों के हंगामे का परिणाम यह निकला कि आपस में ज़िद्द, तनाव, टकराव इतना बढ़ा, ज़िद्द की ऐसी राजनिति हुई कि बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गयी। रसूल अल्लाह ने मूर्तियों को कुछ भी नहीं किया, तो एक समय आया कि काबा शरीफ को लोगो ने स्वयं ही एक ईश्वर की उपासना के लिए पाक कर दिया। सब्र और बेसब्री का फर्क आप स्वयं देख सकते हैं।

जब दूसरा विश्व युद्ध हुआ तो 1945 में अमेरिका ने जापान पर एटम बम गिरा दिया तो जापान को झुकना पड़ा। वहां एक जज़ीरा है ओकिनावा जो कि 1200 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है, उस पर अमेरिका ने कब्ज़ा कर लिया। अब जापान के दो लक्ष थे, एक था जापान का पुन:निर्माण और ओकिनावा की आजादी। इस पर उन्होंने सहनशीलता दिखाई, और शिक्षा के द्वारा अपने आप को मज़बूत करने के लिए 30 साल की शिक्षा की योजना बनाई और ओकिनावा को वैसे ही छोड़ दिया। 30 साल में जापान दुनिया की आर्थिक ताकत बन गया और अमेरिका ने स्वयं 1972 में ओकिनावा को वापिस जापान को दे दिया।

सद्दाम हुसैन ने असहनशीलता दिखाते हुए कुवैत पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया तब सारे मुस्लिम जगत ने उसका समर्थन किया, हालाँकि इस्लाम के एतबार से यह एक गलत कदम था। इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप अमेरिका सहित बहुत से देशो ने उस पर हमला कर दिया और अंत में सद्दाम हुसैन से मांग की गई की वह अपनी गद्दी छोड़ कर लोकतान्त्रिक तरीके से इराक की सरकार बनने दे। हालात के मुताबिक सद्दाम हुसैन को सहनशीलता दिखाते हुए अमेरिका की मांग को मान लेना चाहिए था। उसके पास 8 बड़े महल थे, अगर वह अपने महलों में बड़े-बड़े शिक्षण संसथान खोल देता तो वहां की जनता को कितना फायदा होता। साथ ही साथ उसके इस तरह के प्रयास के कारण लोग उसे चुनकर दोबारा इराक की सत्ता सौंप देते। लेकिन असहनशीलता दिखने का नुक्सान यह हुआ कि उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा, बाद में उसे फंसी की सजा हुई तथा इराक को भी कितना भरी नुक्सान उठाना पड़ा।

मौलाना वहीदुद्दीन के व्याख्यान को ऑनलाइन सुनने के लिए http://www.cpsglobal.org/content/6th-june’2010-sunday-urdu-060510-1105pm पर चटका लगा कर सुनिए।


- शाहनवाज सिद्दीकी


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Power of Patience: सहनशीलता की ताकत - मौलाना वहीदुद्दीन खान
 
Importance of Patience: दिल्ली का ब्लॉगर मिलन और सहनशीलता का महत्व


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Power of Patience, Maulana Vahiduddin Khan

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सहनशीलता की ताकत - मौलाना वहीदुद्दीन खान

अपने ब्लॉग 'प्रेम रस' पर मैंने रविवार, दिनांक 6 जून को हुए ब्लॉगर मिलन के बारे में बताया। इस लेख में मौलाना वहीदुद्दीन खान के व्याखान बारे में:

सब्र का मतलब होता है बर्दाश्त करना, कुछ लोग समझते हैं कि 'बर्दाश्त करना बुज़दिली है' लेकिन यह नासमझी की बात है, सब्र सबसे बड़ी ताकत है। कुरान में एक आयात है (अर्थ की व्याख्या) "खुदा सब्र वालो का साथ देता है, जो दुनिया में सहनशीलता के साथ रहते हैं"। यही बात हदीस (मुहम्मद स. के कथन) में इस तरह कही गई है कि "जान लो कि कामयाबी सहनशीलता के साथ है और मुश्किल के साथ आसानी है"। यह फिलोसफी कोई धार्मिक फिलोसफी नहीं है बल्कि यह कुदरत के नियम पर आधारित है. दुनिया में बड़ी कामयाबी केवल उनको ही मिली है, जिन्होंने सब्र का साथ दिया है।

न्यूटन आधुनिक विज्ञान का ज्ञाता कहा जाता है। उसकी मृत्यु 1727 में हुई थी, जब वह छोटा था तो ईधर-उधर चुप-चाप खड़ा रहता था, बाद में मालूम हुआ की उसके पास एकाग्रता की बहुत बड़ी ताकत थी। एकाग्रता अर्थात किसी एक बिंदु पर पहुँच कर विचार करना, यह सब्र के बिना नहीं हो सकता है। अगर आप 101 चीज़ों से सब्र करते हैं, तभी एकाग्र रह सकते हैं। न्यूटन ने बताया कि उसके अन्दर विश्व से अलग कोई ख़ास चीज़ नहीं है, एक ही बात है कि बहुत ही सहनशीलता के साथ किसी बात पर विचार करना। एक महिला ने बातचीत में कहा कि उसका बच्चा बहुत रोता है, अगर वह महिला बच्चे के रोने में सब्र करे तो बच्चे को बहुत बड़ा फायदा हो सकता है। छोटा बच्चा व्यायाम तो कर नहीं सकता, लेकिन उसके रोने से, हाथ-पैर मारने से उसके शरीर की कसरत होती है।

सहनशीलता सारी कामयाबियों की कुंजी है, जब कोई व्यक्ति सहनशीलता धारण करता है तो सारी प्राकृतिक शक्तियां उसकी सहायता करना शुरू कर देती है। अगर किसी व्यक्ति को चोट लग जाती है तो अगर आप सब्र करें, उसे ज़बरदस्ती दबाएँ नहीं तो सारा शरीर उसे ठीक करने में लग जाता है। कुदरत उसको ठीक करने के लिए आ जाती है। जब भी किसी का कोई काम बिगड़े तो वह भड़क ना उठे, बेसब्री ना दिखाए तो कुदरत उसकी सहायता करती है। यह बात हर जगह लागु होती है, जैसे कि अगर घर में पत्नी से झगडा हो जाए तो यह नहीं कि उसे तलाक दे दें, बल्कि चुपचाप सो जाएँ। केवल पत्नी ही नहीं बल्कि किसी से भी झगडे की अवस्था में सहनशीलता अपनाते हुए रात को सो जाना सबसे बेहतर उपाय है. सुबह उठेंगे तो दोनों पक्ष सामान्य होंगे। यह कुदरत का नियम है, जब किसी के मस्तिष्क में कोई नकारात्मक सोच आती है तो कुदरत रात्रि में सोच को सकारात्मक बनाना शुरू कर देती है, और यह काम नींद में होता है। यह साइकोलोजी से भी मालूम होता है, कि मस्तिष्क सोने पर भी सक्रीय रहता है, वह नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदल देता है।

पकिस्तान के कश्मीर के मस`अले पर हमारे मुल्क से इख्तेलाफ थे, लेकिन उसने सहनशीलता से काम नहीं लिया और बेसब्री और गुस्से में अँधा होकर युद्ध की घोषणा कर दी, चार-चार युद्धों में बुरी तरह मात खाने की बाद भी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ. हालाँकि अगर सब्र से काम लेता और ठन्डे दिमाग से सोचता तो होना यह चाहिए था कि इख्तेलाफ को मेज़ पर बातचीत पर हल करने के लिए कोशिश करते तथा हमारे साथ सांस्कृतिक तथा व्यापारिक रिश्ते बनाते. इससे दोनों देशों को कितना फायदा होता? दोनों देशों में कितनी समृद्धि आती? उनकी बेवकूफी का आलम यह है कि आज उनके बिलकुल बराबर में अर्थात हमारे पास कोयले के भण्डार है और वह आस्ट्रेलिया से कोयला आयात करते हैं. उनकी बेसब्री का फल यह निकला कि आज पाकिस्तान एक असफल देश करार दिया जाता है.



बाकी अगले लेख में......  - शाहनवाज़ सिद्दीकी


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Maulana Vahiduddin Khan, Power of Patience, मौलाना वहीदुद्दीन खान, सहनशीलता

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ब्लॉगर मिलन और सहनशीलता का महत्व

रविवार का दिन ब्लॉग जगत में महत्वपूर्ण सुबह लेकर आया था। देर रात्रि को डॉ अनवर जमाल का फोन आया तो पता चला कि उन्होने श्री तारकेश्वर गिरी के साथ मिलकर अध्यात्म की एक खास हस्ती मौलाना वहीदुद्दीन का व्याख्यान सुनने का प्रोगाम बनाया है। वह चाहते थे मैं भी उनके साथ चलूं, अपने ब्लॉग पर तो वह पहले ही निमंत्रण दे चुके थे। मैने सहर्ष उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। जब शाहदरा स्टेशन लेने के लिए पहुंचा तो डॉ अयाज़ खड़े हुए नज़र आए, वहीं कुछ दूर पर बस से आए डॉ अनवर जमाल भी खड़े हुए नज़र आए, मैं उन्हे दूर से देखकर ही पहचान गया। एक अन्य ब्लागर बन्धु मास्टर अनवार साहब भी डॉ अनवर जमाल के साथ आए थे, रास्ते में श्री तारकेश्वर गिरी भी मिल गए। दो विचारधाराओं का इस तरह प्रेम से मिलना एक अद्भुद अनुभव था। तारकेश्वर जी के कहने पर मैने अपनी गाड़ी वहीं छोड़ी और हम सब उनकी गाड़ी में बैठ गए। फिर हमने मौलाना वहीदुद्दीन के व्याख्यान के आयोजन स्थल 1, निज़ामुद्दीन वेस्ट के लिए प्रस्थान किया। रास्ते में अनेकों मुद्दों पर सार्थक बातचीत हुई, पूरा माहौल ‘प्रेम रस’ में डूबा हुआ था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अलग-अलग मुद्दों पर लिखने वाले दो लेखक एक ही मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे, और वह था आपसी सद्भाव और प्रेम।

इस तरह हम निज़मुद्दीन वेस्ट के साधारण से दिखने वाले घर के असाधारण से ‘कांफ्रेस रूम’ जैसे कमरे में पहुंच गए। सामने कुर्सी पर मौलाना बैठे हुए थे तथा ऑनलाइन प्रसारण का बंदोबस्त किया जा रहा था। चारो तरफ लैपटॉप फैले हुए थे और जिनके पास लैपटॉप नहीं था वह कागज़ और कलम के द्वारा लेखन से मौलाना वहीदुद्दीन के व्याख्यान की खास-खास बातें अपने पास संजो कर रखने के लिए आतुर थे। एक तरफ महिलाओं तथा दूसरी तरफ पुरुषों के बैठने का बंदोबस्त था। जहां कुछ महिलाएं हिजाब धारण किए हुए थीं वहीं कुछ जींस पेंट भी पहने हुए थीं। लेकिन अधिकतर महिलाओं का सिर अच्छी तरह से ढका हुआ था, नक़ाब ना पहनने के बावजूद उन्होंने तहज़ीब के साथ कपढ़े पहने हुए थे। वहां का माहौल देख कर मुझे हद दर्जे तक आश्चर्य हो रहा था, क्योंकि मुस्लिम जगत में आज तक ऐसा अनुभव मुझे नहीं हुआ था। मेंरे पुराने अनुभव के अनुसार जहां अक्सर महिलाए ऐसे व्याख्यान में शरीक ही नहीं होती थी, वहीं अगर होती भी थी तो पूरी तरह से नकाब धारण किए हुए होती थी।

सबसे हैरत की बात तो यह थी कि इस आयोजन में अन्य धर्माविलंबी भी शामिल थे, बल्कि यह देख कर मेरे आश्चर्य की सीमा ही नहीं रही कि मंच को श्री रजत मल्होत्रा नामक व्यक्ति संभाले हुए थे। हल्कि सी उद्घोषणा और लैपटॉप पर कुछ कमांड देने के बाद उन्होंने लेक्चर की कमान मौलाना वहीदुद्दीन को दे दी। आज का विषय  था, सहनशीलता (सब्र) का महत्व।

उन्होने अपने व्याख्यान में अनेकों धार्मिक और सामाजिक उदाहरणों के ज़रिए बताया कि सारी कामयाबियों की कुंजी सहनशीलता है। जब कोई व्यक्ति सहनशीलता धारण करता है तो सारी प्राकृतिक शक्तियां उसकी सहायता करना शुरू कर देती है। उन्होंने बताया कि सब्र का मतलब होता है बर्दाश्त करना, कुछ लोग समझते हैं कि 'बर्दाश्त करना बुजदिली की बात है'। लेकिन यह नासमझी की बात है, सब्र असल में सबसे बड़ी ताकत है.

उनके व्याख्यान की एक-एक बात मोती की तरह है, सभी बातों के लिए मैं अपने ब्लॉग ‘प्रेम रस’ अथवा ‘प्रेम वार्ता’ पर पूरा लेख प्रकाशित करूंगा।

व्याखान के बाद प्रश्न उत्तर का दौर शुरू हुआ, जिसमें श्री तारकेश्वर गिरी, मैंने तथा डॉ अनवर जमाल सहित बहुत से लोगो ने ना केवल कक्ष अपितु इंटरनेट के माध्यम से पूरे विश्व में से अंग्रेज़ी तथा हिंदी में प्रश्न किए। क्योंकि यह व्याख्यान हिंदी में था इसलिए मौलाना ने सभी उत्तर हिंदी में ही दिए।

व्याख्यान समाप्त होने के बाद हम लोगों ने वापिस निकलने से पहले थोड़ी देर श्री रजत मल्होत्रा के साथ भी बातचीत की। गिरी जी ने रास्ते में हमें पुराने किले के पास पड़ने वाले पौराणिक भैरों मंदिर के बारे में भी जानकारी दी, जिससे पता चलता है कि वह ऐतिहासिक ज्ञान में भी निपुण हैं। उन्होंने हमें लक्ष्मी नगर के पास वी. थ्री. एस. शौपिंग मॉल पर छोड़ दिया। क्योंकि उन्हे कुछ आवश्यक कार्य आ गया था, इसलिए वह हमारे साथ दोपहर के खाने में नहीं आ पाए। खाना खाने के उपरांत डॉ अयाज़ दरिया गंज के लिए तथा मास्टर अनवार हापुड़ के लिए निकल गए। वहीं डॉ अनवर जमाल कुछ कम्पयूटर की जानकारी चाहते थे इसलिए उन्होने कुछ समय और मेरे साथ व्यतीत किया।

मौलाना वहीदुद्दीन के व्याख्यान के लिए पर मेरे अगले लेख की प्रतीक्षा कीजिये या फिर http://www.cpsglobal.org/content/6th-june’2010-sunday-urdu-060510-1105pm पर चटका लगा कर सुनिए.



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Importance of Patience, दिल्ली ब्लॉगर मिलन, सब्र, सहनशीलता

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व्यंग्य" कैसे कैसे हार्न

हार्न भी भईया बड़े अजीब-अजीब तरह के होते है। एक होंडा सिटी निकली तो उसका हार्न सुनकर लगा, जैसे उसके मालिक ने कार का गला घोंट दिया है और बड़ी मुश्किल से वह बेचारी कहने की कोशिश कर रही है कि ‘आगे से हट जाओ जी’। वैसे अधिकतर लोग अपने मिजाज़ के मुताबिक ही हार्न लगाते है। कुछ हार्न तो ऐसे बजते है जैसे डांट रहे हो, "हट बे!" वहीं कुछ पशु प्रेमी होते हैं, उनके हार्न सुन कर लगता है जैसे कोई बुल-डॉग पीछे से आ रहा है। एक बार तो अचानक पीछे से शेर कि चिंघाड़ सुन कर हाथ कांप गया और डर के मारे हमारा स्कूटर फुटपाथ से टकराते-टकराते बचा। लेकिन बाद में पता चला कि पीछे से शेर नहीं, बल्कि एक अजीब से मूंह वाली मोटर साईकिल हार्न बजाते हुए तेज़ी से गुज़र गई है। कुछ तो दुसरों को डराने के लिए ही हार्न लगाते हैं, एकदम करीब आकर तेज़ी से हार्न बजाते है। अगर अगला डर जाए तो उस पर दांत फांड़ते हुए किसी और को बकरा बनाने के लिए निकल जाते हैं। ट्रक और कैब के हार्न ऐसे होते हैं, जैसे कोई बच्चा अपने खिलौने के उपर बैठ गया हो और खिलौना दम घुटने से बचने के लिए लगातार चिल्ला रहा हो टूँ-टूँ-टूँ-टूँ.....। उसपर बच्चा हटने की जगह उसकी आवाज़ से और भी खुश हो रहा हो। अब किसी की हिम्मत तो होती नहीं कि उन्हे कुछ कह दे, हां हार्न ही निकल कर डाईवर से कहे "भईया गला घोट कर ही छोड़ोगे क्या?" तो अलग बात है। क्या कह रहे हो ट्रैफिक पुलिस? अरे यार ‘हफ्ता’ उनको कुछ सुनने-देखने देता है भला?

कई बार गाड़ी के पीछे से आकर लोग ऐसे हार्न बजाते है जैसे कह रहे हो ‘पिछे हट! गा़ड़ी के ब्रेक फेल हैं’। और अगर आपने गाड़ी साइड नहीं की तो लगता है पीछे से धक्का ही दे देंगे। अगर कुछ शरीफ हुए तो ब्रेक को बिना तकलीफ दिए, साईड से तेज़ी से निकलेंगे। यहां भी ब्रेक को ही आराम देते हैं, हार्न को नहीं। एक गाड़ी बैक होते समय गाना गा रही थी "पाछे हट जा, ताऊ हट जा"। अब पीछे गाड़ी तो खडी थी एक नवयौवना की और गाड़ी गाना गा रही थी ‘ताऊ हट जा’। उसके साथ-साथ हम भी चैंके कि आखिर लड़की ताऊ कैसे हो सकती है? वैसे आजकल पता भी नहीं चलता है कब लड़का-लड़की बन जाए, लेकिन लड़की और ताऊ? हंसिए मत, अब गाड़ी को कैसे पता कि पीछे कौन है? गाड़ी तो गाड़ी है, मालिक ने बोला और हो गई शुरू।

वैसे विदेशों की तरह हमारे देश में भी हार्न पर पाबंदी होती तो सोचो डाईवर के मनोरंजन का क्या होगा? अब सरकार किसी के मनोरंजन में दखल कैसे दे सकती है। फिर हार्न सुनकर ही तो राह चलते हुए लोगो को अपने फर्ज़ की याद आती है कि "ध्यान से चलें, वाहन कभी भी यमराज बन सकता है"।

चलिए इस उम्मीद के साथ अपना वाहन बंद करते है कि आपको हमारा "हार्न" पसंद आया होगा।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी


 
[दैनिक समाचार पत्र "हरिभूमि" के आज के संस्करण में मेरा व्यंग्य]


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खत्म होती संवेदनाएं

दैनिक जागरण के नियमित स्तम्भ "फिर से" में: "खत्म होती संवेदनाएं"

आज समाज में संवेदनशीलता का अंत होता जा रहा है। लोग सड़क हादसों में पड़े-पड़े दम तोड़ देते हैं और कोई हाथ मदद के लिए नहीं उठता है। अकसर देखने में आया है कि गरीब लोग तो फिर भी मदद करने के लिए आ जाते हैं, परंतु अमीर तथा बड़े ओहदों पर बैठे लोग स्वयं अपनी मोटर गाडि़यों से दुर्घटना करने की बावजूद लोगो को तड़पते हुए छोड़ देते हैं। और इसकी ताजा मिसाल मुझे खुद देखने को मिली। एक इंसान बैंक से पैसे निकालकर अपने घर जा रहा था, लेकिन एक बेहद अहम पद पर बैठी शख्सियत ने कानून और मर्यादा को तार-तार कर दिया। किसी आम इंसान से तो फिर भी ऐसी उम्मीद की जा सकती है, कि वह कानून का पालन न करे, लेकिन संविधान की रक्षा करने वाले खुद ही कानून का मजाक बनाकर किसी को मौत के मुंह में धकेल दें तो इसे आप क्या कहेंगे?

बात मुरादाबाद की है जहां दिल्ली से तबादला हो कर आई एक न्यायाधीश साहिबा की सेंट्रो कार से बैंक से पैसे निकाल कर आ रहे इकराम गनी बुरी तरह घायल हो गए. इसे माननीय न्यायधीश की लापरवाही कहें या फिर अपने रुतबे के दंभ में कानून को ठेंगा दिखाने की बड़े लोगो की फितरत, जिसके चलते न्यायधीश साहिबा जिसका नाम रिची वालिया बताया जा रहा है, जिसने बिना यह देखे की कोई मोटर साईकिल सवार भी बराबर से गुजर रहा है अपनी सेंट्रो कार को सड़क के बीच में रोका और कार का दरवाज़ा खोल दिया। जिससे टकराकर इकराम गनी बीच सड़क में गिरकर बुरी तरह घायल हो गए। उसके एक पैर की हड्डी बुरी तरह टूट गई और सर की हड्डी मस्तिष्क में जा घुसी। इतना होने पर जब लोगो की भीड़ इकट्ठी हो गई और कानून की तथाकथित रक्षक को लगा की बात बिगड़ सकती है, तो आनन-फानन में उसे पास के सरकारी अस्पताल में भरती कराकर चलती बनी। किसी तरह घर वाले इकराम को लेकर साई अस्पताल पहुंचे तो रास्ते में पता चला की उसकी जेब में बैंक की रसीद तो है, लेकिन पैसे और बटुआ गायब है। कितने क्रूर होते हैं वह लोग जो ऐसी हालत में भी ऐसी घिनौनी हरकत करते हैं।

माननीय न्यायधीश साहिबा ने यह भी देखने की जरूरत नहीं समझी की रोज अपनी रोटी का जुगाड़ करने वाले उक्त मोटर साईकिल सवार के घर वाले आखिर कैसे इतने महंगे इलाज के लिए पैसे का जुगाड़ कर रहे हैं? चश्मदीदों के मुताबिक न्यायाधीश साहिबा ने हादसे और अस्पताल के बीच में ही फोन पर अपने ताल्लुक वालों को कॉल करके स्थिति संभालने की जिम्मेदारी दे दी थी और शायद इसी के चलते मुरादाबाद की पुलिस ने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है। शायद वह मामले को रफा-दफा करने की फिराक में है। वैसे भी इस देश में गरीबों की सुनता कौन है?

- शाहनवाज सिद्दीकी



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Dainik Jagran, Accident

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अपने पहले लेख का इंतज़ार

समाचार पत्र "हरिभूमि" के आज के संस्करण में मेरा व्यंग्य - "अपने पहले लेख का इंतज़ार".

(व्यंग्य की कतरन पर
चटका लगा कर पढ़ें)
आज सुबह सुबह लिखनें के लिए बैठा, फिर सोचा कि क्या लिखुं? बड़े-बड़े लिक्खाड़ रोज़ कुछ ना कुछ लिखते हैं, उनके पास लिखने के लिए रोज़ नया विषय होता है। आज सोच कर बैठा हूँ कि कुछ ना कुछ तो लिखुंगा, लेकिन लिखने के लिए लिखना भी तो आना चाहिए! कल ही तो बॉस लाल-पीला हो रहा था, "लेख का 'ल' तो पता नहीं, चले है लिखने"। लेकिन हमने भी अपने-आप से वादा किया है कि आज लिख कर ही छो़ड़ेंगे। लिखने की अपनी ही सार्थकता है, सुना है लिखाई की धार तलवार से भी तेज होती़ है। मतलब लिखने से पहले यह भी सोचना पड़ेगा की कहीं यह किसी के लग ना जाए, बेकार में बैठे-बिठाए कट जाएगा? लेकिन अगर यही सोच कर बैठे रहे तो लिखेंगे क्या? इसलिए सोचा यह सब सोचने की जगह लिखना शुरू करते हैं। जिसको कटने का डर होगा वह हमारे लेख से अपने आप ही बचेगा। मैं एक लेखक हूँ, लेखन मेरा कर्म ही नहीं धर्म भी है, इसलिए मुझे अपना लेखन धर्म निभाना चाहिए। फिर लेखन तो समाजसेवा भी है और मेवा भी तो सेवा में ही मिलती है। अब जब मेंवा के लिए लिखना है तो किसी के नुकसान के बारे में क्या सोचना? लिखते समय मुझे केवल यह सोचना चाहिए कि मैं सही बात लिखूं। और यह तो हो ही नहीं सकता कि मैं, और गलत लिखूँ। वह तो लोग मुझसे जलते है और इसीलिए मुझ पर यह इल्ज़ाम लगाते हैं। अपने लेखन के समर्थन में मेंरे पास पूरे तर्क होते हैं। अब तर्क की बात तो यह है कि लेखन हमारा कार्य है, इसलिए बात अगर तर्कसंगत ना भी हो तो तर्क गढ़ना हमें आना चाहिए। वैसे मैं तो तर्क लेखन में भी निपुण हूँ, इसलिए मुझे घबराने की जगह अपना कर्म निभाना चाहिए। वैसे भी आज मुझे कुछ लिखना है और वह भी ऐसा लिखना है कि सब कहें कि "क्या लिखा है", हो सकता है कि कुछ कहें कि "यह क्या लिखा है"?

लेखन के बारे में सोचते-सोचते समय निकलता जा रहा है। अब जब मैं लिखने के लिए बैठा हूँ तो मुझे कुछ ना कुछ तो लिखना ही चाहिए। वैसे भी अगर लिखुंगा ही नहीं तो छपेगा क्या? और अगर कुछ छपेगा नहीं तो सेलैरी कैसे मिलेगी? फिर बॉस के साथ-साथ श्रीमति जी का गुस्सा! और बच्चे क्यों सोचेंगे? अगर उन्होने सवाल कर दिया कि बापू कुछ लिखा क्या? तो क्या जवाब दूंगा? समय व्यतीत होने के साथ-साथ मन बहुत विचलित होता जा रहा है। आज कई दिन हो गए हैं, रोज़ाना लिखने के लिए बैठता हूँ, लेकिन लिख ही नहीं पाता हूँ। आखिर लिखने के लिए कुछ सोच तो होनी चाहिए? वैसे लोग तो बिना सोच के भी लिख देते हैं. मित्रों दुआ करो की आज मैं कुछ ना कुछ लिख ही दूं। आप तब तक इंतज़ार करो, मैं कुछ ना कुछ लिख कर दिखाता हूँ। वैसे इंतज़ार तो मेरा बॉस भी कर रहा है, मेरे पहले लेख का!

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

"हरिभूमि" का प्रष्ट - 4



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